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पत्थलगांव : वनाधिकार कानून पर विस्थापन के खिलाफ़ राष्ट्रपति को सोंपा ज्ञापन .

ऐतिहासिक अन्याय को सुधरने के लिए बने कानून पर ऐतिहासिक अन्याय.

27.02.2019/ पत्थलगांव / याकूब कुजुर की रिपोर्ट 

 

पत्थलगाँव में एस टी, एस सी, ओ बी सी मंच ने महामहिम राष्ट्रपति के नाम अनुविभागीय अधिकारी को ज्ञापन सौंप कर वन अधिकार कानून 2006 पर माननीय उच्चतम न्यायालय के फैसले की त्रुटियों की ओर इंगित किया। यह कानून ऐतिहासिक अन्याय को सुधरने के लिए बनाया गया था। क्या था ऐतिहासिक अन्याय ? यह कि सदियों से गाँव की सीमा के भीतर वनों पर आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों का अधिकार था जिसे कि उपनिवेशी सरकार ने छीन लिया था।

इसी अन्याय को सुधारने यानि पुनः उन्हें अधिकार देने के लिए यह कानून था। हर गांव की अपनी परंपारिक सिमा थी और उस सीमा के भीतर जो कुछ था उसका उपयोग ग्रामवासी करते थे इसी की मान्यता कानून ने दिया था। कानून ने इन लोगों के लिए दो प्रकर का अधिकार दिया था, पहला व्यक्तिगत जिसे ‘क’ फर्म द्वारा प्राप्त किया जाता है। जिन्होंने व्यक्तिगत अधिकार के लिए दावा भरा था उनमें से कुछ का दावा निरस्त किया गया, जिसका कि कारण बतलाना जरूरी था, नहीं बतलाया गया। कई लोगों का तो प्रारभ में ही दावा नहीं लिया गया।

दूसरा सामुदयिक अधिकार -प्रारूप ‘ख’ निस्तारी जमीन पर अधिकार आदि और प्रारूप ‘ग’ सामुदायिक वन संसाधनों के लिए अधिकार, जिसमें परंपारिक सीमा निहित है।

जशपुर जिले में तो सामुदायिक अधिकार के लिए प्रक्रिया ही नहीं कराया गया है। कोई गांव सामुदायिक अधिकार के लिए दावा पेश नहीँ किया है, क्योंकि शासन की ओर से कोई मदद नहीं की गई है।

ऐसा लगता है उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में सिर्फ व्यक्तिगत अधिकारों की ओर ध्यान दिया है सामुदायिक की ओर नहीं। पर वन अधिकार तो सामुदायिक अधिकार की भी बात करता है। और जब तक दोनों प्रकार के अंधकारों का निपटारा नहीं होता है कोई विकास कार्य के लिए जमीन नहीं ली जा सकती वो भी सिर्फ ग्राम सभा की अनुमति से। पाचवीं अनुसूचित क्षेत्रों में रूढ़ि प्रथा को कानूनी बल प्राप्त है, उसे भी कैसे न्यायालय अनदेखा कर सकता है? पेसा कानून स्वशासन पर बल देता है उस पर भी कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

उच्चतम न्यायालय ने पक्ष रखने का मौका न देकर एक तरफा कर्रवाई की है। यह निर्णय आदिवासियों और अन्य परम्परागत वन निवासियों के हितों के खिलाप है। न्यायालय ने निरस्त दावों के क्षेत्रों को खाली करने के लिए कहा है पर नहीं बताया है कि ये लोग कहां जाएंगे। यह निर्णय दुर्भावनापूर्ण प्रतीत होता है, इस पर पुनर्विचार किया जाना जरूरी है। अन्यथा शासन प्रशासन और न्यायपालिका से लोगों का विश्वास उठ जाएगा।

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