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पुस्तक समीक्षा : इब्नबतूता की भारत यात्रा या चौदहवीं शताब्दी का भारत

इब्न-ए-बातूता

समीक्षक : अजय चंद्रवंशी

प्राचीन काल से भारत मे विदेशी यात्री आते रहे हैं। कुछ आक्रमणकारियों के साथ, कुछ व्यापारियों के साथ तो कुछ धार्मिक-तात्विक ज्ञान की खोज में। आये-गए तो कितने ही होंगे मगर सभी ने यात्रा विवरण दर्ज नही किया। बहुतों ने दर्ज किया भी होगा मगर समय-प्रवाह में वे काल-कलवित हो गए हैं। मगर सौभाग्य से कुछ यात्रियों के यात्रा विवरण सुरक्षित रह गए हैं, जिससे उस दौर के इतिहास को जानने में मदद मिलती है। इनमे मेगस्थनीज, फाह्यान, व्हेनसांग, अल-बिरुनी, इब्नबतूता, बर्नियर प्रमुख हैं।

इब्नबतूता मोरक्को का निवासी था, अपनी धार्मिक-वृत्तिवश 22 वर्ष की अवस्था में ही(1325 ई.) मक्का आदि सुदूर पवित्र स्थानों की यात्रा के लिए निकल पड़ा। शुरू में उसका विचार केवल हज करने का ही था, मगर बाद में कुछ धर्म गुरुओं से मिलने के बाद उसके मन मे  ‘संसार’ भ्रमण की इच्छा जागृत हो गई। मक्का से भारत के लिए स्थल मार्ग से मक्का, कस्तूनतुनियाँ, कास्पियन समुद्र, मध्य एशिया, खुरासान, हिंदुकुश, हिरात, काबुल, कुर्रम घाटी होकर 734 हि. (1333ई.) में सिंधुनद के किनारे भारत की सीमा पर पहुंचा.

‌उस समय दिल्ली में तुगलक वंश के मोहम्मद बिन तुगलक (1325-1351ई.) का शासन था। उस समय दरबार मे विदेशियों का काफी सम्मान होता था और उन्हें उच्च पदों पर नियुक्त भी किया जाता था। बतूता को भी  सम्राट ने दिल्ली के ‘काजी’ का महत्वपूर्ण पद दिया। इस पद पर रहते हुए बतूता ने राजदरबार और सम्राट के रहन-सहन, राजकीय कार्य-प्रणाली, षड्यंत्र, सैन्य-अभियान, सूचना-तंत्र, दंड-विधान को करीब से देखा। अफवाहों, षड्यंत्रों से बनते-बिगड़ते सम्बन्ध से बतूता भी अछूते नही थे, वह सम्राट के प्रिय थे मगर ऐसा भी समय आया जब उन्हें सम्राट के कोपभाजन का शिकार होना पड़ा। मगर शीघ्र ही स्थिति उनके अनुकूल हो गई और सम्राट ने उन्हें अपना राजदूत बना अमूल्य रत्नादि देकर दलबल सहित चीन सम्राट की सेवा में भेजा।  

बतूता ने 743 (1342ई.) हिजरी को चीन के लिए प्रस्थान किया। अलीगढ़, कन्नौज, चंदेरी, दौलताबाद, खम्बात होते हुए वह कालीकट पहुँचा। वहां से आगे बढ़ने और लुटेरों द्वारा समस्त संसाधन लूट लिए जाने और राजसेवकों के नष्ट हो जाने के कारण सम्राट के कोपभाजन की आशंका से बतूता ने दिल्ली लौटने का विचार त्याग दिया। वहां से इधर-उधर भटकते, कई देशों की यात्रा करते 750 हि. को वह अपने देश मोरक्को वापस पहुंच गया। इस तरह वह 25 वर्ष देश से बाहर रहा, जिसका अधिकांश समय यात्रा में ही व्यतीत हुआ। श्री यूल के अनुसार उसने लगभग 75000 मील की यात्रा की। यातायात के आधुनिक साधनों के अभाव में इतनी लंबी यात्रा आश्चर्य जनक है।

आश्चर्यजनक यह भी है कि उसने अपना विवरण यात्रा के पश्चात स्मृति के आधार पर लिखा है। इतने लोगों, स्थानों, घटनाओं को बहुत कम त्रुटि के साथ दर्ज करना विस्मय पैदा करता है। बहुत सम्भव है वह यात्रा के दौरान उसे किसी ढंग से दर्ज करता रहा हो(जिसका खुद उसने कहीं उल्लेख नही किया है),लेकिन उसके कहे अनुसार लुटेरों द्वारा उसका सर्वस्व लूट लिया गया था। बहरहाल यह माना जाता है कि उसने स्मृति के सहारे ही अपना विवरण लिखा है।

‌बतूता के इस यात्रा विवरण से मुख्यतः तत्कालीन राजकीय जीवन की झांकी मिलती है, मगर ‘सामान्य’ जनजीवन की झलक भी कहीं-कहीं मिलती है। चूंकि शासक वर्ग इस्लाम का अनुयायी था और बतूता ख़ुद भी, इसलिए इसमें मुख्यतः इस्लाम से सम्बंधित रीति-रिवाजों और कर्मकांडो का चित्रण है। इसमे बतूता के धार्मिक ‘पूर्वाग्रह’ भी स्पष्ट दिखते हैं, जहां वह ‘हिन्दुओ’ को अधिकतर ‘लुटेरा’ और ‘डाकू’ के रूप में चित्रित करता है। निश्चित रूप से मध्यकालीन सामंती वैचारिक सीमा में बतूता से अधिक उम्मीद की भी नही जा सकती। वैसे भी जिस प्रकार से राजदरबारों में षड्यंत्र और सत्ता के लिए हत्याएं होती थीं, सामन्तो में आपसी झगड़े होते थें वहां ‘धर्म’ गौण हो जाता था।

‌बतूता के इस विवरण का  ऐतिहासिक महत्व है। इतिहासकारों को इतिहास की कई गुत्थियों को सुलझाने में इससे मदद मिली है। श्री मदनगोपाल के अनुसार “सम्राट (मोहम्मद बिन तुगलक) तथा उसके शासन के संबंध में फैले हुए ‘चीन की चढ़ाई’ आदि वर्तमानकालीन भ्रमों को दूर करने के अतिरिक्त बतूता ने तत्कालीन भारतीय इतिहास की कुछ अन्य बातों पर भी प्रकाश डाला है; कुतुबुद्दीन ऐबक की दिल्ली विजय तिथि, बंगाल के मुसलमान गवर्नरों का शासनकाल, तुगलक वंश का तुर्क जातीय होना, कोरोमंडल तट के मुस्लिम शासकों का वृत और तत्कालीन भारतीय मुद्रा आदि विषयों की जानकारी के संबंध में इस विवरण से यथेष्ट सहायता मिली है”।

‌विवरण में स्त्रियों का जितना चित्रण मिलता है, उसमें उनकी ‘बेबसी’ ही झलकती है। युद्ध में पराजित राजाओं में स्त्रियों जो बहुधा हिन्दू ही अधिक हैं; दरबारों में नचवाई जाती थीं, तत्पश्चात सम्राट उन्हें युवराजों, अमीरों को बांट देता था। जब राज घरानों का यह हाल था तो सामान्य घर की स्त्रियों की कल्पना की जा सकती है। उन्हें दासियों के रूप में खरीदा बेचा जाता था, कोई ‘अच्छी’ लगे तो उससे शादी कर ली जाती थी। पुरुषों को भी दास के रूप में खरीदा-बेचा जाता था। उनसे कुली, मजदूरी, समान ढोने का काम लिया जाता था। कई जगह किराए पर भी मजदूर प्राप्त करने का उदाहरण आता है, इससे पगार देकर मजदूरी कराने की पुष्टि होती है, जो व्यापारिक पूंजीवाद का लक्षण है। अब तक मुद्रा का चलन व्यापक हो गया था, विदेशों से व्यापार होता था, इससे मध्यकालीन समाज की ‘गतिशीलता’ का पता चलता है।

‌बतूता ने आँखो-देखी ‘सती-वृतांत’ का जो चित्रण किया है, वह मार्मिक है। मध्यकालीन सामंती मूल्यों की यह विडंबना थी कि एक स्त्री को अपना जीवन समाप्त करना पड़ता था। बतूता लिखता है यह अनिवार्य नही था मगर यह ‘मूल्य’ बन गया था, और इसे ‘वंश प्रतिष्ठा’ गिना जाता था। मगर इसके अलावा अन्य कारण भी थे जिस तरफ बतूता का ध्यान जाना सम्भव नही था। जहां युद्ध के बाद पराजित खेमे की स्त्रियों को सामान की तरह खरीदा-बेचा जाता था, उन्हें कदम-कदम पर अपमानित किया जाता था; वहां ऐसी ‘प्रथा’ को पनपने में अवश्य बढ़ावा मिलता है।

‌मध्यकालीन इतिहास में मोहम्मद बिन तुगलक के चरित्र और व्यवहार विवादपूर्ण रहे हैं। ऐसा माना जाता है कि वह ‘विरोधाभाषी प्रवृत्तियों’ का ‘मिश्रण’ था। हालांकि इस पर भी मतभेद हैं। उसके कुछ निर्णय यथा ‘दोआब में कर वृद्धि’, ‘सांकेतिक मुद्रा का चलाना’, ‘कराचिल अभियान’ ‘राजधानी परिवर्तन’ की ‘असफलता’ की काफी आलोचना होती है। बतूता ने कराचिल अभियान और राजधानी परिवर्तन का जिक्र किया है। राजधानी परिवर्तन का कारण बतूता लिखता है कि वहाँ (दिल्ली) की जनता सम्राट को गालियों भरा पत्र लिखती थी। हालांकि इतिहासकार मात्र इसे ही कारण नही मानते। बतूता लिखता है  “यह सम्राट रुधिर की नदियां बहाने तथा पात्रापात्र का विचार किए बिना ही दान देने के लिए अति प्रसिद्ध है। शायद ही कोई दिन ऐसा बीतता होगा कि जब वह सम्राट किसी भिखमंगे को धनाढ्य न बनाता हो और किसी मनुष्य का वध न करता हो”।

‌सामन्तवाद में सम्राट की ‘इच्छा’ ही  ‘न्याय’ होता है। यहां भी बिना किसी मुकदमे के बहुत साधारण बातों पर लोगों के वीभत्स तरीके से वध का चित्रण है। हालत यह थी कि अपनी निर्दोषिता के पक्ष में तर्क करना प्रताड़ित होकर मरना था, इसलिए लोग ‘अपराध’ कबूल कर सीधे मरना ‘पसन्द’ करते थे। हाँ इस ‘इच्छा’ के कारण सम्राट भी एक जगह ‘अपराध’ के लिए  इक्कीस छड़ी की मार खा लेता है।

‌बतूता ने तत्कालीन डाक प्रबंध का रोचक वर्णन किया है “पैदल डाक का प्रबंध इस भांति होता है कि एक मील में, जिसको इस देश मे ‘क्रोह’ कहते हैं, हरकारों के लिए तीन चौकियां बनी होती हैं। इनको ‘दावह’ कहते हैं। प्रत्येक 1/3 मील की दूरी पर गांव बसे होते हैं जिनके बाहर हरकारों के लिए बुर्जियां बनी होती हैं। प्रत्येक बुर्जी में हरकारे कमर कसे बैठे रहते हैं। प्रत्येक हरकारे के पास दो गज लंबा डंडा होता है जिसमे छोर पर तांबे के घुंघरू बंधे होते हैं। नगर से डाक भेजते समय हरकारे के एक हाथ मे चिट्ठी होती है और दूसरे में डंडा। वह अपनी पूरी शक्ति से दौड़ता है। दूसरा हरकारा घुंघरू का शब्द सुनकर तैयार हो जाता है और उससे चिट्ठी लेकर तुरन्त दौड़ने लगता है। इस प्रकार इच्छानुसार सर्वत्र चिट्ठियां भेजी जा सकती है। यह डाक घोड़ों के डाक से भी शीघ्र जाती है”

‌विवरण में इनके अतिरिक्त तत्कालीन जन-जीवन के कई चित्र हैं। यहां के फल, अनाज, नगर स्थापत्य, राजभवन का चित्रण, सम्राट का दरबार, तत्कालीन भोजन पद्धति, दिल्ली का तुगलक पूर्व इतिहास, तत्कालीन विद्रोह, बतूता के निजी जीवन की झलक, यात्रा के दौरान आने वाली समस्यांए, लोग आदि।

विवरण से बतूता का जो व्यक्तित्व दिखाई देता है, उससे वह शांतिप्रिय, सामान्य जीवन जीनेवाला, धार्मिक, जिज्ञासु, व्यक्ति नज़र आता है। अपने धर्म के प्रति अतिरिक्त लगाव भी स्पष्ट दिखाई देता है।

‌यह यात्रा विवरण इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण तो रहा ही है। इतिहास में रुचि रखने वाले सामान्य पाठको के लिए भी रोचक है। इस विवरण की सार्थकता और सीमा तो अधिकारी विद्वान ही बताते रहे हैं। हमारी प्रतिक्रिया महज जिज्ञासु पाठक की प्रतिक्रिया ही है।

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