अभिव्यक्ति राजनीति

पत्रकार विपक्ष में बैठना सीखे और चौथा पाया बनने से बचे. ः उत्तम कुमार, संपादक दक्षिण कोसल.

 

3.12.2018

पत्रकार के रूप में हमारा दायित्व है कि हम खबर प्रकाशित करने से पहले तथ्यों के साथ बहुत एहतियात बरतें। लेकिन अधिकांश खबर ऐसे भी होते हैं जिन्हें उजागर करने के लिए मात्र साहस की जरूरत होती है जो तथ्यों के साथ आपके समक्ष उपलब्ध रहता है। अंतागढ़ टेपकांड प्रकरण में यही किया गया था। 30 दिसम्बर 2015 में छत्तीसगढ़ के अंतागढ़ उपचुनाव के दौरान हुए डील को लेकर खुलासा किया गया था कि सितंबर 2014 में हुए उपचुनाव में भाजपा ने पैसे देकर कांग्रेस उम्मीदवार को मैदान से हटा दिया था।

छत्तीसगढ़ के पीडब्ल्यूडी मंत्री राजेश मूणत ने एक ब्रिज का फोटो शेयर किया। इस तरह उन्होंने अपनी सरकार की कामयाबी गिनाने की कोशिश की। उस ट्वीट को 2000 लाइक मिले। बाद में पता चला कि वो तस्वीर छत्तीसगढ़ की नहीं, वियतनाम की है। बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के छत्तीसगढ़ दौरे के वक्त कांग्रेस बीजेपी से कुछ सवाल पूछना चाहती थी, लेकिन इन सवालों वाले विज्ञापनों को छापने से राज्य के तकरीबन सारे अखबारों ने इनकार कर दिया था। कांग्रेस का आरोप था कि मीडिया पर बीजेपी सरकार के दबाव के चलते उसके विज्ञापन नहीं छापे गए। ऐसे समय में हमारे बहादुर पत्रकार मालुम नहीं कहां थे?

 

चौथा पाया कहे जाने वाला मीडिया हमेशा राजनेता और सत्ता के कोपभाजन का शिकार होते रहा है। लेकिन अखबारनवीश अखबार से दूर हो जाता है और मालिक अखबारनवीश को अपने अंगुठे के नीचे गुलाम बना लेता है। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1975-77 के आपातकाल के दौरान जब सबके साथ प्रेस की भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का गला घोंट दिया था, तब देश का मीडिया, लालकृष्ण आडवाणी के प्रसिद्ध शब्दों में रेंगने लगा था, जबकि उसे सिर्फ झुकने के लिए कहा गया था। इंडिया टुडे टीवी पर करन थापर के शो को चैनल के प्रबंधन ने रोक लगा दी थी। यह बात सबको पता है कि करन थापर ने मोदी से 2002 के गुजरात दंगों को लेकर उनसे पूछे गए इंटरव्यू के दौरान उन्हें नाराज कर दिया था। कार्टूनिस्ट सतीश आचार्य को सरकार पर सवाल खड़े करने वाले कार्टूनों को लेकर अनेक असहमतियों के बाद मेल टुडे द्वारा बाहर का दरवाजा दिखा दिया गया था। पुण्य प्रसून वाजपेयी और मिलिंद खांडेकर को राजनीतिक दबाव के कारण एबीपी द्वारा बर्खास्त कर दिया गया था। ये कुछ ऐसे उदाहरण है जहां मीडिया में सीधे मालिक के रूप में सरकार हस्तक्षेप करती है.

 

इधर अमेरीका में कुछ और ही हो रहा है। वरिष्ठ संवाददाता जिम अकोस्टा के प्रेस पास निलंबित करने के फैसले को लेकर ज्यादातर अमेरिकी सीएनएन के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। पहली बात, अगर भारत में कोई कारोबारी सत्ता में बैठे लोगों को नाराज कर देता है तो नेताओं द्वारा उन पर आईबी, केंद्रीय जांच ब्यूरो, आयकर, कस्टम अधिकारियों या प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को छोड़ दिया जाता है।हाल ही में एक अखबार के सम्पादक ने कहा है कि छत्तीसगढ़ में पिछले 15 वर्षों में सीडी का जो खेल चल रहा है इस खेल के पीछे छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ही प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जिम्मेदार है। सरकार में बैठे आला अधिकारी विरोधी दलों का स्टिंग करने का जिम्मा पत्रकार को सौंप रहे है। साथ ही राज्य के वरिष्ठ भाजपा नेताओं में भी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर गहरा असंतोष है। खुलासे में कोरबा से भाजपा के लोकसभा सांसद बंशीलाल महतो ने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ सरकार और सरकार के मुखिया के कार्यप्रणाली पर अंगुली उठाई। उन्होंने कहा कि कांग्रेस नेता रामदयाल उइके दो करोड़ रुपए लेकर भाजपा में शामिल हुए थे.

 

इसके अलावा उन्होंने विधान सभा चुनाव में भाजपा की ओर से हर प्रत्याशी को साठ-साठ लाख रुपए दिये जाने और चालीस लाख रुपए समान खरीदी के लिये देने की बात भी स्वीकार की। एक अन्य खुलासे में नंदकुमार साय ने भी छत्तीसगढ़ सरकार के मुखिया रमन सिंह पर सीधे-सीधे सवाल खड़े किये। उन्होंने भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री सौदान सिंह के साथ भाजपा के कुछ मंत्रियों और बड़े नेताओं पर गौ-तस्करी का भी आरोप लगाया था।खुलासे में महासमुंद से भाजपा सांसद चंदूलाल साहू ने भी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर मुख्यमंत्री के साथ-साथ कुछ मंत्रियों की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किये। रायपुर के सांसद रमेश बैस ने बातचीत में सरकार के प्रति भारी असंतोष व्यक्त किया। इनमें से कई सांसद तो यहां तक कहते हैं कि सरकार में उनकी बात नहीं सुनी जाती ना ही प्रशासन का कोई अधिकारी उनकी बात मानता है। खुलासे में यह भी बताया गया कि पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी भाजपा को चुनाव जीतवाने का सौदा करते है। यह बात राज्यसभा सांसद और प्रदेश के पूर्व मंत्री रामविचार नेताम ने कही। विधायक देवजी भाई पटेल ने शराब बिक्री को लेकर सरकार का मकसद जाहिर किया.

 

देवजी के मुताबिक सरकार ने मद्यनिगम बनाकर शराब बेचने का जो फैसला किया है उससे करोड़ों का भ्रष्टाचार हो रहा है। इस पूरे खेल में कुछ शराब माफिया और सरकार के लोगों को सीधा फायदा हो रहा है।खुलासों में यह भी स्पष्ट किया कि सरकार के इस पूरे खेल में नौकरशाहों की कितनी भागीदारी है। मुख्यमंत्री रमन सिंह के चहेते अधिकारी और जनसंपर्क विभाग के आयुक्त राजेश सुकुमार टोप्पो कांग्रेस के नेताओं का स्टिंग कर सीडी बनाने के लिये वरिष्ठ पत्रकार से सौदा कर रहे है और यह कह रहे है कि इस काम को जल्द से जल्द पूरा करें। साथ ही वे यह प्रलोभन भी दे रहे हैं कि इसके एवज में आप जो काम बोले हो जाएगा साथ ही सीएम साहब के साथ भी आपकी बैठक करा दी जाएगी। इन पंक्तियों के साथ अनुराग ओझा रायपुर का उल्लेख करना चाहूंगा उन्होंने पत्रकार रूचिर गर्ग के कांग्रेस प्रवेश पर राजकुमार सोनी द्वारा लिखे लेख ‘जब सरकार तय करने लगे खबरें तब राजनीति में आना ही ठीक’ के जवाब में लिखा है कि अखबार दरअसल अखबार ही नहीं रहे किसी जमाने में छत्तीसगढ़ में गिनती के अखबार हुआ करते थे, और जनता का भरोसा उन पर इतना अधिक होता था, कि बिना उपहार, स्कीम चलाए अखबार बिका करते थे, आज का अखबार कारपोरेट सेक्टर का कारखाना हो चुका है, और संपादक बनना सफल बिजनेस रिटर्न देने वाला कर्मचारी बनना हो चुका हैं, रूचिर जी से मिलने का मौका मुझे भी मिला वह भी कठिन प्रयास से.

 

मैंने भी नवभारत में बचपन से लेकर आज तक कई कालम लिखा था, कुछ दिनों पहले वह नईदुनिया छोडक़र नवभारत आए थे, उनके आते ही लोकवाणी जैसा कालम जिसमें पाठक अपनी प्रतिक्रिया देते थे, बंद कर दिया गया। स्थानीय रचनाकार को हाशिए पर धकेल दिया गया, पूछने पर हाथ जोडक़र मैसज आता था,हमें माफ करें हम बाद में सोचेंगें वगैरह वगैरह जवाब दिया गया था। वे आगे लिखते हैं कि आपने सरकार और दबाव की बात कही पर मैं पूछता हूं ,जनता के पास आज कौन सा अखबार और संपादक खड़ा है? नजर घुमाकर देखेंगे तो पाएंगे सिर्फ व्यापार और स्वार्थ पर मीडिया के लोग लार टपकाते अधिकांश समय निकाल लेते हैं। सूचना देने वाले पत्रकारिता राय बनाने की कोशिश में तब्दील हो चुकी हैं। हो यह रहा है कि जब खुद पर आती है तो पीडि़त पत्रकार पास्टर निमोलर की कविता फिर वे मेरे लिए आए और तब तक कोई नही बचा था जो मेरे लिए बोलता… गुनगुनाने लगते हैं।

सरकार और कार्पोरेट जगत के बीच नाभि-नाल का संबंध है। हमारा देशीय व्यवस्था प्राकृतिक संसाधनों की लूट और व्याप्त भय की बुनियाद पर खड़ी है। पूंजीवाद देशी-विदेशी पूंजीपतियों, राजनेताओं, ब्यूरोक्रेट्स और जातिवाद के गठजोड़ से चलती है। जिससे चंद पूजीपतियों के पास अकूत संपत्ति जमा हो गई है और बहुसंख्यक जनता कंगाली काट रही है। उत्पादन के साथ जमीन, कारखाने तथा सेवा क्षेत्रों में पूंजीपतियों का कब्जा है, इसके समानता को लेकर जब पत्रकारिता की जाती है तो मीडिया और श्रमजीवी पत्रकारों के बीच दीवार खड़ी हो जाती है। भारत में ज्यादातर मीडिया मालिक दूसरे कारोबारों में भी शामिल हैं और उनके अखबार या टीवी चैनल वास्तव में उनके दूसरे व्यवसायों को लाभ पहुंचाने या उनकी रक्षा करने का एक जरिया बन गया है, जो ज्यादा मुनाफा देने वाले हैं। उनके हितों में चोट कार्पोरेट के साथ सरकार भी पसंद नहीं करती है। बताइए किस पत्रकार, संपादक और मीडिया हाऊस ने मजीठिया कमीशन को लागू करने की साहस दिखाई। अधिकांश पत्रकार अभी भी ब्राह्मणवर्णीय, जमींदारी और औपनिवेशिक मानसिकता वाले हैं, भले हमारा देश 1950 में गणतंत्र हुआ हो पत्रकार एक मंत्री या आईएएस अधिकारी के समक्ष हीन ग्रंथि से भरे होते हैं, जबकि पत्रकार उसकी कमजोरी को भलीभांति जानते हैं। मालिकों का सेवा बजाते हुए शायद ही कभी विरोध करने का वैसा साहस पत्रकार अथवा सम्पादक में होता है, जैसा साहस सीएनएन संवाददाता जिम अकोस्टा ने दिखाया है। निश्चित तौर पर अब हमें अपने प्रिंट तथा इलेक्टॉनिक मीडिया के साथ टैग करना होगा कि सरकार और कार्पोरेट जगत से पत्रकारिता को बचाओ.

**

उत्तम कुमार ,संपादक .दक्षिण कोसल 

abhibilkulabhi007@gmail.com
dakshinkosal.mmagzine@gmail.com

Related posts

रतनजोत घोटाले में पूर्व भाजपा सरकार में कृषिमंत्री रहे बृजमोहन अग्रवाल के करीबी गिरफ़्तार

News Desk

टोनही प्रताडऩा के मामले फास्ट ट्रेक कोर्ट में चलाया जाये : डॉ. दिनेश मिश्र

News Desk

छत्तीसगढ़ में नहीं किया किसी पत्र ने कवर पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के संबोधन को.

News Desk