कला साहित्य एवं संस्कृति

पुरातात्विक : श्री मगरध्वज जोगी 700 : भोरमदेव क्षेत्र  : अजय चंन्द्रवंशी ,कवर्धा .

10.03.2019

भोरमदेव शिव मंदिर के दक्षिणी अर्धमंडप के प्रवेश द्वार के दाहिने में ‘मगरध्वज 700’ उत्कीर्ण है; जो इतिहास में रुचि रखने वालों को आकर्षित करता है। लिपि क्षेत्रीय देवनागरी में है और 12वी 13 वी शताब्दी से पुरानी नही जान पड़ती।ऐसा अभिलेख पचराही में मूर्तिखण्ड जिसका ऊपरी हिस्सा खण्डित है तथा निचले हिस्से में नृत्यरत तथा वादन करते स्त्री पुरुष अंकित हैं, में भी उत्कीर्ण हैं।

मगर यह लेख कई अन्य प्राचीन मंदिरों के प्रवेश द्वार, मंदिर वास्तु के किसी अन्य भाग में एवं मूर्ति के नीचे या शिवलिंग पर भी अंकित मिलता है। डॉ सीताराम शर्मा के अनुसार “हमारे देश के विस्तृत भूभाग में यथा उत्तर से दक्षिण और गंगा से लेकर गोदावरी तक, उत्तर पश्चिम चितौड़गढ़ से लेकर पूर्व में स्थित कटक तक यह लेख देखा जा सकता है। इसके अंतर्गत मध्यप्रदेश और बिहार सहित उड़ीसा का क्षेत्र भी सम्मिलित है। पाली, और भोरमदेव मंदिर, बोरिया का कंकाली टीला,देऊर बीजा, देउरगांव या शेरगढ़ स्थित शिवलिंग(खैरागढ़), अमरकंटक और चंदेरी(बघेलखण्ड) जबलपुर के बिलहरी क्षेत्र, हिंडोनिया(दमोह), नरसिंहपुर जिले के बरहटा में यह लेख विभिन्न मूर्तियों पर या मंदिर के किसी भाग पर अंकित मिलता है। केलूद(नागपुर) और राजस्थान के चित्तौड़गढ़ में में भी यह लेख मिलता है। कुछ समय पूर्व(2015) ‘वैद्यनाथ धाम’ (झारखंड)में भी खुदाई के दौरान मंदिर के एक स्तम्भ में यह अभिलेख मिला है।

मगरध्वज योगी 700′ आखिर क्या है?

स्पष्टतः इसके दो भाग प्रतीत होते हैं; पहला भाग नाम और दूसरा भाग संख्या। इस पर विभिन्न विद्वानों ने विचार किया है-

(1) कनिंनघम 700 को सम्वत से जोड़ने का प्रयास करते हैं, और लिपि की प्रवृत्ति से हर्ष के काल से जोड़ने का प्रयास करते हैं(700+606= 1306)।मगर तत्कालीन समय मे इस क्षेत्र में कलचुरी संवत के व्यापक प्रयोग से यह उचित प्रतीत नही होता।
(2)एक दूसरे विद्वान श्री कजेन्स ने संख्या 700 को मगरध्वज जोगी के शिष्यों की संख्या के रूप में अपनी मान्यता दी है। इस संख्या से उन्होंने जोगी की महत्ता और श्रेष्टता प्रतिपादित की है। अब प्रश्न यह उठता है कि क्या यह लेख किसी एक व्यक्ति के द्वारा लिखा गया है?


लेख का सूक्ष्म परीक्षण करने पर यह ज्ञात होता है कि यह एक ही शैली में न होकर विभिन्न शैलियों में अंकित है। इस आधार पर यह संभावना बलवती प्रतीत होती है कि जोगी के 700 शिष्यों की मंडली में तीर्थाटन के समय अलग-अलग शिष्यों के द्वारा उक्त लेख अंकित किया गया हो।

(3) उक्त लेख एक ही सम्प्रदाय के मूर्तियों पर न होकर विभिन्न सम्प्रदायों की मूर्तियों पर उत्कीर्ण किया गया है। दमोह जिले के हिंडोनिया और कवर्धा क्षेत्र के कंकाली टीला से प्राप्त विष्णु मूर्ति की चौकी पर यह पाया गया है। इसके अतिरिक्त खैरागढ़ क्षेत्र के अंतर्गत देउरगांव(शेरगढ़) तथा शिवकोकड़ी स्थित शिवलिंग पर यही लेख खोदा गया है। इसी तरह रायपुर जिले में स्थित सोमनाथ मंदिर के विशालकाय शिवलिंग पर यह लेख देखा जा सकता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि मगरध्वज जोगी और उसके अनुयायी शिष्य देश एवं प्रदेश के विभिन्न देवस्थानों की यात्रा करते थे और उस स्थान में अपनी यात्रा की स्मृति हेतु मूर्तियों पर या मंदिर के किसी भाग पर अपनी जमात का संकेत “श्री मगरध्वज जोगी 700” अंकित कर देते थे। हो सकता है कि संख्या 700 कोई शुभसूचक अंक हो जिसका प्रयोग यह जमात करती रही हो।

उक्त विवरण से यह प्रतिध्वनित होता है कि मगरध्वज जोगी की प्रतिष्ठा अत्यधिक थी, इसलिए पूजास्थलों जैसे पवित्र स्थानों में ही नही, अपितु मूर्तियों एवं मंदिर में स्थापित शिवलिंग पर भी यह लेख उत्कीर्ण किया गया है। इसके अतिरिक्त दूर-दूर तक तीर्थाटन करने में अनेक बाधाओं के होते हुए भी उस जमात को सुविधाएं प्रदान की गई होंगी। क्रैमरिक ने भी यही मत प्रकट किया है।

मगरध्वज योगी कौन था?

सामान्यता योगी(जोगी) शैव मत का अनुयायी होता है। तथा वह इसी सम्प्रदाय के सन्यासियों द्वारा पूज्य होता है। विचित्रता यह है कि मगरध्वज जोगी शैवों और वैष्णवों के द्वारा समान रूप से सम्माननीय था क्योंकि शिवलिंगों की तरह वैष्णव मूर्तियों में भी इनका नाम अंकित मिलता है। अब प्रश्न उठता है कि इस जोगी का निवास कहां था?

सीताराम शर्मा लिखते हैं कि रतनपुर के हस्तलिखित इतिहास(बाबू रेवाराम कायस्थ तथा शिवदत्त शास्त्री) से ज्ञात होता है कि यहां मगरध्वज जोगी और उसके 700 अनुयायियों के लिए एक मठ था। यह जाजल्लदेव (1114 ई.) का समकालीन था। रतनपुर के हैहयवंशी नरेश शैव मत के अनुयायी थे, क्योकि इनकी शाखा त्रिपुरी से सम्बंधित थी। त्रिपुरी कलचुरी भी शैव थे और शैवों के पाशुपत सम्प्रदाय के अंतर्गत कालमुख शाखा से सम्बंधित थे। इनके धर्मगुरु सद्भवशम्भू ने विभिन्न स्रोतों से प्राप्त दान एवं उपहारों की सहायता से गोलकीमठ की स्थापना की थी जिसकी शाखाएं आधुनिक मद्रास के निकट मुखपुरम एवं रीवा क्षेत्र में गुर्गी और चंदेरी तथा बुन्देलखण्ड में खजुराहों तक फैल गई।

अतः यह संभावना प्रतीत होता है कि उक्त गोलकीमठ की एक अन्य शाखा देवीखोल(रतनपुर) में स्थापित की गई होगी। पाशुपत सम्प्रदाय के शैवों का रतनपुर में उपासनापीठ महामाया मंदिर है। मगरध्वज जोगी का काल त्रिपुरी के कलचुरियों का अपकर्ष और रतनपुर शाखा का उत्कर्ष काल था। यह स्वाभाविक है कि रतनपुर के इस उत्कर्ष काल मे इस मठ की मान्यता अपने मूलस्थान गोलकीमठ से भी अधिक हो गई होगी।

सीताराम शर्मा ने रतनपुर के हस्तलिखित इतिहास में मगरध्वज जोगी और उसके 700 अनुयायियों के लिए एक मठ होने तथा इस जमात के तीर्थाटन करते हुए वापस न लौटाने की बात लिखी है। मगर हमारे स्तर इसकी पुष्टि नही हो पायी है। बाबू रेवा राम कायस्थ के ‘तवारीख श्री हैहयवंशी राजाओं की’ में जिक्र है ” राजा वेणुदेव के कौशिल्यादेवी से बेठा से राजा जाजल्वदेव पैदा हुए यह वेणुदेव राजा बड़े शूरवीर हुए दाता सिद्ध गोरख से वर पाय के बाहर नामवरी किये”। एक अन्य जिक्र इस प्रकार है ” यह राजा रत्नसिंह बड़ा धर्मात्मा रहे अपने खुद यह देश में टकौरी नही लेते थे देवस्थान इमारत बहुत बनवाए 2 तालाब बनवाए 1 बद 2 रत्नेश्वर दान यज्ञ करके बाद गोरक्षनाथ योगी के चेला होके अपने बेटा भूपाल सिंह को राज्य देके गुरू के संग तपस्या करके अमर होक रानी वेदमती समेत अब तक मेकल पर्वत में रहते हैं”
पं. शिवदत्त शास्त्री के ‘रत्नपुर आख्यान’ में जिक्र है “रत्नसिंह देव सम्वत 915 के साल में रहे रत्नेश्वर तालाब किए उनकी स्त्री वेदनाम के तालाब किए गोरक्षराथ में आशीर्वाद से रत्नसिंह अमर हो गए नर्मदा नदी के किनारे रहत हंय कोनो समय मे रत्नपुर आवत हंय”।

सम्भवतः सीताराम जी के अनुसार ‘गोरक्षनाथ’ ही मगरध्वज है। हो सकता है उनको दोनो नामों से जाना जाता रहा हो। ऊपर उल्लेखित पांडुलिपी में ‘जाजल्वदेव’ जाजल्लदेव प्रथम(1090-1120) , तथा ‘रत्नसिंह’ रत्नदेव प्रथम(1045-1065) प्रतीत होते हैं।डॉ रामकुमार बेहार ने भी ‘छत्तीसगढ़ का इतिहास’ में लिखा है “डॉ श्याम कुमार पांडेय के अनुसार- ऐसा माना जाता है कि जाजल्लदेव मगरध्वज जोगी के साथ तीर्थाटन को गए तथा वापस लौटकर नही आए(दक्षिण कोशल पृष्ठ 122)”।स्पष्टतः यह जनश्रुति प्रतीत होता है। इसी तरह जाजल्लदेव (प्रथम) के रतनपुर शिलालेख सम्वत 866(1114 ई.) में उनके गुरु ‘रूद्रशिव दिग्नाग’ होने का पता चलता है, जो न्याय तथा अन्य सिद्धांतो के जानकार थे। इस अभिलेख में जाजल्लदेव द्वारा ‘तापस मठ’ बनाये जाने का भी उल्लेख है। ऊपर वर्णन में गोरक्षनाथ का स्थान ‘मैकल पर्वत ‘नर्मदा नदी के किनारे’ से वह स्थान अमरकंटक हो सकता है।

ऊपर उल्लेखित ‘मगरध्वज’, गोरक्षनाथ’ और ‘रूद्रशिव दिग्नाग’ तीनो क्या यह ही व्यक्ति के नाम हैं? अथवा इन तीनो के बीच क्या सम्बन्ध है; इसकी जानकारी हमे नही मिल पाती।

मगरध्वज की पहचान के सम्बंध मे एक अन्य सूत्र “ध्वज” शब्द से प्राप्त होता है। जनश्रुति के आधार पर रतनपुर का प्रथम राजा मयूरध्वज था जो महिष्मति(आधुनिक मान्धाता- जिला निमाड़) के प्रतापी सम्राट कार्तवीर्य सहस्त्रार्जुन का पुत्र था। इसके बाद ताम्रध्वज, विश्वध्वज, चन्द्रध्वज, मखपालध्वज आदि। ताम्रध्वज की साम्यता महाभारत में उल्लेखित राजा ताम्रध्वज से की गई है। सम्भवतः ‘मगरध्वज’ इसी मिथिकीय परंपरा से प्रभावित नाम हो। इस तरह मगरध्वज देवीखोल(रतनपुर) के धार्मिक गद्दी का उत्तराधिकारी रहा होगा।

एक अन्य सूत्र के रूप में मारकण्डा मंदिर(जिला चाँदा) के पीछे की भित्ति पर ‘रत्नध्वज’ का विक्रम संवत 1519 अर्थात 1462 ई. का एक अभिलेख है। सम्भव है यह मगरध्वज के परंपरा का, बाद का कोई सन्यासी हो जो सामने द्वार पर अपनें पूर्ववर्ती जोगी का नाम देखकर अपना नाम मंदिर की पिछली भित्ति पर उत्कीर्ण कराया हो।

इस तरह विश्लेषण से इतना निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ‘मगरध्वज’ रतनपुर के कलचुरियों द्वारा स्थापित किसी मठ(सम्भवतः महामाया) का मठाधीश रहा होगा। उसके 700 शिष्य रहे होंगे अथवा यह 700 उसका कोई शुभ संकेत रहा होगा। उसकी प्रतिष्ठा अत्यधिक थी; वह शैव, वैष्णवों, शाक्तों में समान रूप से पूजनीय था। वह लागातर तीर्थाटन करता था, तथा अपना नाम उत्कीर्ण कराता था।

संदर्भ

(1) कनिंनघम आर्कियोलॉजिकल सर्वे रिपोर्ट भाग 17- अ. कनिंनघम (1882)
(2) भोरमदेव क्षेत्र: दक्षिण पश्चिम कोशल की कला- डॉ सीताराम शर्मा (1990)
(3) उत्कीर्ण लेख- बालचन्द जैन(संस्करण 2005)
(4)छत्तीसगढ़ का इतिहास- डॉ रमेन्द्र नाथ मिश्र(2010), इसमें संकलित रेवाराम और शिवदत्त शास्त्री का हस्तलिखित रतनपुर का इतिहास
(5) छत्तीसगढ़ का इतिहास-डॉ रामकुमार बेहार(2014)


#अजय चन्द्रवंशी, कवर्धा (छ. ग.)
मो. 9893728320

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