कला साहित्य एवं संस्कृति

द ग्रेट इण्डियन थियेटर सर्कस उर्फ कितनी हक़ीक़त कितना फ़साना : राजेश चन्द्र

11.03.2018

 

आज दुनिया भर के थियेटर में काफी अच्छा और नये ढंग का काम हो रहा है, पर ओलम्पिक्स में उनकी कोई झलक नहीं मिलती। जल्दबाज़ी में एनएसडी प्रशासन ने जो मिल गया, उसे ही चुन लिया। दरअसल एनएसडी के प्रधान को विश्व रंगमंच के बारे में उतना ही मालूम है जितना मोदी जी को तीन का पहाड़ा मालूम है! इसीलिये उन्होंने पैसा बरबाद करने के अलावा कुछ नहीं किया। वे आगे भी यही करते रहेंगे भारंगम में। अच्छे नाटकों में इनकी कोई रुचि नहीं है, सिर्फ प्रचार की भूख है। एनएसडी के शिक्षक प्रचार के लिये मरते हैं। ओलम्पिक्स सुपर फ्लाॅप शो साबित हो गया है, कहीं कोई दर्शक नहीं है। सभागारों में कर्मचारियों को जबरन बैठाया जा रहा है। किसी शिक्षक में हिम्मत नहीं है कि ग़लत को ग़लत कह सके। कोई खुल कर नहीं बोल पा रहा कि ओलम्पिक्स फ्लाॅप हो गया है। सारा पैसा बरबाद हो गया है। जवाब तो देना ही पड़ेगा, बच नहीं सकते। जनता की मेहनत का पैसा है, टैक्स का पैसा है, करोड़ों खर्च करके क्या हासिल हुआ, थियेटर का कितना विकास हुआ बताना तो पड़ेगा।

हमारे थियेटर वाले भी आत्मनिर्भर नहीं हैं। अधिकतर बदहाली में हैं, और हमारे ‘वरिष्ठों‘ में अधिकतर कन्फ्यूज़्ड हैं। सिर्फ दिल्ली, बंगाल या पटना नहीं, ओलम्पिक्स हर जगह फ्लाॅप है- वाराणसी से लेकर बैंगलोर और चेन्नई तक। लेकिन हमारे अधिकतर ‘वरिष्ठों‘ के अंदर रीढ़ ही नहीं है, और उनके मुंह के ताले की चाबी लालच ले भागा। इनमें से बहुत से ओलम्पिक्स में शामिल भी हैं, फ़ीस भी लेंगे, एक से एक प्रोग्रेसिव और कथित क्रान्तिकारियों का यही हाल है। सबको सब पता है, पर कोई कुछ बोल नहीं रहा। किसी ने मना किया कि नहीं, हम नहीं आयेंगे आपके तमाशे में बाजा बजाने? बाद में लिखना-बोलना आसान है, पर आपने पहले समर्थन किया था तभी तो यह विपत्ति आयी? सबको जल्दी थी और जैसे ही आमंत्रण मिला, झपट पड़े। एनएसडी में काम भी करते हैं, पर बेहयाई देखिये खुद को विद्रोही भी कहते हैं। हमारे बहुत से वरिष्ठ ऐसे ही हैं- ज़्यादातर कन्फ्यूज़्ड। जो भी डायरेक्टर की कुर्सी पर बैठ जाये, उसको सलाम ठोंकते हैं, पीछे गाली भी देते हैं। इसीलिये एनएसडी में कोई आन्दोलन खड़ा नहीं हो पाता। वे हर आन्दोलन को रोकने के लिये साज़िश करते हैं। पासआउट्स भी और शिक्षक भी। छात्र डरते हैं कि काम नहीं मिलेगा।

कभी-कभी पर्सनल एजेण्डा लिये कोई विरोध करता है, फिर ग़ायब। उसको एनएसडी एक फेस्टिवल गिफ्ट कर देता है, या कोई प्रोजेक्ट। सीनियर्स-जूनियर्स सब हड्डी पाकर ख़ामोश हो जाते हैं। एनएसडी को मालूम है, इनको एक प्रोजेक्ट दे दो बस। आज बाहर के रंगकर्मी भी इस जाल में फंस गये हैं। कुछ युवा निर्देशक तो सब छोड़ कर एनएसडी डायरेक्टर का कीर्तन करने में जुटे हुए हैं, पगलाये घूम रहे हैं। इनमें से कई ऐसे हैं जो पहले आलोचना किया करते थे। आज उन्होंने अचानक पाला बदल लिया है।

हिन्दी और बांग्ला थियेटर में कई वामपंथी और कथित विद्रोही निर्देशक हैं, पर क्या इनमें से किसी ने भी कभी किसी गलत बात का विरोध किया? कुछ हैं जो फेसबुक पर लिखते हैं, पर आमने-सामने कुछ कहना-करना हो तो ज़ीरो! एनएसडी ने कोई अवार्ड आॅफ़र किया तो सब उसे लेने दौड़ पड़ेंगे, फिर लापता! भारतीय रंगमंच की इसीलिये इतनी दुर्दशा है। सबसे ज़्यादा हमारे सीनियर्स ने इसे बर्बाद किया, हर तरह से क्षति पहुंचायी। आज इनमें से हर एक ओलम्पिक्स में शामिल है। सुनील शानबाग के अन्दर साहस है, ईमानदारी है, इसीलिये उन्होंने रिजेक्ट किया। एक-दो लोगों के अलावा कौन बोल रहा है इस वक्त? सबने सरेण्डर कर दिया खुद को। यह बहुत बुरा है, अत्यन्त दुखद है।

आज प्रसन्ना जैसा दूसरा रंगकर्मी मिलना मुश्किल है। बंगाल में ऐसे ही बादल दा थे। अब तो सबका असली चेहरा सामने आ गया है। सोशल मीडिया भ्रष्ट और दोमुंहे लोगों के जी का जंजाल बन गया है क्योंकि उसने नयी पीढ़ी के सामने थियेटर की अन्दरूनी सड़ांध को पूरी तरह उजागर करके रख दिया है। भीतरी स्वार्थ सब बाहर आ गया है, वे पहचान लिये गये हैं, इसलिये डर उनके मस्तिष्क में बैठ गया है, वह ज़ाहिर होता ही रहता है। नयी पीढ़ी को इनसे बचाना ही होगा। हमारे जो भी सीनियर निर्देशक हैं, उनमें से किसी का विकास नहीं हो रहा। वे अपडेट नहीं हैं थियेटर को लेकर। वे फंसे हुए हैं पुरानी चीज़ों में, पुराने तौर-तरीकों में। एनएसडी से बाहर का उन्हें कुछ पता नहीं है, वे देखना चाहते भी नहीं। कोई रिसर्च नहीं, केवल ग्रान्ट लेते हैं और प्रोडक्शन में व्यस्त रहते हैं। पोस्टर पोस्ट करते हैं, फेस्टिवल एनाउंस करते हैं। थियेटर के नये प्रयोगों को लेकर, नवाचारों के बारे में उनमें से कोई बात नहीं कर रहा। उनकी इसमें रुचि भी नहीं। केवल एनएसडी जाते हैं और जो कुछ देखते हैं, लिखते हैं।

थियेटर में एक बहुत बड़ी आबादी हाशिये पर है, खास कर जो दिल्ली से बाहर है। यह एक बहुत बड़ी समस्या है कि सब कुछ दिल्ली में केन्द्रित है। कौन-सा नया नाटक आ रहा है, खेला जा रहा है, उसको देखने की कोई तत्परता नहीं, जिज्ञासा नहीं, उत्साह नहीं। सिर्फ अपने नाटक का पोस्टर प्रचारित करते हैं, खुद ही कहते हैं कि नाटक हिट है! पढ़ने-लिखने की कोई ललक नहीं किसी में। जैसा-तैसा कुछ काम चल रहा है, उसी का फेसबुक पर प्रचार हो रहा है। इसी में सन्तुष्ट हैं, कोई चुनौती नहीं लेनी। चलताऊ ढंग से कोई नाटक बना लिया, किसी पार्टटाइमर समीक्षक से मनचाहा लिखवा लिया कि यह पांच सर्वश्रेष्ठ नाटकों में से एक है। साहित्य कला परिषद हिन्दी नाटकों को अवार्ड देता है, इन लोगों के लिये यही ‘आॅस्कर‘ है! कहते हैं हमने इण्डिया का ‘बेस्ट प्रोडक्शन‘ कर दिया!

वे भूल गये हैं कि थियेटर में कोई रैंकिंग नहीं होती। हबीब तनवीर साहब, बादल दा, प्रसन्ना जैसे लोग लेजेण्ड हैं हमारे। ‘चरनदास चोर‘, ‘बहादुर कलारिन‘ और ‘आगराबाज़ार‘ जैसे नाटक लोगों के दिलों में बस गये हैं, उनकी चेतना का हिस्सा बन गये हैं। कौन लोग ऐसा नाटक कर रहे हैं आज? ढूंढने पर मुश्किल से कोई समीक्षक मिलेगा, कैसे-कैसे लोग समीक्षक बने निर्देशकों के पीछे-पीछे चक्कर काट रहे हैं। उनके माथे पर कीमत छपी हुई है, बोलो खरीदोगे? हमारे कुछ थियेटर वाले उनको सलाम करते हैं, यह भी समस्या की जड़ है। निर्देशकों को पता है कि वे खराब नाटक कर रहे हैं, इसलिये उनको डर लगता है कोई सच्चाई न लिख दे। वे इसीलिये समीक्षकों की खुशामद करते हैं, बुला-बुला कर अवार्ड देते रहते हैं।

हिन्दी रंगमंच आज इन्हीं सब कारणों से तबाह हो चुका है। कन्फ्यूज़्ड लोगों के साथ कोई आन्दोलन नहीं खड़ा हो सकता, जो कभी एनएसडी के साथ खड़े हो जाते हैं और कभी उसके विरोध में भी दिखायी पड़ना चाहते हैं। ऐसी बचकानी हरक़तें करते आज कितने ही निर्देशक मिल जायेंगे। ये कभी गम्भीर नहीं होते। कई ऐसे हैं जिनको बार-बार कई मौकों पर एनएसडी ने अपमानित किया, आज भी हो रहे हैं, तब भी बार-बार उसी की गोद ढूंढते हैं। उसकी हर नीति, हर बात का समर्थन करते हैं। वास्तव में जो लोग रेपर्टरी से निकले हैं, उनको एनएसडी से बहुत प्यार हो जाता है। ठीक वैसे ही जैसे मोहनबागान-ईस्टबंगाल टीम के फैन हुआ करते हैं। टीम अगर निकाल भी दे, तब भी लौट-लौट कर क्लब में जाते हैं। कोई भी इन पासआउट्स को देख सकता है। वे बिला नागा रोज़ चले आते हैं, चाय पीते हैं, अड्डा जमाये रहते हैं नीम के नीचे। वह तीर्थ है, वहीं से इनको प्रोजेक्ट मिलता है, उसी का इन्तज़ार करते रहते हैं। प्रोजेक्ट मिलते ही झपट लेते हैं, बाद में कहेंगे मैंने स्कूल से कभी कोई काम नहीं मांगा। यह झूठ होता है हमेशा, सरासर झूठ! यह बात सबको पता है।

वे चुपचाप अकेले में डायरेक्टर से मिलते हैं। घुटने छूते हैं, गिड़गिड़ाते हैं, सैल्यूट करते हैं, तेल की मालिश करते हैं। अरे अगर आप नहीं डरते तो सीधे फेसबुक पर पोस्ट कीजिये न इनके खिलाफ़। आज तक किसी ने नहीं देखा इनमें से किसी को। हर फेस्टिवल में वही लोग, उन्हीं को फीस मिलती है, उन्हीं को प्रोजेक्ट मिलते हैं। इसीलिये वे कभी विरोध नहीं करते। हर तरफ जहां देखिये, मौक़ापरस्तों की फ़ौज घूमती दिखायी देगी हिन्दी थियेटर में। एनएसडी उनका अपना क्लब है- संयुक्त परिवार, परिवार की बातें बाहर नहीं जानी चाहिये, इस बात पर उनमें ज़बरदस्त एकता है। दशकों गुज़र गये- दस साल, बीस साल। कोई विरोध नहीं। जिसे भी पोस्ट मिल गयी, फ़ाॅलोवर बने रहे एनएसडी के, कभी कोई पहल नहीं की बदलाव की। उनमें कई गेस्ट हैं और कई मेम्बर सोसाइटी के।

संगीत नाटक अकादमी अवार्ड मिला, सब साध पूरी हो गयी। मंज़िल मिल गयी। एकदम सन्तुष्ट हैं अपनी लाइफ़ में। अपने अवार्ड का विडियो और तस्वीरें पोस्ट करते रहते हैं फेसबुक पर, वाट्सएप पर! यह सब काॅमेडी ही तो है- एक डार्क काॅमेडी! हंसी भी आती है, पर उससे अधिक रोना आता है इनकी दयनीय दशा देख कर! उनके पास एनएसडी के अलावा बात करने के लिये कोई विषय नहीं है। अवार्ड मिल गया, ग्रान्ट मिल गया, लाइफ़ बन गयी थियेटर में। इनमें से कोई थियेटर को लेकर सीरियस नहीं है। ऐसे-वैसे प्रसिद्धि तो मिल गयी थोड़ी-बहुत, पर सीरियस थियेटर में ज़ीरो! थियेटर रोज़ बदल रहा है, पर उससे एकदम बेख़बर हैं। कुछ भी नया नहीं सीखा, न डिज़ाइन में, न डायरेक्शन में, और न ही प्रोडक्शन में। जो कुछ एनएसडी में सीखा था एक ज़माने में, उसी को आज तक दोहरा रहे हैं। वही डिज़ाइन, वही एक्टिंग, वही पुराने फ़ैशन का डायरेक्शन। कुर्सी पर बैठ कर लेक्चर देते हैं- जैसे कोई सामन्ती ज़मीन्दार हो। यह क्रियेटिव डायरेक्शन है या सामन्तवाद है? पूरी प्राॅसेस को देख लाजिये कभी- रिहर्सल प्राॅसेस ज़ीरो, कोई सिस्टम नहीं, एक्टर को देख कर दया आती है, निर्देशन का फलक एकदम सतही और संकीर्ण। कोई रचनात्मक चुनौती है ही नहीं। इनमें से ज़्यादातर लोग ग्रान्ट के लिये, एसएनए अवार्ड के लिये ज़िन्दा हैं, यही सच्चाई है। किसी ने एक नाटक की आलोचना कर दी, तो बौखला जाते हैं। यह सब सिर्फ तमाशा है, लीला या एक सर्कस। समीक्षा थियेटर का बहुत महत्वपूर्ण काम है- पर आज उसका बड़ा हिस्सा बिका हुआ है। पुरस्कार ज़्यादातर बिके हुए हैं, कभी-कभार किसी सही आदमी को दे दिया जाता है, ताकि भ्रम बना रहे। भारतीय रंगमंच की यही त्रासदी है.

 

(अपने जैसे एक पागल आदमी के साथ मैसेन्जर पर आधी रात के बाद के प्रलाप से कुछ बातें। दूसरे पागल का नाम एनएसडी के अतीत से मिटाया नहीं जा सकता! इस प्रलाप को आप जितना चाहें शेयर कर सकते हैं। )

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