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पुण्यतिथि पर अनुपम भाई की याद :उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ रही है / गोपाल राठी के संस्मरण

18.12.2017

मुझे याद आ रहा है कि अस्सी के दशक में होशंगाबाद जिले में नर्मदा की सहायक नदी तवा नदी पर बने विशाल बाँध से आने वाली खुशहाली से लोग फूले नही समा रहे थे l तवा की नहरों से सिचाई शुरू होते ही पानी की रिसन से जगह जगह भूमि दलदल बनने लगी थी l होशंगाबाद –इटारसी के पर्यावरण प्रेमियों ने इस खतरे को पहचाना और मिटटी बचाओ अभियान की शुरुआत हुई l इस पहल में अनुपम भाई का पूरा सहयोग और मार्गदर्शन रहा l होशंगाबाद जिले से अनुपम मिश्र जी का विशेष लगाव इसलिए था कि यह उनके पिता भवानीप्रसाद मिश्र की जन्म और कर्म भूमि रही है l

इनका जन्म महाराष्ट्र के वर्धा में सरला मिश्र और प्रसिद्ध हिन्दी कवि भवानी प्रसाद मिश्र के यहाँ सन् १९४८ में हुआ। उस समय इनके माता पिता गांधीजी के आश्रम सेवाग्राम में रहते थे l

जाने माने लेखक, संपादक, छायाकार और गांधीवादी पर्यावरणविद् अनुपम मिश्र पर्यावरण-संरक्षण के प्रति जनचेतना जगाने और सरकारों का ध्यानाकर्षित करने की दिशा में वह तब से काम कर रहे थे , जब देश में पर्यावरण रक्षा का कोई विभाग नहीं खुला था। आरम्भ में बिना सरकारी मदद के अनुपम मिश्र ने देश और दुनिया के पर्यावरण की जिस तल्लीनता और बारीकी से खोज-खबर ली है, वह कई सरकारों, विभागों और परियोजनाओं के लिए भी संभवतः संभव नहीं हो पाया है।

उनकी कोशिश से सूखाग्रस्त अलवर में जल संरक्षण का काम शुरू हुआ जिसे दुनिया ने देखा और सराहा। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश काबिले तारीफ रही है।

इसी तरह उत्तराखण्ड और राजस्थान के लापोड़िया में परंपरागत जल स्रोतों के पुनर्जीवन की दिशा में उन्होंने अहम काम किया है।

गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली में उन्होंने पर्यावरण कक्ष की स्थापना की। वह इस प्रतिष्ठान की पत्रिका गाँधी मार्ग के संस्थापक और संपादक रहे ।

उन्होंने बाढ़ के पानी के प्रबंधन और तालाबों द्वारा उसके संरक्षण की युक्ति के विकास का महत्त्वपूर्ण काम किया ।

वे 2001 में दिल्ली में स्थापित सेंटर फार एनवायरमेंट एंड फूड सिक्योरिटी के संस्थापक सदस्यों में से एक थे ।

चंडी प्रसाद भट्ट के साथ काम करते हुए उन्होंने उत्तराखंड के चिपको आंदोलन में जंगलों को बचाने के लिये सहयोग किया था।

वह जल-संरक्षक राजेन्द्र सिंह की संस्था तरुण भारत संघ के लंबे समय तक अध्यक्ष रहे | 2009 में उन्होंने टेड (टेक्नोलॉजी एंटरटेनमेंट एंड डिजाइन) द्वारा आयोजित एक सम्मेलन को संबोधित किया था।

आज भी खरे हैं तालाब के लिए 2011 में उन्हें देश के प्रतिष्ठित जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया। आज भी खरे हैं तालाब के लिए ही उन्हें केंद्रीय हिंदी संस्थान का विज्ञान लेखन हेतु राष्ट्रीय पुरस्कार भी दिया गया।अनुपम मिश्र ने इस किताब को शुरू से ही कॉपीराइट से मुक्त रखा था।

1996 में उन्हें देश के सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार इंदिरा गांधी पर्यावरण पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था l

2007 – 2008 में उन्हें मध्य प्रदेश सरकार के चंद्रशेखर आज़ाद राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

इन्हें एक लाख रुपये के कृष्ण बलदेव वैद पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया l

दो वर्ष पहले संदर्भ पत्रिका के सौवें अंक के विमोचन के अवसर पर भारत भवन भोपाल में आपने स्लाइड शो के माध्यम से जल के परम्परागत जल स्रोतों , जल संचय तरीके और उसके विज्ञान को बहुत सरल ढंग से समझाया था l उनका वक्तव्य खत्म होने के बाद जब मैं माइक पर बोल रहा था तब वे बड़े सकुचाते हुए फिर से मेरे बगल में आकर खड़े हो गए और बोले मुझे कुछ और कहना है जो छूट गया था

सचमुच बहुत कुछ छूट गया है आपके जाने से

सादर नमन

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