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पाकिस्तान की कवयित्री अज़रा अब्बास की कविताएँ

आज नवरात्र के पाँचवे दिन पाठकों के लिए प्रस्तुत है, पाकिस्तान की कवयित्री अज़रा अब्बास की सरल सी लगने वाली दो कविताएँ.

आज की पहली कविता का शीर्षक है ” मेज़ पर रखे हाथ “ इसे लिखा है पाकिस्तान की कवयित्री अज़रा अब्बास ने और इसका उर्दू से अनुवाद किया है सलीम अंसारी ने.

पहली कविता

मेज़ पर रखे हाथ

मेज़ पर रखे हैं हाथ
हाथों को  मेज़ पर से उठाती हूँ
फिर भी पड़े रहते हैं
मेज़ पर ….

और हँसते हैं

मेज़ पर रखे
अपने ही दो हाथों को
हाथों से उठाना मुश्किल होता है

मैं हाथों को
दाँतों से उठाती हूँ
पर हाथ नहीं उठते

मेज़ पर रह जाते हैं

दाँतों के निशानों से भरे हुए
साफित (स्थिर)  और घूरते हुए

मैं भी हाथों को घूरती हूँ

मेज़ का रंग आँखों में भर जाता है

मैं आँखें बन्द कर लेती हूँ

सो जाती हूँ
मेज़ पर रखे हुए हाथों पर
सर रखकर ।

दूसरी कविता

माँ के कदमों के नीचे जन्नत है

क्या मेरे क़दमों के नीचे भी जन्नत है
पूछती हूँ अपने बच्चों से

मेरे सवाल पर वो मुझे हैरत से देखते हैं
माँ ये जन्नत क्या होती है ?

अरे ! ये मैं ने तुम को नहीं बताया

चलो सुनो
कहते हैं जो माँ अपने बच्चों को अपने दिल के क़रीब रखती है
उसे जन्नत मिलती है

माँ हम क्या जाने तुम्हारे दिल में क्या है
हम क्या जाने जन्नत क्या है

हम तो ये जानते हैं
तुम हमारे दिल के क़रीब हमेशा घूमती हो
कभी हँसते हुए
कभी हमारी परेशानियों पर रोते हुए
तुम ने हमेशा हमारे लिए
हमारी ख़ुशियों की जन्नत बनाई

माँ बताओ तो
ये जन्नत क्या है ?

दूसरी कविता जो एक कहावत पर है कि मां के पैरों के नीचे स्वर्ग है इस मान्यता पर है. यह स्वर्ग की किसी मिथकीय धारणा पर प्रहार करती है. यह कविता मैंने ‘रेख़्ता’ कोश से ली है.

“अपना हाथ मुझे दो ” और “मेज़ पर रखे हाथ ” में जो मूलभूत अंतर है उसकी तलाश आप यहाँ कर सकते हैं. इसमें एक लेखक की विवशता, उसकी लेखकीय स्वतंत्रता, देश की राजनैतिक स्थिति आदि को देखने का प्रयास करें.

यह कविता और कवि परिचय मैने ज्ञानरंजन जी की पत्रिका “पहल” से लिया है और ज्ञान जी ने इसका चयन पाकिस्तान के शायर व आलोचक अहमद हमेश की पत्रिका “तशक़ील” से किया है.

अज़रा अब्बास ए बारे में – अज़रा अब्बास पाकिस्तान में नई पीढी की कलमकार हैं. अपनी आत्मकथा “मेरा बचपन” में उन्होने स्त्री होने के समसामयिक दुखों को झेलते हुए रूढ़ीवादी पाकिस्तानी समाज से कड़ा संघर्ष किया है. 1970 में उनका साहित्यिक सफ़र प्रारम्भ हुआ और उसी के साथ उनका विद्रोही हिस्सा प्रकट हुआ. अज़रा अब्बास की शैली में एक खुरदुरापन, गति और आक्रामकता है

नज़्म: अज़रा अब्बास
अनुवाद : सलीम अंसारी
संकलन व प्रस्तुति : शरद कोकास

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