नीतियां राजनीति

पसरती मंदी, बढ़ती गरीबी ट्रम्प की इमरजेंसी और रघुराम_राजन_की_क्रांति : बादल सरोज .

14.03.2019  

● पिछली तिमाही दुनिया का जो मोटा मोटा हाल बयान करके गयी है वह पूँजीवाद के वेतनभोगी ढिंढोरचियों और उनके कहे से गुमराह हुए भोले और भले लोगों के लिए कोई अच्छी खबर नहीं है । भारत की रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन के “पूँजीवाद विफल रहा है, हालात नहीं सुधरे तो क्रांति होगी ” निष्कर्ष ने इसे ऐसे व्यक्ति से एकदम दो टूक सूत्रबद्द करवाया है, जिनसे किसी ने भी कभी कोई उम्मीद नहीं की थी 

● पढ़ा लिखा होने की एक दिक्कत है ; यदि वे बिके हुए नहीं हैं तो खुद को धोखा नहीं दे सकते । उभरते तथ्य और सामने आते आंकड़ो के आधार पर वे अपने निष्कर्ष बदल भी सकते हैं । रघुराम राजन को दिखती क्रान्ति की सम्भावनाये और कुछ महीने पहले अमरिकी दार्शनिक फ्रांसिस फुकोयामा को 27 साल बाद हुआ “समाजवाद ही बचा सकता है मनुष्यता और पृथ्वी ” का अहसास ऐसे ही दो उदाहरण है ।

● ज्यादा विस्तार में जाए बिना यदि एकदम हाल के ही कुछ संकेत देख लें तो वजह साफ़ हो जाती हैं ।
आईएमएफ और विश्वबैंक दोनों की हाल की रिपोर्ट – अलग अलग आंकड़ों के बावजूद – इस चिंता पर एकमत हैं कि दुनिया भर में मंदी जारी है । इस मन्दी ने पूरे विश्व में अपनी निरन्तरता कायम रखी हुयी है । आईएमएफ के मुताबिक़ 2018 की वैश्विक विकास दर लगातार दूसरे अर्धांश में घटी है और कुल जमा 3.7 प्रतिशत रहने का अनुमान है । इसके अंदाजे से 2019 में यह और घट कर 3.5 प्रतिशत हो सकती है । विकसित अर्थव्यवस्थाओं में तो हाल और बुरे हैं । इनमे यह 2018 में मात्र 2.3 फीसद रही । अगली दो सालों में यह 2019 में 2 और 2020 में 1.7 फीसद रह जायेगी ।

● विश्व बैंक की ऐसी ही रिपोर्ट एक और चिंताजनक तथ्य देती है कि दुनियॉ भर में मैन्युफैक्चरिंग की हालत पिछले 27 महीनों के सबसे निचले स्तर पर पहुँच गयी है । वहीँ विश्व व्यापार के हाल और बुरे हैं । इसमें 2012 के बाद की सबसे तेज गिरावट दर्ज हुयी है जिसके 2017 के 5.4 प्रतिशत से गिरकर 2019 में 3.8 प्रतिशत हो जाने का अनुमान है ।

● ट्रम्प की अगुआई में अमरीका के चीन के साथ शुरू हुए व्यापार युध्द का भी इसमें एक योगदान है । मगर असल समस्या पूँजीवाद है । पूँजी का मुट्ठीभर हाथों में जमा होना और नतीजे में दरिद्रता का बढ़ना और परिणामस्वरूप बाजार में माल का न बिकना । समन्दरी जानवर ऑक्टोपस की तरह भूख में कुछ न मिलने पर अपनी ही भुजा खा लेने की चतुराई की भी तो आखिर एक सीमा होती है ।

● विश्व बैंक की रिपोर्ट इस मामले में भी जो तथ्य उजागर करती है वे चिंता और आशंकाओं से भरे हैं । इसके मुताबिक 2017 में दुनिया भर में कोई 82 करोड़ 10 लाख भूखे और कुपोषित लोग थे । यह संख्या 2014 के भूखो की तुलना में 5 फीसद अधिक थी । विश्व बैंक के अनुसार 2019 में खाने पीने की चीजों के दाम बढ़ेंगे और नतीजे में भूख और ज्यादा तादाद में पसरेगी। इस तादाद में एक और जोड़ जोड़ा जाना बाकी है ; उन मजदूरों का जो संगठित क्षेत्र के स्थायी रोजगार से असंगठित क्षेत्र में धकेल दिए जाएंगे ।

● अब तक के इतिहास का सबक है कि मंदी, गरीबी और वैश्विक आर्थिक संकट या तो इंकलाब लाता है या विश्वयुध्द ; या तो समाजवाद की ओर बढ़ता है या फासीवाद की तरफ । अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प का, खुद अमरीका में समाजवाद की उठती आवाज से बौखलाना । मैक्सिको की दीवार के बहाने अमरीका में राष्ट्रीय आपातकाल के क़ानून का सहारा लेना, वेनेज़ुएला में प्रति क्रांति को हवा देकर लैटिन अमरीका के वाकी देशों को रोकना, चीन से व्यापार युध्द लड़ते लड़ते भारत से जाने वाले माल पर छूट खत्म करना वगैरा एक तरह के प्रभाव हैं । वहीं सिर्फ अमरीका के बर्नी सैंडर्स और इंग्लैंड के जेरेमी कोर्बिन के खुले राजनीति एलान ही नहीं – इस तिमाही में फ्रांस, जर्मनी, बेल्जियम, आयरलैंड, हंगरी, ग्रीस, अर्जेंटीना, ब्राज़ील, खुद संयुक्त राज्य अमरीका, दक्षिण अफ्रीका, सूडान, जिम्बावे, ईरान और बनला देश सहित दुनिया भर में हुए तीखे संघर्ष और तेजी से उभर रहे जनता के आंदोलन दूसरी तरह की धारा हैं ।

● इस मंथन से ही आने वाली दुनिया के तात्कालिक और दूरगामी भविष्य की दिशाएँ निकलेंगी ।

● फुकोयामा से लेकर रघुराम राजन तक दीवार पर लिखी इसी इबारत को पढ़ रहे हैं जिसके हरूफ दिनों रोज मोटे और गहरे होते जा रहे हैं ।

 

बादल सरोज 

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठत नेता 

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