कला साहित्य एवं संस्कृति

द_वन_एण्ड_ओनली_रमणिका_गुप्ता ःः बादल सरोज .

27.03.2019

अपने घर से कोई 500 किलोमीटर दूर जाकर पहाड़ियों जंगलों में पैदल घूमना, मजदूरों की झोपड़ियों में उनके साथ बैठकर उनका डर मिटाना । उन्हें जलूस और हड़ताल के लिए तैयार करना । गुंडों – सचमुच के गुंडों – से लड़ना भिड़ना । पिटना, फिर पिटना और फिर धीरे से पिटने वालों के बीच इतना हौंसला पैदा कर देना कि वे उनके साथ मिलकर सामने वालों को ईंट का जवाब पत्थर से देने के लायक बन जायें। बहुत मुश्किल काम होता हैं। मुश्किल और बढ़ जाती है जब यह काम करने वाली कोई औरत होती है ।

● वाम आंदोलन में काम के लम्बे अनुभवों के बाद समझ आ गया है कि सबसे मुश्किल काम होता है पहली पहली यूनियन बनाना । जिनकी यूनियन बनाई जा रही है उनके मन से दमन और बर्खास्तगी, जेल और मौत का भय मिटाना ।

● यह सब करते हुये, इसी के साथ साथ, इसी के दौरान, साहित्य – सच्ची मुच्ची का साहित्य – रचना, भारत के दलित-आदिवासी-स्त्री साहित्य का केंद्र बनकर उभरना । अपनी खुद की जिंदगी भर की कमाई, अपनी बेटियों की कमाई को झोंक कर देश के सार्थक और बदलाव के प्रति समर्पित आदिवासी-दलित और स्त्री रचित साहित्य का केंद्र खड़ा कर देना ।

● बहुत ही विरला होता है ऐसा कॉम्बिनेशन । सिर्फ वाम में ही मिलता है और – जिन्हें बुरा लगे वे हमें गलत साबित करें – वहां भी उतना प्रचुर नहीं जितना उनके यानि हमारे इतिहास में है ।

● रमणिका गुप्ता एक ऐसा ही कॉम्बिनेशन : केमिस्ट्री की भाषा में बोलें तो कंपाउंड यानि यौगिक थी । जितनी मैदानी मोर्चे उतनी ही रूहानी – रचनात्मक – विचार के मोर्चे पर भी मुस्तैद और सन्नद्द !!

● फ्रेंकली स्पीकिंग हमे भी इस पर यकीन नहीं होता खासतौर से तब – अब हमे कबूल करने में शर्म आरही है – जब यह काम यह एक स्त्री, महिला, औरत ने किया था ।

● तब हम ऐसे ही थे, एक पुरुष ट्रेड यूनियनिस्ट, जब बहुत पहले – बहुत ही पहले – कोई चौथाई सदी पहले, शायद उससे भी पहले, पहली बार मध्यप्रदेश-उत्तरप्रदेश में फैली नॉर्दन कोल फील्ड की कोयला खदानों के मजदूरों के बीच सीटू की यूनियन बनाने के लिए कॉमरेड एस कुमार के साथ गये थे और कॉमरेड पी एस पांडेय ने कहा था कि मध्य प्रदेश में जब रजिस्ट्रेशन कराये तो यूनियन का नाम #कोल_फील्ड_लेबर_यूनियन ही रखियेगा । क्यों पूछने पर उन्होंने बताया कि रमणिका जी ने इसी नाम से हमारी यूनियन बनाई थी ।

● उसके बाद जो कहानियां हमने रमणिका जी के संघर्षों की सुनी हम दंग रह गये । अपने अंदर के पुरुष – मनु के आदमी – की उपस्थिति पर इतना लज्जित हुये कि उसे सिंगरौली में ही दफ़न कर आये । (ऐसा हम मानते हैं। दुष्ट यदि कभी कभार दिख जाये तो दोष हमारा माना जाये ।) उसके बाद जितनी भी बार एनसीएल सिंगरौली की जितनी भी खदानों में गए ; रमणिका जी की कहानियां सुनने को मिलीं । वे हमसे पहले वहां जा चुकी थीं ।

● उसके बाद सीटू और कोल फेडरेशन की मीटिंग्स में रमणिका जी जब भी मिलीं – उत्साह से मिलीं । सिंगरौली में कैसा चल रहा है पूछती और अच्छी खबरों पर खुश होती ।

● मानी Manyata Saroj ने जब अपने पिता के नाम पर जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति सम्मान शुरू किया और दूसरा सम्मान संथाली भाषा की कवियित्री निर्मला पुतुल को दिया तब रमणिका जी मुख्य अतिथि थीं । वे अपने साथ ढेर उपयोगी किताबें भी लाई थीं । कुछ बिकीं, बाकी वे बेचने के लिए छोड़ गयीं थीं । याद नहीं कि उनकी वसूली के लिये कभी उन्होंने कोई तगादा किया हो । जब भी मिलीं तब यही पूछा कि लोगों को कैसी लगी किताबें ? और भेजनी हैं क्या !!

● आज जब #सीपीएम – रमणिका गुप्ता की पार्टी – की मध्यप्रदेश राज्य समिति – की मीटिंग चल रही थी तब उनके न रहने की खबर आयी तो सभी फौरी स्टुपिड सी बातों को भूल कर इस अदम्य शख्सियत की स्मृतियाँ ताज़ी हों गयीं । लगा कि जैसे आज किसी बहुत ही ख़ास अपने को दोबारा खो दिया ।

● वे सीपीएम में आने से पहले, मोस्ट प्रोबेबली लोहियावादी समाजवादी थीं । हजारीबाग़ से विधायक चुनी जा चुकी थीं । विचार और व्यवहार दोनों के अनुभवों के साथ परिपक्व होकर वे सीटू और सीपीएम में शामिल हुयी थीं ।

● देर शाम से इत उत के इसे संभालने उसे सुधारने के सांगठनिक कामों में मशगूल रहे – अभी रात के डेढ़ बजे खुद से नींद न आने की वजह पूछी तो पता चला कि रमणिका जी विराजी हुयी हैं चेतन और अवचेतन दोनों पर । जब तक वे नहीं उतरेंगी, चैन नहीं मिलेगा ।
● बहुत ही कमाल की विरली शख़्सियत थी कॉमरेड रमणिका जी – हम आपको मिस करेंगे कॉमरेड, मगर आप रहेंगी हमारे बीच । देश और उसके असली अवाम के लिए जूझते लाल झंडों के रूप में, एक ज़िद्दी लड़की की निरंतरता में, अपने साहित्य की सामयिकता में और अपनी खांटी मौलिकता में । अपनी एक किताब के शीर्षक की तरह : वह जीयेंगी अभी ।

★★ लाल सलाम कॉमरेड रमणिका गुप्ता ।

 

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