कला साहित्य एवं संस्कृति

पुस्तक समीक्षा : राहुल सिंह की “सिंहावलोकन “

राहुल सिंह

सिंहावलोकन : छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति की झलक

राहुल कुमार सिंह जी छत्तीसगढ़ के चर्चित पुरातत्वविद और सांस्कृतिक अध्येता हैं। मगर इसके अलावा साहित्य एवं कला में भी उनकी उल्लेखनीय दखल है। उनके ब्लॉग ‘सिंहावलोकन’ में उनकी रचना वैविध्य को देखा जा सकता है।यह अकारण नही कि उनका ब्लॉग काफी चर्चित रहा है। उसमे जहां छत्तीसगढ़ के इतिहास और संस्कृति के विविध रंग हैं, वहीं शैली की रोचकता भी है। वे बातचीत के सहज अंदाज में गंभीर विषयों को पाठकों तक पहुंचा देते हैं।वे कब किसी एक प्रसंग से बात की शुरुआत करते हुए इतिहास, कला, संस्कृति, साहित्य, फ़िल्म के कई अल्पज्ञात और रोचक जानकारी पाठक को दे देते हैं; पता नही चलता।

उनकी प्रस्तुत पुस्तक ‘सिंहावलोकन’ उनके ब्लॉग से लिये गए 26 आलेखों का संग्रह है, जो विषयवस्तु में छत्तीसगढ़ पर केंद्रित है। इन्ही आलेखों के चयन का कारण क्या है, इसके बारे में पाठकों को पता नही चलता; न ही लेखक ने  ‘भूमिका’ जैसे औपचारिकता का निर्वहन किया है। फिर भी आलेखों को देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि लेखक छत्तीसगढ़ के विविधवर्णी संस्कृति, इतिहास, रंगमंच, लोक संस्कृति को समाहित करना चाहते रहे होंगे।

जैसा कि हमने ऊपर संकेत किया है, इन आलेखों की खासियत इनमें निहित ज्ञान के साथ इनके गद्य का सौंदर्य भी है। इनमें जीवंतता है। प्रवाह है ;जो इतिहास जैसे गंभीर समझे जाने वाले विषय को भी रोचक ढंग से पाठकों के समक्ष सहज ढंग से प्रस्तुत कर देता है। ये ‘टिप्पणियां’ विषयगत विधा की सीमा से भी परे चले जाते हैं। इन्हें आप केवल आलेख अथवा निबन्ध नही कह सकतें। इनमें दोनो की खासियत है।

यह मानी हुई बात है कि बिना ‘विषय’ से लगाव के विषय का प्रस्तुतिकरण महज ज्ञानात्मक रह जाता है। मगर इन आलेखों को पढ़ने से लेखक का छत्तीसगढ़ से गहरा संवेदनात्मक लगाव बार -बार उभर कर आता है; जो स्वाभाविक है। उन्होंने इन सांस्कृतिक ‘लक्षणों’ को देखा और जीया भी है।महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ‘लोक ‘ से उनका जुड़ाव इस कदर है कि दृष्टि में कहीं भी ‘अभिजात्य’ नही झलकता।

संग्रह में कई आलेखों में ‘पुस्तक चर्चा’ भी है, जहां लेखक ने बेबाकी से अपनी सहमति-असहमति जाहिर की है।प्रसंगवश जहां वे डॉ हीरालाल शुक्ल के ‘छत्तीसगढ़िया मन’ की प्रसंशा करते हैं, वही डॉ भगवत शरण उपाध्याय जैसे ख्यात इतिहासकार की  नर्मदा और सोन नदियों के चित्रण के ‘तरीके’ से असहमति जताने से नही चूकते। ऐसे और भी उदाहरण हैं।

यह जानते हुए भी कि लेखक का ‘ढंग’ आलेख लिखने का नही है; हमे लगता है कई जगह अपेक्षित विस्तार की आवश्यकता है; इसके अभाव में पृष्ठभूमि से अनजान पाठक विषय सन्दर्भ को ठीक से समझ नही पाता। बावजूद इसके ‘ पुरातत्व सर्वेक्षण’, ‘मेला-मड़ई’, ‘रुपहला छत्तीसगढ़’, ‘बुद्धमय छत्तीसगढ़’ में अपेक्षित विस्तार है। कुल मिलाकर यह पुस्तक छत्तीसगढ़ के कला, संस्कृति, इतिहास में रुचि रखने वाले पाठकों, शोधार्थियों के साथ-साथ पर्यटकों के लिए भी रुचिकर है।

पुस्तक-सिंहावलोकन
लेखक- राहुल कुमार सिंह
समीक्षा- अजय चंद्रवंशी

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