कला साहित्य एवं संस्कृति कविताएँ

पुस्तक समीक्षा : मीना गुप्ता की किताब “यक्ष प्रश्न”

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समीक्षक : अजय चंद्रवंशी

स्त्री की विडम्बना और अस्मिता का द्वंद्व

समकालीन कथा साहित्य में स्त्री स्वर अपनी मुखरता के साथ उपस्थित है। अब वे अपने जिये और देखे जिंदगी को अपने शब्दों में व्यक्त कर रही हैं। जाहिर है ऐसे में तस्वीरों के दूसरे पहलू भी उभर कर आ रहे हैं। इन तस्वीरों में पितृसत्ता की छवियां जो अब महीन होती चली हैं; के साथ-साथ नये दौर में स्त्री की आत्मनिर्भरता, अपने ढंग से जीवन जीने, नैतिकता के सामंती मानदंडों के टूटने-तोड़ने की छवियां भी हैं।

भारतीय समाज विविधतापूर्ण हैं। यहां आज भी एक तरफ महानगरों की खुली जिंदगी है तो दूसरी तरफ ग्रामीण और कस्बाई जीवन है;जहां सामंती जीवन मूल्य अपेक्षाकृत अधिक मजबूत है।जाहिर है अलग-अलग जगहों में जीवन की समस्याएं अलग-अलग हैं; स्त्रियों की भी। मगर पितृसत्ता अलग-अलग रूपों में हर जगह दिखाई देता है।

युवा कथाकार मीना गुप्ता की कहानियों को भी  इन संदर्भों में देखा जा सकता है। इन कहानियों में अलग-अलग परिवेश की स्त्रियां हैं, जो पितृसत्ता के अलग-अलग रूपों से पीड़ित हैं। पितृसत्ता में आज भी बहुत हद तक स्त्री को द्वितीयक समझा जाता है, मानो वे केवल सन्तान पैदा करने के साधन है। सन्तानहीनता मानो कोई अभिशाप है;और इसकी सारी जिम्मेदारी स्त्री की है। ‘किरण’ की जिंदगी नारकीय है क्योंकि वह वह सन्तान जन्म नही दे सकती; उस पर उसका बीमार होना जैसे कोई अपराध है। ‘राधिका’ की विडम्बना भी लगभग वही है, उस पर उसके पति के लिए उसका कोई जीवन ही नही है। रोटी-कपड़ा-मकान के अलावा मानो कोई आवश्यकता ही नही है।

स्त्री की जैविकी की भिन्नता के कारण सन्तानोत्पत्ति के समय उसे सहयोग की आवश्यकता होती है। इसका भी पितृसत्ता अपने पक्ष में उपयोग कर स्त्री की सम्वेदना को आहत करता रहा है। ‘यक्षप्रश्न’ कहानी की विडम्बना भी यही है। स्त्री जिन जीवन मूल्यों से संस्कारित होती रही है, वह लोकतांत्रिक नही रही है, इस कारण उसके सम्वेदना से खिलवाड़ किया जाता रहा है और वह चुपचाप इसे स्त्री जीवन की ‘नियति’ समझ कर सहती रही है।

मगर इधर समाज मे जो बदलाव हुआ है; स्त्री अपनी अस्मिता के प्रति जागरूक हुई है। अब वह आत्मनिर्भर होती चली जा रही है और तदनुरूप परनिर्भरता और उसके जीवन मूल्य से मुक्त होती चली जा रही है। मीना गुप्ता की कहानियां इस बदलते परिवेश को रेखांकित करती हैं। अब बंद खिड़कियां खुलने लगी हैं, और स्त्री ‘बिंदास’ हो चली हैं। नैतिकता के बंधन अब उसकी खुशियों को रौंद नही सकते। इन तमाम जीवन संघर्षों और जद्दोजहद के बीच जीवन की अन्य समस्याएं भी हैं; चाहे आर्थिक हों, बाजारवाद, दिखावा, वृद्धों की समस्या, रिश्तों की गर्माहट में आ रही कमी, आदि; मीना गुप्ता की कहानियां उनसे मुंह नही चुरातीं। उनके कहन का ढंग और शैली भी सहज है जिससे पाठकों को कहानी के मर्म तक पहुंचने में  कठिनाई नही होनी चाहिए।

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