कला साहित्य एवं संस्कृति महिला सम्बन्धी मुद्दे

प्रियंका की कलाकार बनने की कहानी उन्ही की जुबानी

स्कूल में नाटक किया,डांस किया और यही जुनून था एक, इतना कि घर से कभी समर्थन नही मिला करता था, और घर के बिना मदद से भी इधर उधर से चीजो का जुगाड़ करके डांस में भाग ले लिया करती थी और ज्यादातर प्रथम स्थान प्राप्त करती थी। मैं अकेली उन लड़कियों में से नही जिनके शौक या इक्षा को घर मे ही गला घोंट दिया गया हो, बल्कि और भी बहुत है।

लड़ लड़कर और छिप छिपकर ऑडिशन देने जाया करती थी, और यही जुनून मुझे मेरी पढ़ाई में खुद का आर्थिक सहयोग देने में काफी मदद किया, स्कूल में पार्टटाइम डांस एंड एक्टिविटी टीचर के तौर पर लगभग 7 साल काम किया, क्योंकि 12 वी के बाद मुझे और तो कोई जॉब मिल भी नही सकती थी, इसलिए यही जुनून मेरा आर्थिक मदद का हथियार बना और अपनी पढ़ाई और घर खर्च में मदद किया।

आज भी याद है कि BA प्रथम वर्ष में मैंने कथक का फॉर्म डाला था और छिपकर डाला था क्योंकि मुझे पता था कि मेरे घर से लेकर समाज के आस पास नाचना,गाना और नाटक खेलना, वो भी लड़कियों का तो बिल्कुल ही तुक्ष माना जाता रहा था, चुकी आर्थिक तौर पर मुझे किसी के आगे हाथ नही फैलाने थे और ना हिसाब देना था खर्च का, इसलिए जॉब से जो भी छोटी मोटी सैलरी मिलती थी उससे यह संभव हो पाया था।

एग्जाम का दिन था जब जॉब से निकलकर मुझे 2 बजे के बाद एग्जाम देने जाना था, और मेरी माँ ने मुझे फोन पर उल्टे पाव वापस बुला लिया था, यह बात जानकर वो काफी नाराज हुई थी। इसमे मैं अपनी माँ या परिवार का दोष भी नही देना चाहती, क्योंकि अब मैं समझ सक रही हूँ कि वो जिस तरह के समाज से ताल्लुक रखते है, उसका स्वरूप यही है। इसी के विपरीत जब चुंनिन्दा लड़कियों की आवाज बुलंद होती है, तो उसको चरित्रहीन बोल दिया जाता है।

इंडियन आइडल, ज़ी रिअलिटी शो के ऑडिशन लखनऊ तक जाने में,जॉब की छुट्टी लेकर और घर वालो से बंक करके खूब गयी, प्रिंसिपल मैडम Vandana Gaur जी के मदद से, घर से लखनऊ पहुँचने में मात्र 2 से ढाई घंटा ही लगता था, तो शाम को तो वापस आना हो ही जायेगा सोचकर जाती और कई बार सिलेक्ट होने पर भी अपनी इस खुशी को ज़ाहिर नही कर पाना और फिर लखनऊ के आगे नही जा पाना होता था, क्योंकि उसके आगे जाने में समय भी लगना था ज्यादा और यह बिना परिवार के सहयोग के नही हो सकता था, इस बात से कसमसा कर
खूब रोने धोने के बाद घर पर खूब लड़कर कमरे में चुपचाप जाकर बैठ जाना मुझे आज भी याद है। वो समय और था कि इस पूरी लड़ाई में मैं सबसे हार गई पर खुद से जीत गयी थी।

हमारे में देश मे भले ही बात विश्वगुरु बनने की हो रही हो, पर बता दूं कि यह तब तक संभव नही जब तक महिलाओ, लड़कियों को ऐसे ही अपने इक्षा और चुनने का अधिकार उनके हाथ मे नही आ जाता। छोटे छोटे सपने हर दिन लड़कियों के उन्ही में मन के किसी कोने में मार दिए जाते है।

आधी आबादी की बात तो खूब होती आई है, पर चूकि आपके घर मे और आपके साथ नही हुआ है, तो उसी अनुभव से हम पूरे देश और समाज की सही निष्कर्ष पर पहुँच जाएंगे, ऐसा कतई सही नही है।

मैं साक्षी हूँ उन लड़कियों के बीच का जिसने यहां तक आने में सिर्फ घर परिवार या समाज से नही बल्कि खुद से भी लड़ा है। परिवार, समाज मे लड़ने से पहले आपको एक लंबी लड़ाई खुद से भी लड़नी पड़ती है, सबकी लड़ाई से महत्वपूर्ण खुद से लड़ने और उस पर जीत हासिल करने की होती है।

पहले ही लड़ाई में मैंने कई बार हार कर भी खुद से लड़कर खुद पर जीत हासिल की है और आज भी सतत प्रक्रिया में वो लड़ाई जारी है।

कहने का मतलब यह भाषण बाजी से काम नही चलेगा, आधी आबादी के मसले में हर छोटे छोटे चीज को बेहद संवेदनशील होकर समझने की जरूरत है। आपकी कोई पॉलिसी तब तक काम नही करेगी बराबरी के मसले पर जब तक कि घर के कामो से लेकर उसके निर्णय का सम्मान तक बात नही पहुँच जाती।

हर बात को साझा करके अपने बेटी, बीवी, बहु, मित्र को मात्र शरीर , चीज ना समझकर उसको हर डिस्कशन में शामिल करो और उसकी इक्षा क्या है इसको भी जानो।
बर्तन, चड्डी धोने से लेकर तुम्हारा रुमाल तक ढूंढकर देने तक ही सीमित मत करो….

मेरा परिवार आज उस गलती को स्वीकारता है, पर और कोई उस गलती को ना करे इसलिए लिख रही हूं, यह बात साझा होनी चाहिए कि हमने गलतियां की है, हमारे संस्कृति में एक यह भी परंपरा है कि गलतियों को छीपे लहजे में रखो और परिवार तो भगवान समान है इसलिए उस पर किसी प्रकार का कोई प्रश्नचिन्ह मत लगाओ, वो जो करते है अच्छे के लिए करते।

परिवार और रिश्ते बहुत जरूरी चीज है मैं मानती हूँ, पर परिवार के बीच डेमोक्रेटिक होना नही आया, और सही गलत पर वहां नही प्रश्न नही उठाये गए, तो क्या खाक इन खादी पहने बहरूपिया नेता से सवाल करोगे, उससे नुकसान पूरे देश का है।

सबसे अच्छी. फोटो जो.सब कुछ.कह देती हैं प्रियंका के बारे में.

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