कला साहित्य एवं संस्कृति

पुरातात्विक अध्यन ःः  ईंंट   निर्मित शिव मंदिर : भोरमदेव मंदिर प्रांगण ःः  अजय चंन्द्रवंशी कवर्धा 

15.02.2019

भोरमदेव मंदिर की परिसीमा में ही मुख्य मंदिर के पार्श्व में उत्तर की ओर दो मीटर की दूरी पर एक ईंट निर्मित शिव मंदिर विद्यमान है। यह मंदिर भी पूर्वाभिमुख है। तल विन्यास की दृष्टि से इसके मंडप एवं गर्भगृह दो अंग हैं। इसका मंडप मूलतः छः स्तंभों पर आधारित था। वर्तमान में बायें पार्श्व के केवल तीन स्तम्भ ही सुरक्षित हैं, बांकी पूरा मंडप ध्वस्त हो चुका है। मंडप का फर्श सफेद रवेदार प्रस्तर पट्टों से निर्मित है जो आंगन से 34 से.मी. ऊंचा है। मंडप में गर्भगृह की ओर मुंह किये हुये एक नन्दी बैठा हुआ है।
गर्भगृह का प्रवेश द्वार काले प्रस्तर से निर्मित है; जिसके दोनो पार्श्व के निचले आधे हिस्से सपाट हैं। ऊपरी हिस्से अलंकृत हैं, जिसमे अलंकृत घट अंकित है। द्वार के ललाट बिम्ब में चतुर्भुजी गणेश उत्कीर्ण है।गर्भगृह वर्गाकार(2.60×2.60 मी.) है। इसके मध्य में मात्र जलाधारी है, मूल शिवलिंग अपने स्थान पर नही है जो सम्भवतः विनष्ट हो चुका है। गर्भगृह की दीवारें सपाट एवं सादी हैं, अलंकरण के रूप में मंदिर के बाह्य भित्तियों पर मूर्तियों अथवा कलात्मक अभिप्रायों का अंकन नही हुआ है। बाह्य भित्तियों पर रथिकाएँ उभरी हुई हैं।मंदिर का शिखर भाग ध्वस्त हो चुका है।

यह मंदिर गुप्तकालीन ईंटो के मंदिर की परंपरा से निर्मित हुआ है। इसका निर्माण लगभग 9वी शती ईसवी में प्रतीत होता है। ईंटो के मंदिर का इससे पूर्ववर्ती सुंदर उदाहरण छत्तीसगढ़ में ही सिरपुर का आठवी शती में निर्मित लक्ष्मण मंदिर है।

इस मंदिर के बारे में कनिंनघम(1881-82)ने लिखा है


Immediately to the Noth of Boram Deo there is an old red brick temple of peculiar plan, which was first noticed by Mr. Beglar in the Great Temple of Udayapur in Malwa. There are the usual projections on each of the three faces of the sanctum, but the short angular projections which join the faces are not right angles as is usual, but acute and obtuse angles, whose points are laid out on the circumference of a circle. In the Udayapur and the other examples given by Mr. Beglar, these projections are all acute angles of equal size; but the present case is quite unique, as the central angular projection is larger than the projection on each side. The points of the angles also are broken by two indents, which add very much to the general effect of the exterior view of the building.
This brick temple apparently had no Mandap, but simply a porch in front of the entrance on the east. The sanctum, however, is of the same size as that of Boram Deo, and the tower would, therefore, have been of about the same height. But the upper half of the tower is entirely gone, and only a few carved bricks, which were found in clearing away the surrounding rubbish, now remain to show that the exterior was not quite plain.
The porch, or entrance to the sanctum, was built entirely of stone, of wich one outer pillar and three pilasters still remain standing. Inside there is an Argham in situ, which shows that this was a Lingam shrine dedicated to Siva. A small group of Hara-Gauri also declares the same thing. There is a second group of a king and queen with crowns on their heads, and their hands joined in an attitude of worship. This group most probably represent the founder of the temple. There is nothing to show the age of the building; but it is probably of about the same age as Boram Deo.”

कनिंनघम ने मंदिर के स्थापत्य की विशिष्टता का उल्लेख किया है, जिसमे मंदिर के तीनों तरफ के बाह्य उभार (रथिकाएँ) सामान्य योजना में हैं, मगर तीनो को जोड़ने वाला छोटा कोणीय उभार समकोण में न होकर न्यून और अधिक कोण में है। जिसके नोक वृत्त के परिधि में हैं तथा केंद्रीय कोणीय उभार दोनो तरफ के उभारों से बड़ा है। मंदिर में ‘अर्घ’ स्थित होने से कनिंनघम ने इसे शिव मंदिर कहा; तथा प्रांगण में हर-गौरी की मूर्तियों को इससे सम्बद्ध माना। राज-पुरुष दम्पति की एक अन्य हाथ जोड़े मूर्ति को उन्होंने इस मंदिर के निर्माता होने की संभावना बताई है। यह मूर्ति भी मुख्य शिव मंदिर के गर्भगृह में रखी हुई है, जो काले प्रस्तर निर्मित राज-पुरुष दम्पति के अतिरिक्त है।
मुख्य मंदिर के सभामंडप में रखी योगी की मूर्ति में अन्य अभिलेखों के अलावा “उमा माहेस्वर सुन्दरतरं… साधु धांगु सुतेन कारितं” उत्कीर्ण है। स्पष्ट इसमें उमा महेश्वर की सुंदर प्रतिमा का धांगु के पुत्र साधु द्वारा बनाये जाने का उल्लेख है। वी.वी. मिराशी ने इस मूर्ति(योगी की) को पूर्व में इस मंदिर में होने की सम्भावना व्यक्त की है, तथा इसमें उल्लेखित उमा-महेश्वर को इसी मंदिर से सम्बंधित होने की संभावना व्यक्त किया है।

इस मंदिर के गर्भगृह ने जमीन में धसा हुआ खण्डित बृहत जलहरी है जिसे जनमानस ने नगाड़ा कहा जाता रहा है।

एक विलुप्त (विनष्ट) मंदिर

बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि ईंट निर्मित शिव मंदिर के बगल में(उत्तर दिशा,वर्तमान काली मंदिर के आस-पास) उससे लगा हुआ एक छोटा ईंट निर्मित मंदिर था जिसके अब अवशेष के चिन्ह भी नही हैं। काल के प्रवाह में सब कुछ विनष्ट हो गया है। इस मंदिर के बारे में हमे जानकारी कनिंनघम के विवरण से मिलता है। कनिंनघम जब भोरमदेव(1881-82) भोरमदेव आये थे, तब इसके अवशेष विद्यमान थे। उन्होंने लिखा है-


Close by there is a small brick temple in ruins. All the front portion is gone, and only the brick wall and parts of the two side walls now remain. This temple was, however, a very small, as the sanctum was only 4.5 feet square inside, and only 8 feet square outside. It’s dome was formed by overlapping bricks, in 15 laps of two bricks each, the bricks bring 12 by 6.5 by 2.75 inches.”

पुरातत्व विभाग यदि उस स्थल का उत्खनन कराये तो मंदिर की नींव और अन्य पुरातत्व सामाग्री प्राप्त होने की संभावना है।

संदर्भ

(1) कनिंनघम आर्कियोलॉजी सर्वे रिपोर्ट, भाग 17- ए. कनिंनघम (1882)
(2) कार्पस इस्क्रिप्सन इंडिकेटम वाल्यूम 04, पार्ट 02- वी. वी. मिराशी(1955)
(3) भोरमदेव मंदिर प्रदर्शिका -डॉ गजेंद्र चंद्रोल(1984)
(4) भोरमदेव- डॉ सीताराम शर्मा(1989)

 

#अजय चन्द्रवंशी, फुलवारी चौक, वार्ड नं 09 कवर्धा
मो. 9893728320

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