कला साहित्य एवं संस्कृति

नासिर अहमद सिकंदर की कुछ कविताएँ …….दस्तक

 

 

दस्तक समूह में आज प्रस्तुत नासिर अहमद सिकंदर की कवितायें

शरद कोकास की टिपण्णी 

मित्रों सुप्रभात

आज भाई नासिर अहमद सिकंदर की बारी है . नासिर भाई का जन्म 15 जून 1961 को हुआ ,वैसे जन्म की सही तारीख है 16 अक्तूबर । शिक्षा बी. एस. सी ( गणित ) तक हुई । उनकी *प्रकाशित पुस्तके हैं ’ जो कुछ भी घट रहा है दुनिया में ‘ (कविता संग्रह ) ; इस वक्त मेरा कहा ‘(कविता संग्रह ) ; भूलवश और जानबूझकर (कविता संग्रह ); अच्छा आदमी होता है अच्छा ( कविता संग्रह ) खोलती है खिड़की ( काव्य पुस्तिका) ; कुछ साक्षात्कार ( प्रसिद्ध लेखकों से लिये साक्षात्कार ) ; बचपन का बाइस्कोप ( आलोचना ) ⃓

उनके आलेख , समीक्षायें , रिपोर्ताज , फीचर आदि देश की महत्वपूर्ण पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं । ‘दैनिक नवभारत ‘ में युवा कविताओं पर आधारित स्तम्भ ‘ अभी बिलकुल अभी’ एवं साक्षात्कारों पर केन्द्रित श्रंखला ‘ आमने सामने ‘ का सम्पादन उन्होंने किया है तथा पत्रिका ‘ समकालीन हस्ताक्षर ‘ के केदारनाथ अग्रवाल तथा चन्द्रकांत देवताले पर केन्द्रित दो अंकों का सम्पादन भी किया है ।
उन्हें सम्मान मिले हैं – प्रथम केदारनाथ सम्मान ( बाँदा ) , सूत्र सम्मान ( छत्तीसगढ़ ) सम्प्रति – भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्यरत हैं और सड़क 45 , क्वार्टर 3 सी , सेक्टर 10 , भिलाई नगर, जिला दुर्ग ( छत्तीसगढ़ ) 490006 में रहते हैं .

इसके अलावा वो मेरा बहुत प्यारा दोस्त है । बहुत भावुक,संकोची,शर्मीला लेकिन गंभीर । छोटी छोटी कविताओं में बड़ी बात कह देता है । मंच पर भाषण देता है तो लगता है हिंदी साहित्य का बहुत बड़ा विद्वान है । पुराना सा हेलमेट पहनकर जब भिलाई स्टील प्लांट से बाहर निकलता है तो मैले कुचैले कपड़ों में एक मजदूर दिखाई देता है । जनवादी लेखक संघ के सदस्यों के बीच एक कुशल संगठनकर्ता । एक ज़िम्मेदार पति और पिता ।

प्रस्तुत हैं नासिर अहमद सिकंदर की कुछ कविताएँ

****

1⃣ अच्छा आदमी होता अच्छा

अच्छा आदमी होता अच्छा
सम्मानित और
विजयी

उसे करना अपमानित
और पराजित
बस में नहीं किसी के

बस तो है बस
समय का बस
करता
अपमानित करता

पराजित भी
सिर्फ समय ।

****

2⃣ दृष्टिभेद

सही आदमी सही
अपनी दृष्टि में

गलत आदमी गलत
अपनी दृष्टि में

सही आदमी गलत
गलत आदमी सही
वर्तमान में

सामाजिक दृष्टि में !

*****

3⃣ जीवन यापन

बात करूं तो मीठा बोलूं
दुख न पहुंचे
कभी किसी को

दिल तक सबके भीतर उतरूं
ठेस न पहुंचे
कभी किसी को

हाथ मिलाऊं, खैरियत पूछूं
न दूं बद्दुआ
कभी किसी को

ऐसा अपना
जीवन जी लूं ।

***

और इन छोटी छोटी कविताओं के बाद मेरी पसंद की नासिर अहमद सिकंदर की एक लम्बी कविता

4⃣ चिट्ठी-पत्री और प्रधानमंत्री

चिट्ठियां मिल गईं
आज पुरानी
बहुत पुरानी
बरसों-बरस
पुरानी चिट्ठियां
मिल गईं आज-
छब्बीस मई सन् दो हजार चौदह को-

सहेज रखा था
जिन्हें कभी
प्लास्टिक के
किसी पुराने थैले में

पुरानी चिट्ठियां
मिला पुलिन्दा
बहुत पुराना
अपने पुराने दिनों का
अपनी कविता के शुरूआती दिनों का
कविता की वापसी के दिनों का

चलता था मैं
जब डगमग-डगमग
बोलता था कुछ
झिझक-झिझक कर
पर लिखता था
पत्र बड़े-बड़ों को
अपने अग्रज
हिन्दी कवियों को
बातों को मैं रख देता था
रख लेता था
बहुत सलीके आदरपूर्वक
सादर-प्रणाम
सभी को कहता

प्रभाकर श्रोत्रिय
विजय कुमार
अजय तिवारी
अरूण कमल
राजेश जोशी
चंचल चौहान
आधार-तालाब से
पहल संपादक ज्ञान जी की
गुलबी-घाट से
नन्द किशोर नवल जी की चिट्ठी
नामवर जी की चिट्ठियां दो
दो-दो लाइन की
रा.वि. की भी चिट्ठी एक
एक लाइन की
अंक केदार अच्छा निकला है

सोमदत्त हैं
भगवत रावत
परमानंद जी हैं
रमेश रंजक, मान बहादुर, विनय दुबे भी
आज उनकी भी
हो आई याद
मेरे भीतर
जी गए वे भी
जिन्दाबाद. . . . . जिन्दाबाद

मिली चिट्ठियां
जो बहुत पुरानी
गदगद होकर
एड़ी ऊंची कर
हाथ बढ़ाया
अल्मारी के ऊपर
पर तुरंत, फौरन
दुख से भरा मन
जितनी नहीं चिट्ठियां
उतनी दीमक
चिट्ठियों की संख्या से
हजार गुनी दीमक
बिल-बिल, बिल-बिल तैर रही थीं
चिट्ठियां सारी
चाट रही थीं
हाथ झटककर
ज्योंहि पटका
बिखरी चिट्ठियां
कटी फटीं
कमरे के फर्श पर
अक्षर चटकर, कटकर, हटकर
अशोक वाजपेयी
अ. . . .वाज. . . . दिख रहे
मेरे प्रिय आदर्श कवि केदारनाथ
के. . . . न. . . .. . . लग रहे

चिट्ठियों को मैं
हाथ में लेता
कुछ-कुछ पढ़ता
आंख गड़ाए
दिमाग लगाए
कटे अक्षर को
चटे अक्षर को
हटे अक्षर को
जोड़-जोड़कर शब्द बनाता
वाक्य बनाता
मजमून बनाता
रूदाद बनाता

अजय तिवारी दिल्ली से
खैरियत पूछते
सोवियत संघ का हाल लिखते
सोम जी मेरी कविता पर
कुछ-कुछ कहते
अच्छा कहते
साक्षात्कार में छाप रहे हैं लिखते

राजेश जी ने
भोपाल का हाल लिखा है
अरूण कमल ने पटने का
वीरेन्द्र जी ने राजस्थान के
हालात लिखे हैं
छाबी तालाब बांदा से मित्र नरेन्द्र की
एकांत से पहली मुलाकात की
राजिम से
पहली मुलाकाती चिट्ठी
विजय सिंह के शुभ विवाह की
आमंत्रित चिट्ठी
अनुज रजत ने
अपनी बीमारी का
कुछ अंग्रेजी नाम लिखा है
गेवरा प्रोजेक्ट से
सूरज की, भास्कर की
ग्राम देमार से
किशन की, कुमेश्वर की
उनका आत्मीय संबोधन
प्रिय मेरे भैया
मित्र बसंत से
‘मित्र संवाद’ तर्ज पर
साहित्यिक
संवादी चिट्ठियां

और भी हैं चिट्ठियां कई
कुछ पहले आईं
कुछ जवाबी
कुछ साहित्यिक
पारिवारिक कुछ
कुछ आत्मीय

चिट्ठी में परिवार झलकता
प्यार झलकता
परिवेश झलकता
देश झलकता
समय सापेक्ष
धर्म निरपेक्ष

जिन राज्यों की
हैं ये चिट्ठियां
और जब की हैं
जिस सन् की हैं
कौन मुख्यमंत्री उन राज्यों का
यह तो पता नहीं
पर इतने बरसों पहले
कौन प्रधानमंत्री
कह सकता हूं
बतला सकता हूं सही-सही

एक चिट्ठी में सन् देखा है
इंदिरा जी हैं प्रधानमंत्री
राजीव जी
धोती वाले नरसिम्हा जी
टोपी वाले वी.पी. जी हैं

अरे ! इस चिट्ठी में
सिर्फ सन् दिखता
इस सन् तो थे देवगौड़ा जी
नहीं-नहीं
गुजराल जी शायद

केदार जी की यह चिट्ठी
पहले संग्रह की टिप्पणी बतौर
कांपते हाथों से
92 दंगों के बाद की
जिक्र हुआ है इसमें उसका
देशव्यापी उस घटना का

जो नहीं मामला किसी गर्व का

पूर्णचंद्र जी का जवाबी पत्र
नेहरू जी को याद किया है
जब लिखा होगा
शायद मैंने
अपने पत्र में
पहले पहल
परिचय पत्र में
मैं कर्मचारी भिलाई इस्पात संयंत्र का

इतने बरस पुरानी चिट्ठियां
बरसों-बरस पुरानी चिट्ठियां
अब सब
घर से बाहर हैं

फेंक आया
घर के पिछवाड़े
दीमक सहित वो चिट्ठियां सभी

आज मिली
जो छब्बीस मई सन् दो हजार चौदह को
नये प्रधानमंत्री के
शपथ-समारोह के दिन
मुझे अचानक अभी अभी !

*****

और अंत में एक कविता जो मित्र नासिर अहमद सिकंदर ने अपने मित्र शरद कोकास पर लिखी है

6⃣ मित्र शरद कोकास

पिछले तीस बरस से
मित्र मेरे
शरद कोकास

बहुत अंतरंग
अति आत्मीय
खासमखास

हाथ पाया
कंप्यूटर का उलझा -उलझा
लेकिन सुलझा साथ पाया

कविता लिखता
प्रगतिशील धारा की
बातें करता वैज्ञानिक बोध की
साथ निभाता साथी जैसा
हमारे तुम्हारे आंदोलन में आता-जाता
सामाजिक भूमिका निभाने में अव्वल आता

फूल कहां कोई बनता है
आज के इस जमाने में
फूल की तरह चुभते
लोकजीवन के आशियाने में

फूल है वो नाजुक फूल
मैं उसे समझता
नहीं करता कोई समझ में भूल

जो रखा है उस से नाता
वो है मेरा
मैं हूं उसका
मित्र भ्राता

एक कवि का
एक मित्र का
यही व्यक्तित्व मुझको भाता
सदा सुहाता ।

********

कविता – नासिर अहमद सिकंदर

प्रस्तुति: शरद कोकास

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