कला साहित्य एवं संस्कृति दस्तावेज़

पुरातत्व दस्तावेज़ : हरमो  का सतखंडा महल : अजय चंन्द्रवंशी

15.01.2019

भोरमदेव क्षेत्र में फणिनागवंश का शासन भोरमदेव मंदिर के कारण प्रसिद्ध है.लेकिन कोई भी साम्राज्य चाहे कितना ही छोटा क्यों न हो, शासक वर्ग, नागरिक, सैनिक वर्ग भी होते हैं. भोरमदेव क्षेत्र में इस साम्राज्य के अवशेष बिखरे पड़ें हैं. मड़वा महल, छेरकी महल, के अलावा मंदिर के दक्षिण-पश्चिम में सम्भवतः राजाओं के रहवास जिसे रानीगढ़ी या महल कहा जाता है, स्थित है. इसी तरह राजाबेंदा, पचराही, सहसपुर, हरमो आदि स्थानों पर भी इस साम्राज्य के अवशेष प्राप्त होते हैं.

 

हरमो भोरमदेव के दक्षिण दिशा में लगभग पांच किलोमीटर पर पहाड़ की तलछटी पर एक छोटा सा गांव है, जो फणिनागवंशी कालीन पुरातात्विक अवशेष के लिए प्रसिद्ध है. दरअसल यहां ईंटो से निर्मित चार मंजिला इमारत है जिसकी तीन मंज़िल सुरक्षित है, मगर चौथा मंज़िल ध्वस्त हो चुका है.सम्भव है चार से अधिक मंज़िल भी रहे हों.स्थानीय जनश्रुति में इसे सतखंडा महल या देउर कहा जाता है, और माना जाता है कि यह सात मंजिला था, जिसकी ऊंचाई पास के पहाड़ के ऊंचाई के बराबर थी. वैसे जनश्रुति में पुराने भवन या महल को सतखंडा महल कहने की प्रवृत्ति रही है.पूरा भवन ईंटो से निर्मित है.ईंट काफी बड़े आकार के और चपटे हैं, जिनकी जोड़ाई और पलस्तर चुना सदृश्य मिश्रण(मसाला) से हुआ है. लोहे का प्रयोग कहीं पर भी दिखाई नही देता, छत ढलाई में भी. उत्तर की तरफ बरामदा था, जो अब ध्वस्त हो चुका है, जिसका मलबा दबा हुआ है. भवन के मध्य में एक हॉल तथा दो कमरे हैं. सभी मंजिलों का स्वरूप ऐसा ही है.कमरों में बड़े-बड़े आले बने हुए हैं, जो शस्त्र रखने के लिए उपयोग में लाये जाते रहे होंगे. दूसरे मंजिल में जाने के लिए बने सीढ़ी तीव्र ढाल वाले तथा सकरे हैं, जो इसके सुरक्षात्मक उपयोगिता को सिद्ध करते हैं. ऊपर मंजिल के चारो तरफ दरवाजे हैं, जो आक्रमण के लिए उपयुक्त प्रतीत होते हैं. लेकिन भूतल में उत्तर के तरफ ही दरवाजे हैं. भवन पूर्व से पश्चिम लगभग 21 मीटर लंबा तथा उत्तर से दक्षिण लगभग 10 मीटर चौड़ा है. ऊंचाई लगभग 45 फीट है.

 

कुल मिलाकर भवन के स्थापत्य को देखने पर यह सुरक्षा चौकी जैसा प्रतीत होता है, जिसमे सीमित संख्या में सैनिक रहते रहे होंगे. हरमो शब्द पर ध्यान दे तो यह संस्कृत के हर्म्य, जिसका अर्थ प्रासाद या भवन होता है से ध्वनि साम्य रखता है और उससे अपभ्रंषित लगता है. भवन के पास ही पुराना कुआँ है, जो पानी के जरूरत पूर्ति करता रहा होगा. सम्भव है भोरमदेव साम्राज्य के लिए दक्षिण दिशा से खतरा अधिक रहा हो.श्री शरद हलवाई ने एक जनश्रुति का उल्लेख किया है जिसके अनुसार “यहां नागवंशी राजाओं ने बाहरी आक्रमणकारियों के साथ युद्ध किया था.

 

पराजित होने पर पहाड़ के किनारे-किनारे दक्षिण की ओर भागे थे. उसी के अनुरूप इस ओर प्रत्येक ग्रामों में भोरमदेव के देवताओं के शरण लेने की कथा प्रचलित है.आज भी ग्रामवासी इन देवताओं की ग्रामदेव के रूप में पूजा करते हैं”.

 

मैंने 2003 में हरमो के एक बुजुर्ग से ‘सतखंडा महल’ के बारे में चर्चा की तो उसने जो जनश्रुति बताया उसके अनुसार “हरमो का राजा मण्डला के राजा के यहां रोज बैठने जाता था.वहीं रोज भोजन करते थे.एक दिन मण्डला का राजा शिकार खेलने गया था, तो हरमो का राजा वापस आ गया, लेकिन अपना जूता वहीं भूल गया और बदले में खर्री(चमड़ा) का जूता ले आया. मण्डला का राजा वापस आया तो उसे उसी सूरत में लाने को कहा तो सैनिक उसका (हरमो) के राजा का सिर काटकर ले आएं, तब वहां (मंडला) के राजा ने क्रोधित होकर उन्हें मरवा दिया”. इस जनश्रुति से इतना अनुमान तो लगाया ही जा सकता है कि भोरमदेव के राजाओं का मंडला ने राजाओं से सम्बन्ध रहा होगा.प्रारम्भ में फणिनागवंशियों का मण्डला के गोड़ वंशीय शासको से कैसा सम्बन्ध था इसकी जानकारी नही मिलती.

 

यह माना जाता है कि वे रतनपुर के कलचुरियों के करद राज्य रहे होंगे.कलचुरियों के पतन के बाद गढ़ा मण्डला के संग्राम साह के समय52 कीलों को जीता गया और कवर्धा उनके अधीन हो गया. 1751 में कवर्धा रियासत की स्थापना महाबली सिंह ने मण्डला के शासक के सहयोग से ही किया था.

 

भवन चौदहवी-पंद्रहवी शताब्दी से पहले का प्रतीत नही होता, जो अब जर्जर होता जा रहा है, मगर अब तक इसके संरक्षण का कोई प्रयास नही दिखाई देता, जो अत्यावश्यक है. दूसरी बात इस क्षेत्र के विस्तृत पुरातात्विक सर्वेक्षण और अध्ययन की आवश्यकता है.

अजय चन्द्रवंशी
राजा फुलवारी चौक,
वार्ड नं.09 कवर्धा(छ. ग.)
मो. 9893728320

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