कला साहित्य एवं संस्कृति

पहचान के संकट से जूझते यूनूस की कहानी, अनवर सुहैल का उपन्यास “पहचान”

Anwar Suhail अनवर सुहैल

पुस्तक समीक्षा : अजय चंद्रवंशी (कवर्धा, छत्तीसगढ़)

आदमी की पहचान क्या है? उसकी जाति? मज़हब? पद, प्रतिष्ठा, या काबिलियत? आदमी इन द्वंद्वों में जीता रहा है। सामंती समाजों में जाति भी पहचान का महत्वपूर्ण कारक होता है,और वह आर्थिक स्थिति को भी प्रभावित करता है;बावजूद इसके व्यक्ति का आर्थिक वर्ग ही उसकी मुख्य पहचान बनता रहा है; मगर पिछले कुछ दशकों से साम्प्रदायिक राजनीति के उभार ने मज़हब को अस्मिता से जोड़कर उसे आदमी की ‘मुख्य पहचान’ बनाने की कोशिश की है; और बहुत हद तक सफल भी रहा है।इसके दुष्परिणाम कितने भयावह रहे हैं, यह किसी से छुपा नही है। मगर ‘अपने मज़हब’ के भीतर भी ऊंच-नीच के संस्तरण रहते हैं, और यहां भी आदमी की पूछ-परख उसके आर्थिक हैसियत के आधार पर होती है।

अनवर सुहैल जी का उपन्यास ‘पहचान’  में पहचान का यह द्वंद्व उभरकर आया है। उपन्यास का मुख्य पात्र ‘यूनुस’ निम्न वर्गीय मुस्लिम युवक है। पारिवारिक विडम्बना से ‘खाला’  के यहां रहता है। उनकी स्थिति भी लगभग वही है; जैसे-तैसे घर चल रहा है। किशोरवय यूनुस खाला की बेटी सनूबर को चाहता है;वह भी उसे पसंद करती है। खाला के घर यूनुस ‘पराश्रित’ ही है। शिक्षा-दीक्षा से वंचित; जिसमे उसकी लापरवाही भी शामिल है। दरअसल वह जिस ‘माहौल’ में रहता है, वहां यह स्वाभाविक है।गरीबी, अशिक्षा और लापरवाही भी लाती है,जिसे समाज के सम्पन्न वर्ग ‘उनके संस्कार’ कह कर मजाक उड़ाते हैं। ऐसे में जीवन के अनुभव ही सब-कुछ सिखाते हैं। इनके लिए फुटपाथ ही कॉलेज और विश्वविद्यालय है। यूनुस भी इसी ‘विश्वविद्यालय’ से अपना ज्ञान अर्जित करता है। यह ज्ञान यौन-संबंधों से लेकर सामाजिक-आर्थिक हर प्रकार के होते हैं,जिसमे व्यक्ति जिंदा रहने का हुनर सीखता है। उपन्यासकर ने बेबाकी से इसका चित्र खींचा है। चूँकि कथानक मुख्यतः मुस्लिम समाज से सम्बंधित है, इसलिए चित्रण अधिकतर उसी परिप्रेक्ष्य में हुआ है। दूसरे ‘मजहबों’ को मानने वालों की जीवन शैली पर रहस्य का आरोपण करने वाले देख सकते हैं कि जीवन के जद्दोजहद हर जगह हैं।

यूनुस खाला के घर ‘बोझ’ न सही उन पर निर्भर तो है ही इसलिए अधिकार का दावा तो कर ही नही सकता। जल्द ही उसे इस बात का अहसास हो भी जाता है जब घर मे ‘जमाल साहब’ का प्रवेश होता है। जमाल साहब सम्पन्न हैं; अधिकारी हैं; अविवाहित हैं,उनका घर आना खुशनसीबी है। खाला उनमें अपना भावी दामाद देखती है। सनूबर भी उनके तरफ आकर्षित होने लगती है। उनके सामने यूनुस की क्या औकात?टूटता है दिल तो टूटा करे!जमाल साहब भी मंजे खिलाड़ी हैं; सनूबर से सम्बंध बनाने की कोशिश है तो खाला से भी याराना है। खाला का चरित्र भी ऐसा है कि यह तय कर पाना कठिन है कि इस सम्बंध की पहल जमाल साहब ने की होगी या खाला ने।लेखक ने खाला के चरित्र को जिस ढंग से उभारा है उसमें खाला काफी ‘बिंदास’ है। कमजोर आर्थिक स्थिति उसकी इच्छाओं से मेल नही खाती।नैतिकता-अनैतिकता के उनके अपने मापदण्ड हैं।

इन घटनाक्रमों से यूनुस का भ्रम टूटता है; मानो वह स्वप्नलोक से बाहर आता है। उसके आत्म सम्मान को चोट पहुँचती है । उसे अहसास होता है कि बिना अपने पैरों पर खड़े हुए दुनिया मे उसकी कोई पहचान नही है। सनूबर भी हकीकत से वाकिफ़ होती है यूनुस के प्रति उसका प्रेम बढ़ता है। यूनुस दर्जिगिरी से मोटर साइकिल मैकेनिक तक काम सीखने का अनुभव लेते हुए अंततः कोयला खदान में पेलोडर और पोकलेन ऑपरेटर बन जाता है। इस तरह वह आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ जाता और अपनी पहचान बनाने लगता है।यह जरूर कोई ‘बड़ी’ पहचान नही है, मगर छोटे-छोटे कदमो से भी सफर तय होता है और मंज़िल मिलती है।

यूनुस एक मुस्लिम युवक है; इसलिए उसे कई बार पहचान के संकट से गुजरना पड़ता है। उसे उसके मुस्लिम होने के कारण कई बार बहुसंख्यक वर्ग के अधीन ‘सेवायें’ नही मिल पाती; कई बार लोगो की दृष्टि बदल जाती है। अंततः इस ‘संकट’ से बचने के लिए वह अपनी पहचान छुपाने लगता है। अपना हुलिया इस तरह रखने लगता है कि जसकी धार्मिक पहचान न हो सके। उसका बड़ा भाई सलीम अपने ‘धार्मिक पहचान’ के कारण ही गुजरात दंगे में मारा जाता है। सलीम के माध्यम से लेखक ने मुसलमानों के एक वर्ग में भी  बढ़ते धार्मिक पहचान के प्रति अतिरिक्त आग्रह को रेखांकित किया है। इस तरह उपन्यास में संकेतो में कई जगह पहचान के इस द्वंद्व और संकट जो पिछले कुछ दशकों से वैश्विक और स्थानीय दोनो स्तरों पर उभर कर आया है;प्रकट हुआ है।

उपन्यास विधा की यह खासियत है कि इसमें कथानक के परिवेश को प्रकट करने के लिए लेखक के पास पर्याप्त स्पेस होता है। इस उपन्यास में भी लेखक ने सिंगरौली कोयला क्षेत्र के भूगोल,औद्योगिकरण, उसके उपजे संकट, क्षेत्र के सामाजिक ताने-बाने, रहन-सहन; खासकर कामकाजी वर्ग के जीवन को बहुत अच्छे ढंग से चित्रित किया है। परिवेश अनुरूप भाषा भी प्रवाहपूर्ण और ‘ठेठ’ है, जिससे पात्र जीवंत लगते हैं।कुल मिलाकर उपन्यास सार्थक है; जिसे पढ़ा जाना चाहिए।

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