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नर्मदा और घाटी को बचाने के लिए कटिबद्ध रहे मध्य प्रदेश शासन . गुजरात से पुनर्वास , पर्यावरण और बिजली की वसूली ज़रूरी : नहीं बिना पुनर्वास अवैध डूब.

प्रेस विज्ञप्ति

भोपाल । नर्मदा मध्य प्रदेश साथ ट्रिब्यूनल के समक्ष सरदार सरोवर को संपूर्ण विरोध दर्शाने कहा था, यह बांध राज्य के साथ बड़े डूब क्षेत्र की भरपाई व पुनर्वास असंभव है।

1979 में घोषित हुए नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले से विवाद का निपटारा किया गया लेकिन बिना पूरे अध्यययन नियोजन एवं पानी की उपलब्धता की सही जानकारी के, सशर्त मंज़ूरी तो 1987 में मिली, जिससे अधूरापन सामने आया। नर्मदा घाटी के लांखो लोगों ने सरदार सरोवर के साथ-साथ अन्य कई बांधों के लाभ हानि, सामाजिक पर्यावरण आसरों पर ही नहीं, नर्मदा के जलआबंटन और नदी के भविष्य पर भी।

आज फिर जब मध्य प्रदेश और गुजरात के बीच उभरा है, वह दलीय राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और सामाजिक हकीकत के आधार पर है। सरदार सरोवर पर कुल 60000 करोड़ रुपये तक खर्च किया गया, जबकि नियोजन आयोग कि मूल मंज़ूरी मात्र 6488 करोड़ के लिए थी। योजना गुजरात के सूखाग्रस्तों, किसानों को जल का और मध्य प्रदेश को भी चमकाने वाली बिजली का लाभ दिखा कर बांध की ऊँचाई 138.68 मीटर तक पूरी करने का काम मोदी शासन ने किया जिसमें पिछले कई सालों से उन्हें मध्य प्रदेश शासन ने घाटी का रोष सहकर भी साथ सहयोग दिया।

लेकिन आज गुजरात के ही ज़रूरत मंदों को, लाभार्थी और विस्तापितों को भी वंचित रखकर, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र का भी मात्र बिजली का अपेक्षित लाभ न देने की हकीकत सामने आई है। बांध पूरा करने के बावजूद मात्र हेक्टर्स सिचाई गुजरात ने पायी जिसमें भी कही दिक्कतें हैं, लाभ क्षेत्र में किलोमीटर का नहर निर्माण पीछे छोड़कर 481 कंपनीयो को करोड़ों रुपयों की पाइप लाइनों का जाल बिछा कर पानी के लाभों में प्राथमिकता देदी। कच्छ की शाखा नहर में एक बूंद भी पानी न छोड़ने के समय सूखाग्रहस्त करहाते रहे और भाजपा के ही भूतपूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता जी ने इस योजना में हो रही लूट की पोलखोल की है। उनके अनुसार नर्मदा योजना द्वारा 6 करोड़ गुजरातियों को फसाया गया है।

लेकिन मध्य प्रदेश के साथ भी तो बड़ी धोखाधड़ी है। गुजरात ने मध्य प्रदेश के 192 गाँव और 1 नगर की ज़मीन, जंगल जायदाद ज़िन्दगी सबकी आहुति लेकर आज तक पुनर्वास कार्य के लिए ज़रूरी राशि का भुगतान गुजरात नहीं कर रहा है।

मध्य प्रदेश में पिछले सालों से जो घोटाला हुआ है, उस भ्रष्टाचार में करोड़ों रुपयों तक व्यर्थ गवा कर न्यायमूर्ति झा. आयोग 7 साल जांच पर बनी रिपोर्ट पर पिछले सरकार ने कारवाही नहीं की। अब मध्य प्रदेश विधान सभा में उस पर चर्चा और कार्यवाही का अधिकार नई सरकार को है, उसका उपयोग किया जाए? भ्रष्टाचारियों का सिलसिला आज भी ज़ारी है। इसी कारण से तथा संवादहीनता से हज़ारों विस्तापितों का पुनर्वास आज तक बाकी है और 15 सालों में पेश किए शपथ पत्र झूठे साबित हुए हैं, तो अब विस्तापितों के साथ संवाद करने वाली शासन ने गुजरात और केंद्र ने मिलकर सरदार सरोवर में 139 मीटर तक पानी भरने के लिए जंग छेड़ा तो करारा जवाब देना चाहिए। बिना पुनर्वास डूब कानून, नीति और अदालत के कई फैसलों के ख़िलाफ़ है तो मध्य प्रदेश का हक़ है कि वे बांध न भरे और हज़ारों घर सैकडों धार्मिक स्थल लाखों पेड़, हज़ारों मवेशी सब कुछ बचाये। नर्मदा घाटी के सरदार सरोवर के विस्तापितों ने अपने 30 प्रमुख मुद्दे मांगे कमलनाथ सरकार के सामने रखी है, ठोस निर्णय एवं कार्यवाही की राह देख रहे हैं। विस्तापितों के खिलाफ उच्च व सर्वोच्च्य अदालत में जो याचिकाएं राज्य की पूर्व शासन ने आज की शासन से ही दर्ज करके न्याय में व्यवधान पैदा किया गया है, उनपर पुनर्विचार की राज्य की भी अपेक्षा है।

सबसे अहम मुद्दों में है, मध्य प्रदेश के लाभों का सवाल। सरदार सरोवर से जितनी बिजली का निर्माण होगा, उसकी 56% मध्य प्रदेश को आबंटित होगी, यह नीतिगत योजना है। लेकिन गुजरात अपनी मनमानी से बिजली निर्माण ही नहीं के बराबर कर रहा है। 2014 से 2017 तक जबकि 2100 मेगा वॉट से 3200 दसलक्ष यूनिट का निर्माण हुआ था, जब बांध की ऊँचाई 17 मीटर से अधिक होकर भी लाभ कम कैसा? गुजरात पानी का लाभ अधिकतर लेने के लिए सबसे अधिक त्याग करने वाले मध्य प्रदेश को ही वंचित रखेगा, यह निश्चित है। राज्य के विस्तापितों ने ही नहीं, शासकों ने करार जवाब देना होगा।

मध्य प्रदेश का सरदार सरोवर ने हिस्सा तय है, 6463.48 करोड़ इसमें से 4259.29 करोड़ निवेश बाकी और 2925.64 करोड़ रुपए विवाद ग्रस्त बताकर 1 अगस्त 2018 की स्थिति मध्य प्रदेश शासन से मांग रखी है, 1333 करोड़ रुपये की। प्रत्यक्ष में इसमें भी बड़ा घोटाला है। मध्य प्रदेश के पुनर्वास सम्बन्धी कई निर्णय तत्काल लेकर नई सरकार जब तक उसके लिए ज़रूरी राशि का आयोजन नहीं करती, और पिछले 15 साल में पर्यावरणीय सुरक्षा का (जैसे जिला जल ग्रहण क्षेत्र उपचार) आदि कार्य का भी आयोजन नहीं होता तबतक कुल बजट और गुजरात से प्राप्त करने की राशि अभी नहीं जा सकती। परियोजना पर गुजरात ने किए खर्च का ऑडिट, जब कि गुजरात के ही जानकार, संगठन आदि की मांग है तो हमारे राज्य शासन ने तो निष्पक्ष शोध एवं पुनः आयोजन का आग्रह रखना ही ज़रूरी है।

मध्य प्रदेश की डूब में आनेवाली वन ज़मीन की कीमत जो गुजरात ने चुकानी है, वह भी आज तक मध्य प्रदेश को प्राप्त नहीं हुई है। इन सबपर, बिजली के हकपर सुलझाव के बिना मध्य प्रदेश सरकार क्यों भर दे गुजरात के लिए सरदार सरोवर? बांध के नीचेवास में 600 क्युसेक्स पानी की मात्रा भी न छोड़ते हुए, 15 किलोमीटर लंबी गुजरात की नर्मदा सूखी पड़ी है और तीर्थ भंगार हुए है। मत्स्य व्यवसाय खत्म होकर 6000 मच्छीमार बेरोज़गार हो गए हैं।

अब जाकर गुजरात में ही समुद्र के 80 किलोमीटर तक घुस आने पर हुई बर्बादी के खिलाफ जब आक्रोश उठा तो मोदीजी-रुपाणी सरकार ने साल में 10 दिन 1500 क्युसेक्स पानी छोड़ने का वादा किया है। लेकिन यह पानी तो गुजरात ने अपने हिस्से से देना है, न ही मध्य प्रदेश से इसके लिए पानी छोड़ना ज़रूरी है। इस बात को नर्मदा ट्रिब्यूनल के फैसले का ही आधार है। तो मध्य प्रदेश शासन को, गुजरात के लिए नहीं, अपने ही किसानों, गाँव-नगरवासियों के लिए नर्मदा का पानी आरक्षित, अप्रदूषित रखना होगा। गुजरात-केंद्र मिलकर जो दबाव डाल रहे हैं, वही प्रधानमंत्री जी के लोग सभा में दिए वक्तव्य से ज़ारी है।

मोदीजी स्वयं श्रेय लेने कह चुके हैं कि उन्होंने 51 घंटे उपवास करके सरदार सरोवर को आगे बढ़ाया साथ ही यह दावा भी किया कि 9000 गाँव को, 128 कस्बों को पीने का पानी दिया तो वह भी सच नहीं है। सरदार सरोवर के गुजरात राज्य के पानी के लिए तड़पना पड़ रहा है। नर्मदा आंदोलन के 2006 के 21 दिनों के उपवास के सामने 51 घंटे का पंचतंर कि उपवास उन्होंने ज़रूर किया था लेकिन उस समय भी उन्होंने घोषित किये सभी बिजली निर्माण के लक्ष्य आजतक पूरे नहीं हुए हैं। मोदीजी ने आजतक न कभी विस्तापितों का, न ही पर्यावरण का नाम तक लिया है।

मध्य प्रदेश शासन से अपने राज्य के नर्मदा घाटी के सभी बड़े बांध, उनसे विस्थापन, पर्यावरणीय असर, उनमें भ्रष्टाचार और अन्याय तथा कानूनी उल्लंघन की सम्पूर्ण जाँच परख करवाने की ज़रूरत है। बड़ी नर्मदा लिंक परियोजनाएं भी वैज्ञानिक व पर्यावरणीय आधार के साथ नहीं आकी गयी है। पानी की नदियों को भी भरना एक सपना ही है। इसी कारण नर्मदा पर सम्पूर्ण विचार के लिए विशेषज्ञों की समिति गठित करना तथा घाटी के संगठित लोगों का पीढ़ियों के हक़ मंज़ूर करके, उन्हीं का सहभाग उसमें होना भी आवश्यक है।

कमला यादव, सनोवर बी मंसूरी, धंजराज अवस्या, जगदीश पटेल, राहुल यादव, मेधा पाटकर

संपर्क – राहुल यादव 9179617513

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