अदालत आदिवासी दलित महिला सम्बन्धी मुद्दे मानव अधिकार

देश के वंचित वर्ग द्वारा बुलाये गये भारत बंद का पीयूसीएल छतीसगढ समर्थन करता हैं .

1.04.2018

बिलासपुर 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के दो न्यायधीशों ने 20 मार्च को एक प्रकरण में अपना निर्णय देते हुए, जिस प्रकार से वस्तुगत परिस्थितियों के विपरीत, “अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निरोधक) अधिनियम, 1989” की व्याख्या की है, उससे पूरे देश में, और छत्तीसगढ़ में, दलित-आदिवासी समुदायों में भारी और स्वाभाविक आक्रोश प्रकट किया जा रहा है.

इस निर्णय में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि 2014 से लेकर अब तक दलितों पर अत्याचार की घटनाओं के आंकड़ों में 19% की वृद्धि हुई है. दुल्हे के घोड़े चढ़ने से चिढकर कोठपुतली में पीने के पानी में ज़हर मिलाने की घटना हो, फरीदाबाद में अवयस्क बच्चों को जलाकर मारने की घटना हो, या फिर छत्तीसगढ़ के पेद्दगेल्लूर आदि गांवों में सुरक्षा बलों द्वारा आदिवासी औरतों पर यौन हिंसा की घटनाये हो – ये न केवल रुकने का नाम नहीं ले रही हैं बल्कि बढ़ रही हैं.

2014 में इस बात को देखते हुए सामाजिक न्याय एवं सशक्तिकरण मंत्री श्री बलराम नायक ने लोक सभा में प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा था कि “दलितों-आदिवासियों के विरुद्ध अत्याचारों की सतत हो रही घटनाओं से यह आभास होता है की अत्याचार निवारण अधिनियम का अभियुक्तों पर कोई विशेष असर नहीं पड़ रहा है. इन बढ़ती घटनाओं से यह रेखांकित होता है कि और भी ज्यादा प्रभावशाली और कठोर कानूनी प्रावधानों की आवश्यकता है. अतः मंत्रालय ने तमाम सम्बंधित विभागों से सलाह मशविरा के उपरांत इस अधिनियम में संशोधनों की प्रक्रिया आरम्भ की हैं.” अधिनियम को संशोधित करते हुए नए “अपराधों” को परिभाषित किया गया था जिसमे जबरन मानव या पशु शव उठवाना, वन अधिकारों या सिंचाई अधिकारों से वंचित करना, मैला ढोना, महिलाओं को निर्वस्त्र करना आदि शामिल किये गए थे और केंद्र तथा राज्य सरकारों पर ज्यादा गंभीर दायित्व सौंपे गए थे.

परन्तु सर्वोच्च न्यायालय के उपरोक्त निर्णय ने अत्याचार अधिनियम के अंतर्गत दोष सिद्धि की कम मात्रा का वह विशलेषण नहीं किया जो अनेक सरकारी रपटों में स्थापित है – जैसे – जातिगत दबाव में आकर विवेचना में जानबूझकर लापरवाही, गवाहों के बयानों को कमज़ोर बनाना, चालान पेश करने में जान बूझकर देरी करना, शासकीय अभियोजक की अपराधियों से मिलीभगत – इनका कोई उल्लेख न करके; बरी होने को “निर्दोष” व्यक्ति का “दुर्भावना पूर्ण” और “झूठे” शिकायत के आधार पर “फंसाए” जाने का निष्कर्ष निकाला है. यदि यही तर्क बस्तर में लगाया जाता तो हजारों आदिवासियों को झूठे केसों में फंसाए जाने वाले सुरक्षा बलों के उच्च अधिकारीयों को जेल के सलाखों के पीछे होना चाहिए था.

संविधान में अनुच्छेद 15 और 17 में निहित वंचित समुदायों के हित में “सकारात्मक भेदभाव” की धारणा का कही भी उल्लेख किये बिना, और उच्च जातियों और दलितों के बीच में विद्यमान सत्ता, शोषण, दमन, और भेदभाव के सम्बन्ध का उल्लेख किये बिना, मात्र भाईचारा और समरसता की बात करके इस विवादस्पद निर्णय ने वास्तविक सच्चाइयों से मुह मोड़ने का ही काम किया है. और ऐसा करने में “करेला ऊपर से नीम चढ़ा” के भांति बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर जी की उक्ति का भी सन्दर्भ से बाहर उद्धरण दिया है

सामाजिक न्याय पर गठित स्थाई संसदीय समिति ने पार्टी पहचानों के परे जाते हुए इस निर्णय की केंद्र सरकार द्वारा पुनरीक्षण की मांग की है. दो केन्द्रीय मंत्री राम विलास पासवान और रामदास आठवले ने भी यह मांग उठाई है.

सुप्रीम कोर्ट के 20 मार्च के निर्णय में दी गयी व्यवस्था कि अत्याचार निवारण अधिनियम के अंतर्गत किसी शिकायत पर पुलिस के अधिकारी की  जांच के बाद ही प्रथम सूचना दर्ज होगी, और शासन से अनुमति प्राप्त करने के बाद ही किसी शासकीय कर्मचारी के खिलाफ प्रथम सूचना दर्ज होगी, इससे लगभग उच्च जातियों के प्रभावशाली लोगों पर दंडात्मक कारवाही असंभव हो जाएगी. इन प्रभावशाली व्यक्तियों को, विवेचना को एवं गवाहों को प्रभावित करने की पूरी छूट मिलेगी, और उलटे शिकायत करने वाले को भी डराने-धमकाने और हमला करने का भी अवसर मिलेगा. इस प्रकार अत्याचार निवारण अधिनियम को लगभग प्रभावहीन बन दिया जायेगा.

अतः पीयूसीएल छत्तीसगढ़  20 मार्च के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की आलोचना करता है और समस्त दलित-आदिवासी, प्रगतिशील, लोकतान्त्रिक संगठनों के साथ 2 अप्रेल को भारत बंद का समर्थन करता है ।

डा. लाखन सिंह  ( अध्यक्ष.)

एडवोकेट सुधा भारद्वाज ( महासचिव )

 

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