कला साहित्य एवं संस्कृति

पुरातात्विक अध्ययन : कवर्धा , भोरमदेव मंदिर के निर्माता निर्धारण की समस्या :  अजय चंन्द्रवंशी

29.01.2019 : छत्तीसगढ़ 

छत्तीसगढ़ के खजुराहो के रूप में प्रसिद्द भोरमदेव का मंदिर अपने स्थापत्य कला और प्राचीनता के कारण छत्तीसगढ़ के इतिहास में विशिष्ट स्थान रखता है. जिस काल(9 से 17वीं शताब्दी) में छत्तीसगढ़ के अधिकांश हिस्से में कलचुरियो का आधिपत्य था, लगभग वही समय भोरमदेव क्षेत्र में फणिनागवंशी शासको के शासन का है. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भोरमदेव के शासक रतनपुर के कलचुरियों की अधीनता स्वीकार करते थे अथवा उनके साथ सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाये हुए थे.

रामचन्द्र देव् के मड़वा महल अभिलेख(1349 ई.) से ज्ञात होता है कि उनका विवाह हैहयवंशी(कल्चुरी) राजकुमारी अम्बिकादेवी से हुआ था, इससे कलचुरियों के समक्ष फणिनागवंशियो के मजबूत स्थिति का पता चलता है. भोरमदेव मंदिर के दक्षिणी प्रवेश द्वार में संवत 1608(सम्भवतः विक्रम संवत) का एक शिलालेख है, जिससे पता चलता है कि श्री भुवनपाल के शिवालय को किसी मांडो पति द्वारा तोड़कर एवं रतनपुर के बाहुराय द्वारा विजय प्रतीक के रूप में रत्नजड़ित कलश ले जाया गया था. इससे पता चलता है कि इस समय रतनपुर के साथ फणिनागवंशियो का संबंध मित्रता पूर्वक नही रह गया था.बाद के दौर में दोनों राजवंशो के बीच क्या संबंध था इसका साक्ष्य अनुपलब्ध है.

 

रतनपुर के कलचुरियो के अलावा भोरमदेव के करीब में गढ़ा मंडला का साम्राज्य भी शसक्त था, जिसमे राजगोंडवंशीय शासक शासन कर रहे थे.लेकिन दोनों राजवंशो के बीच कैसा संबंध था इसकी जानकारी नही मिलती.जनश्रुतियों से पता चलता है कि यहां के शासक गढ़ा मण्डला आते-जाते थे. श्री राजेंद्र कुमार चंद्रौल के अनुसार यह क्षेत्र गोंड़ शासको के अधीन 16 वीं शती ई. में संग्रामशाह के शासनकाल में आया. 1751 में कवर्धा रियासत की स्थापना महाबली सिंह ने मंडला के शासक के सहायता से ही की.

नामकरण

श्री सीताराम शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘भोरमदेव’ में मंदिर के भोरमदेव नामकरण के संबंध में दो मत व्यक्त किये हैं.

(1) जनश्रुति के अनुसार भोरमदेव नामक गोड़ राजा
हुए थे, जिन्होंने मंदिर का निर्माण कराया.गर्भगृह
में एक राजपुरुष की मूर्ति को भोरमदेव माना
जाता है.लेकिन फणिनागवंशियो की वंशावली में
भोरमदेव नामक कोई राजा का उल्लेख नही है,
न ही इस नाम की कोई मुद्रा या अभिलेख प्राप्त
होता है, इसलिए इसे युक्तियुक्त नही माना जा
सकता.

(2) शिव का एक नाम क्षेत्रीय भाषा में भोरमदेव भी
कहा जाता है. गोड़ भी परंपरा से शिव के उपासक
होते हैं, अतः शिव मंदिर होने के कारण इसका
नाम भोरमदेव होना उचित प्रतीत होता है.

 

उपर्युक्त दोनों मतों के अलावा हमने अपने अध्ययन से कुछ नयी बातों का पता लगाया है-

(1) दक्षिणी प्रवेश द्वार में उत्कीर्ण अभिलेख संवत 1608(1551 ई.) में इस मंदिर को भुवनपालदेव
का शिवालय( भुवनपालस्य शिवालय) कहा गया है, जो फणिनागवंशी शासको के 8 वे नम्बर के शासक थे.
तो क्या भुवनपाल ही कालांतर में भोरमदेव हो गया है? ध्वनि साम्य की दृष्टि से यह असम्भव नही है.

(2) रामचन्द्र देव् के मड़वा महल अभिलेख में फणिनागवंश की उतपत्ति की कथा बताई गयी है, जिसके अनुसार जातुकर्ण मुनि अपने दो पुत्रों तथा पुत्री मिथिला के साथ इस स्थान पर रहते थे.कुछ समय पश्चात् मिथिला शेषनाग के संपर्क में आयी और गर्भवती हो गयी,वस्तुस्थिति का ज्ञान न होने के कारण दोनों भाई एक दूसरे पर शक करने लगें. बाद में यह भ्रम टुटा और वास्तविकता पता चला मिथिला-शेषनाग का पुत्र अहिराज हुआ जो इस वंश का प्रथम शासक बना.

अपने अध्ययन के दौरान हमे भोरमदेव की एक वृद्ध निरक्षर महिला, जो क्षेरकी महल में बैठती है, ने लगभग यही कहानी सुनायीं और बताया कि मिथिला के दोनों भाइयों गर्भ के प्रति जो भरम(भ्रम) था उसी के कारण मंदिर का भोरमदेव नाम पड़ा. हालांकि यह मत(भरम से भोरम) ध्वनि साम्य की दृष्टि से आकर्षक है, लेकिन क्षेत्रीय बोली(छत्तीसगढ़ी) में भरम के लिए ‘भोरहा’ शब्द प्रचलित है.दूसरी बात मंदिर के लिए इस नाम का जुड़ना समझ नही आता न ही अन्य स्रोतों से इसकी पुष्टि होती है.

(3) राय बहादुर हीरालाल ने इसे ‘बोड़मदेव का मन्दिर’ लिखा है, लेकिन इसके संबंध में कोई व्याख्या नही की है.

(4) रतनपुर के बाबू रेवाराम कायस्थ ने ‘तवारीख श्री हैहयवंशी राजाओं की’ (1858) में ‘भोरमदेव’ शब्द का ही प्रयोग किया है,जिससे पता चलता है कि यह नामकरण काफी पहले का है.

(5) जेनकिन्स(1825) ‘Bhyram Deo'(भैरमदेव) औऱ कनिंनघम(1881-82) ने ‘Buram Deo’, ‘Borarm Deo’ का प्रयोग किया है।मगर यह अंग्रेजी में सघोष महाप्राण ध्वनि ‘भ’ न होने की समस्या जान पड़ती है

 

मंदिर का निर्माता

भोरमदेव मंदिर का निर्माता कौन था, इस पर मतभेद है.सीताराम शर्मा जी ने इस पर विस्तृत चर्चा की है और बताया है कि निर्माता की दृष्टि से तीन नाम उभरकर आते हैं, (1) श्री गोपालदेव(1089ई.) (2) श्री लक्ष्मण देव् राय(1349 ई. से पूर्व (3) श्री रामचंद्र देव्(1349 ई.). उन्होंने गोपालदेव को सर्वाधिक उपयुक्त बताया है, जिसे अधकांश लोग मानते हैं.

भोरमदेव मंदिर निर्माता के संबंध में विचार करने की दृष्टि से चार अभिलेख महत्त्वपूर्ण हैं

(1) मन्दिर के सभा मण्डप में रखी हाथ जोड़े योगी की मूर्ति, जिसके चौकी पर दाएं तरफ “सिद्धि संवत 840 राणक गोपालदेव राज्ये” उत्कीर्ण है. इतिहासकार इसे कल्चुरी सम्वत मानते हैं, क्योकि कलचुरियो के व्यापक प्रभाव को देखते हुए ऐसा लगता है कि फणिनागवंशी कलचुरियो के अधीन रहे होंगे.इस दृष्टि से यह ई.सन 840+(248-49)=1088-89 का ठहरता है.भोरमदेव के निर्माण शैली को देखा जाय तो यह ग्यारहवीं सदी के लगभग प्रचलित नगर शैली में निर्मित है.गोपालदेव का कार्यकाल भी ग्यारहवीं सदी ठहर रहा है,अतः प्रबल सम्भावना है कि गोपालदेव इस मन्दिर के निर्माता रहे होंगे.फणिनागवंशियो के वंशावली में गोपालदेव छठवे नंबर के शासक हैं.

जैसा कि कनिंनघम ने विचार किया है यदि संवत 840 को शक संवत माना जाय तो इस दृष्टि से यह ईस्वी सन 918(840+78) होगा.यदि गोपालदेव को मंदिर का निर्माता माना जाय तो मंदिर निर्माण शैली जो की ग्यारहवीं शताब्दी के आस-पास ठहरता है, की दृष्टि से यह उपर्युक्त प्रतीत नही होता.लेकिन जैसा क़ि हम जानते हैं बाद के शिलालेखों (रामचन्द्र देव् का मड़वा महल अभिलेख, कुछ सती स्तम्भ) में विक्रम संवत का प्रयोग हुआ है. समस्या यह है कि कहीं कल्चुरी संवत, तो कहीं विक्रम संवत का प्रयोग क्यों हुआ है? एक संभावित कारण यह हो सकता है कि शुरूआती दौर में जब कलचुरियो का दबाव अधिक रहा होगा तो कल्चुरी संवत का प्रयोग हुआ होगा और बाद में जब उनका प्रभाव कम हुआ होगा तो विक्रम संवत का प्रयोग हुआ होगा.

योगी की मूर्ति में ही एक अन्य लेख में लक्ष्मण देव्, उनके पुत्र रामचन्द्र तथा कई रानियों(अथवा पुत्रियों)के नाम अंकित हैं. इसी कारण कनिंनघम ने लक्ष्मण देव को मंदिर के निर्माता होने की सम्भवना व्यक्त किया है.उनके संकेतो के आधार पर वी.वी. मिराशी ने माना है कि लक्ष्मण राय गोपालदेव के अधीनस्थ सामंत(petty chief) रहे होंग. मगर
लक्ष्मण देव् फणिनागवंश के 23 वे नंबर के शासक थे. एक ही मूर्ति में गोपालदेव और लक्ष्मण देव् का लेख एक ही समय का नही हो सकता, क्योंकि दोनों के बीच 17 पीढ़ी का अंतर है.यदि वंशावली में कुछ कल्पित नाम मान भी लिया जाय तो भी यह दूरी काफी रह जाती है।इसलिए लक्ष्मण देव् और गोपालदेव को एक ही समय का मानना उचित नही जान पड़ता।चूँकि लक्ष्मण देव् के पुत्र रामचन्द्र देव् 1349 ई में वर्तमान थे, अतः लक्ष्मण देव् का कार्यकाल 1300ई के बाद होना चाहिए. मंदिर निर्माण की शैली चूँकि ग्यारहवीं सदी के आसपास की है, इस दृष्टि से लक्ष्मण देव् बहुत बाद के हैं, अतः उनका मंदिर का निर्माता होना संभव प्रतीत नही होता.

लगभग इसी समय रामचंद्रदेव द्वारा निर्मित मड़वा महल(1349) में कला का ह्रास स्पष्ट दिखाई देता है, इससे भी पता चलता है कि भोरमदेव का मुख्य मंदिर लक्ष्मण देव्- रामचंद्रदेव के समय का नही हो सकता.

(2) मड़वा महल से प्राप्त रामचन्द्र का विक्रम संवत 1406(1349 ई.) का प्रस्तर अभिलेख में फणिनागवंशियो की उत्पत्त्ति कथा तथा वंशावली का उल्लेख है. इससे यह भी पता चलता है कि रामचंद्रदेव ने एक शिवमंदिर का निर्माण कराया था तथा उनका विवाह हैहयवंशी राजकुमारी अम्बिकादेवी से हुआ था. रामचंद्रदेव ने जिस शिव मंदिर का निर्माण कराया था वह मड़वा महल ही होना चाहिए क्योंकि अभिलेख वहीं प्राप्त हुआ है.दूसरी बात रामचंद्रदेव का कार्यकाल 14 वीं शताब्दी का है जबकि भोरमदेव का मुख्य मंदिर 11 वीं शताब्दी के आस-पास का है, अतः रामचन्द्र देव् मुख्य मंदिर के निर्माता नही हो सकतें.

(3) भोरमदेव के दक्षिणी प्रवेश द्वार के बाएं पार्श्व में संवत1608 (1551) का एक अभिलेख है, जिससे ज्ञात होता है कि भुवनपाल देव् के शिवालय के रत्नजड़ित कलश को मांडो पति ने तोड़ा तथा रतनपुर के बाहुराय ने विजय के प्रतीक के रूप में ले गया. संवत 1608 कल्चुरी संवत नही हो सकता क्योंकि 1856 ई.(1608+248) तक भोरमदेव साम्राज्य नष्ट हो चूका था.जेनकिन्स(1825) और अलेक्जेंडर कंनिघम (1881-82 )भोरमदेव आये थे तब साम्राज्य का अस्तित्व नही था.1751 कवर्धा रियासत की स्थापना के समय भी भोरमदेव राज्य के अस्तित्वमान होने के साक्ष्य नही मिलते.

इस अभिलेख में मंदिर को भुवनपाल का शिवालय क्यूँ कहा गया है? तो क्या भुवनपाल ही मंदिर के निर्माता है? श्री शरद हलवाई ने अपने लेख में लिखा है “भुवनपाल देव् मंदिर से अपभ्रंश होक्त कालांतर में यह भोरमदेव मंदिर कहलाने लगा होगा” . ध्वनि साम्य में यह उचित प्रतीत होता है.भुवनपाल देव् फणिनागवंशियो में 8 वे नम्बर के शासक हैं. यदि गोपालदेव (6वे शासक) ग्यारहवी शताब्दी(1088) में वर्तमान थें तो भुवनपाल देव् ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हो सकते हैं, क्योकि कभी-कभी युद्ध या महामारी आदि वजह से राजा जल्दी भी बदल जाते थे.इस दृष्टि से देखा जाय तो मंदिर निर्माण शैली(ग्यारहवी-बारहवीं सदी) के हिसाब से भी भुवनपाल देव् मंदिर निर्माता के रूप में उभरकर सामने आते हैं. आश्चर्य जनक बात यह है कि कंनिघम से लेकर सीताराम शर्मा जी तक किसी ने भुवनपाल देव् पर विचार नही किया.श्री शरद हलवाई का ध्यान इस ओर गया लेकिन वे इसका गहन विश्लेषण नही कर सकें.

(4) दक्षिणी प्रवेश द्वार के ही दाहिने पार्श्व पर ‘जोगी मगरध्वज 700’ उत्कीर्ण है. ऐसा ही लेख कवर्धा के आस-पास के क्षेत्रो में और देश के अन्य क्षेत्रों में भी प्राप्त हुए हैं. श्री एस.एस. यादव और अतुल प्रधान के अनुसार ऐसा लेख नौ या दस जगह प्राप्त हुए हैं. लिपि को ध्यान दिया जाय तो यह लेख 1200 या 1300 ई से पहले का नही हो सकता.उन्होंने इसे हर्षवर्धन के कार्यकाल से जोड़ते हुए 606+700=1306 ई. होने की संभावना व्यक्त की है.यह विक्रम संवत नही हो सकता, क्योकि मंदिर उतना पुराना सिद्ध नही किया जा सकता.

लेकिन जैसा की श्री यादव और अतुल जी ने भी लिखा है, की जरुरी नही 700 कोई सम्वत ही हो. शरद जी के अनुसार ‘जोगी मगरध्वज 700’ शिल्पकारों की टोली रही होगी, जिसके प्रमुख मगरध्वज और 700 उसके सहायक रहे होंगे, जी आस-पास के क्षेत्रो में घूम-घूम कर मंदिर बनाते रहे होंगे.यह कोई शुभ चिन्ह भी हो सकता है; मगर ऐसी किसी परंपरा का पता नही चलता। या फिर कोई भ्रमणशील सन्यासी हों जो विभिन्न स्थानों पर अपने जाने के उपलक्ष्य में ऐसा उत्कीर्ण कराते रहें हो। मगर इसमें नाम तो समझ मे आता है; 700 की पहेली बनी रहती है। दूसरी बात नाम उत्कीर्ण कराना दीवारों में समझ में आता है मगर कहीं यह मूर्तियों के पादतल पर भी यह अंकित है(जैसा कि पचराही में)। राय बहादुर हीरालाल के अनुसार ‘देऊरबीजा’ में शिवलिंग पर ‘मगरध्वज’ अंकित है।शिवलिंग पर किसी ‘व्यक्ति विशेष’ का नाम अंकित करना सहज नही लगता. क्या इसका शिव से कोई संबंध हो सकता है?

बहरहाल इसमें और जानकारी और शोध अपेक्षित है।
श्री जीतमित्र प्रसाद सिंहदेव के अनुसार रतनपुर के कलचुरियों के समय मे यह प्रथा प्रचलित थी कि मंदिर निर्माण करने वाले राजा, रानी, राज्य परिवार के संबंधी एवं अधिकारी अपनी प्रतिमा मंदिर में स्थापित करते थे. भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह में भी ऐसी प्रतिमा है,जो राजपुरुष ही प्रतीत होता है, लेकिन उसमें कोई शिलालेख न होने से ज्ञात नही होता कि प्रतिमा किसकी है.बहुत सम्भव है यह मंदिर निर्माता की ही हो।

कुछ समस्याएं

हमने विस्तार भय की दृष्टि से अपने लेख में केवल मंदिर निर्माता पक्ष पर ही अपने सिमित अध्ययन की सीमा समझते हुए विचार किया हैं, इसमें और अध्ययन की जरूरत है.दरअसल भोरमदेव के इतिहास को और अधिक स्पष्ट करने के लिए आस-पास के क्षेत्र में(खासकर प्राचीन गढ़ी के अवशेष के पास) उत्खनन की आवश्यकता है.इसके अतिरिक्त उपलब्ध शिलालेखों का अनुवाद प्रकाशित होना चाहिए. हमारी जानकारी में योगी की मूर्ति के अभिलेख का ही अनुवाद उपलब्ध है, जबकि सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मड़वा महल अभिलेख और दक्षिणी प्रवेश द्वार के अभिलेख का अनुवाद उपलब्ध नही है, हलाकि उसमे लिखित बातों का जिक्र होता है, लेकिन संपूर्ण अनुवाद उपलब्ध होने से नयी जानकारी मिल सकती है.इसके अलावा कुछ बिखरे हुए और अस्पष्ट अभिलेख हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए.पचराही के उत्खनन से एक नयी उम्मीद जगी है, फणिनागवंशियो का इतिहास उभर कर सामने आने लगा है जरूरत इस कार्य को और आगे बढ़ाने की है.

 

फणिनागवंशियो की वंशावली

मड़वा महल अभिलेख सम्वत 1406 (1349 ई.)के अनुसार फणिनागवंशियो की वंशावली इस प्रकार है
(1) अहिराज (2) राजल्ल (3) धरणीधर (4) महिमदेव (5) सर्व वदन या शक्तिचंद्र (6) गोपालदेव (7) नलदेव (8) भुवनपाल देव् (9) कीर्तिपाल (10) जयत्र पाल (11) महिपाल (12) विषमपाल (13) ज(न्हु )(14) जनपाल (15) यशोराज (16) कन्नड़ देव् या वल्लभ देव् (17) लक्ष्मी देव् (18) खड्ग देव् (19) भुवनैकमल्ल (20) अर्जुन (21) भीम (22) भोज (23) लक्ष्मण देव् (24) रामचन्द्र

सन्दर्भ
—-
(1) भोरम देव्- डॉ सीताराम शर्मा
(2) भोरमदेव प्रदर्शीका- डॉ गजेंद्र चंद्रौल
(3)Excavation at Pacharahi- S.S Yadaw ,Atul pradhan
(4)कंनिघम सर्वे रिपोर्ट भाग 17, राय बहादुर हीरालाल की सूचि,शरद हलवाई का लेख
(5)अष्टराज अंभोज-धनुक लाल श्रीवास्तव
(6) दक्षिण कोशल का सांस्कृतिक इतिहास- जीतमित्र प्रसाद सिंहदेव
(7) मध्यप्रदेश का इतिहास- राय बहादुर डॉ हीरालाल
(8)छत्तीसगढ़ का इतिहास- प्रो. रमेन्द्र नाथ मिश्र
(9)इस्क्रिप्सन इन सी.पी. एंड बरार-राय बहादुर हीरालाल


अजय चंन्द्रवंशी,राजमहल चौक,
फुलवारी के सामने कवर्धा, जिला ,कबीरधाम(छ ग.)
मो-9893728320

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