कला साहित्य एवं संस्कृति

देश के रंगकर्मियों के नाम विकल्प- साझा मंच, दिल्ली की एक अपील

11.03.2018

साथियो,

ओलम्पिक्स के ख़िलाफ़ हमारा स्टैण्ड शुरू से साफ़ है। हम इसे भारतीय रंगमंच को नष्ट-भ्रष्ट करने, उसे एक बाज़ारू, भ्रष्ट और समाज-विरोधी कला बनाने, उस पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व क़ायम करने तथा रंगकर्म को पश्चिमी संस्कृति का गुलाम और उपनिवेश बनाने की एक घृणित साज़िश मानते हैं। हम मानते हैं कि सत्ता रंगमंच की जनतांत्रिकता, बहादुराना प्रतिरोध से भरे उसके इतिहास, प्रगतिशीलता और समानता के मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता से भय खाती है, इसलिये वह कभी अनुदान के नाम पर, कभी बड़े महोत्सवों के नाम पर, कभी सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों के प्रचार के नाम पर करोड़ों रुपये लुटाती है, और रंगकर्मियों के बीच सत्ता समर्थक और सत्ता-विरोधी जैसा विभाजन पैदा कर रंगमंच को कमज़ोर और बीमार करने की साज़िश रचती रहती है।

दुनिया भर के इतिहास और अपने देश की रंग-परम्पराओं को देखते-समझते हुए हमारा यह अनुभव है कि रंगमंच का विकास उत्सवों या अनुदान की बन्दरबांट से कभी नहीं हो सकता। ऐसे क्रियाकलाप अनिवार्य रूप से कुछ मुट्ठी भर सत्ता में बैठे लोगों और उनके लग्गुओं-भग्गुओं को ही फ़ायदा पहुंचाते हैं और वे रंगमंच तथा उससे जुड़े लोगों की व्यापक आबादी को तेज़ी से हाशिये और बदहाली के अन्धेरों की तरफ़ ढकेलते हैं। रंगमंच का विकास करने के लिये देश में एक बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण की विकेन्द्रीकृत व्यवस्था, आधुनिक किन्तु सस्ते पूर्वाभ्यास एवं प्रदर्शन-स्थलों की व्यापक रूप से उपलब्धता और रंगकर्मियों की आर्थिक-सामाजिक सुरक्षा के लिये समुचित योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद ज़रूरी है।

सरकारें और संगीत नाटक अकादमी जैसी उसकी एजेन्सियां इस दिशा में इसलिये कभी कुछ नहीं करतीं, क्योंकि वे रंगमंच को अपने गर्हित स्वार्थों के लिये ख़तरा मानती हैं। ऐसी सरकारों और उसके संस्थानों द्वारा रंगमंच का विकास करने के नाम पर किये जाने वाले भारत रंग महोत्सव और ओलम्पिक्स जैसे उत्सव एक जुमला या ढकोसले से ज़्यादा अहमियत नहीं रखते। वे केवल जन-धन की बरबादी और संगठित लूट के अवसर ही मुहैय्या कराते हैं। विडम्बना है कि रंगकर्मियों का एक सुविधा-लोलुप और अवसरपरस्त तबका हमेशा ब्राह्मणवादी सत्ता के प्रलोभन में फंस जाता है और वह अपनी ही रंगमंचीय बिरादरी के ख़िलाफ़ सत्ता के मोहरे की तरह इस्तेमाल होता है, जिसके बदले में उसकी तरफ़ कुछ टुकड़े उछाल दिये जाते हैं।

मित्रो, ऐसे रंगकर्मियों को सही रास्ते पर लाना भी हमारी ही ज़िम्मेदारी है। देश में जहां कहीं भी इस समझ के साथ और ओलम्पिक्स जैसे आयोजनों के विरोध में रंगकर्मी साहस के साथ खड़े हो रहे हैं, विकल्प- साझा मंच दिल्ली उनके साथ एकजुट है। हम ब्राह्मणवादी-पूंजीवादी सत्ता की संस्कृति और उसके केन्द्रीय संस्थान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय द्वारा आयोजित किये जा रहे थियेटर ओलम्पिक्स के ख़िलाफ़ देश के विभिन्न हिस्सों में रंगकर्मियों द्वारा किये जा रहे प्रतिरोध आन्दोलनों का पुरज़ोर समर्थन करते हैं।

अगर आप इस प्रतिरोध को वाजिब मानते हैं, तो कमेन्ट बॉक्स में ‘समर्थन’ लिख सकते हैं। हम आपका नाम इस अपील में जोड़ लेंगे।

अरविन्द गौड़ एवं अस्मिता थियेटर, दिल्ली।
ईश्वर शून्य एवं साझा सपना, दिल्ली।
राजेश चन्द्र एवं समकालीन रंगमंच, दिल्ली।
मंजुल भारद्वाज एवं थियेटर ऑफ़ रेलेवंस, मुम्बई।
अरुण पाण्डेय, विवेचना, जबलपुर।
प्रांशु, भिखारी ठाकुर स्कूल ऑफ ड्रामा, पटना।
संजीव चन्दन, स्त्रीकाल एवं द मार्जिनलाइज़्ड पब्लिकेशन, दिल्ली।
तारिक़ दाद, न्यासा थियेटर, भोपाल।
महेश वशिष्ठ, रंग परिवर्तन, गुड़गांव।
राजेश कुमार, नाटककार, मोर्चा थियेटर, लखनऊ।
मृत्युंजय प्रसाद, मास्क, पटना।
दीपक सिन्हा, रंगनायक, द लेफ़्ट थियेटर, बेगूसराय।
रवि भूषण पाठक, करियन, समस्तीपुर।
दयानन्द शर्मा, राजश्री, बीकानेर।
अभय कुमार, अंग नाट्य मंच, मुंगेर।
शिवा शिवाजी, मंथन आर्ट्स, शाहजहांपुर।
हरिओम राजोरिया, इप्टा, मध्य प्रदेश।
भारतेंदु कश्यप, द मॉकिंग बर्ड्स, लखनऊ।
पुष्पराज, आर्ट कॉलेज बचाओ संघर्ष मोर्चा एवं पटना संग्रहालय बचाओ समिति, पटना।
पार्थ सारथि, नेशनल थियेटर काउन्सिल।
भूषण भट्ट, वरिष्ठ रंगकर्मी, संगीतज्ञ।
भगवान प्रसाद सिन्हा, संस्कृतिकर्मी, बेगूसराय।
ब्रजेश अनय, वरिष्ठ रंगकर्मी, भोपाल।
अजय श्रीवास्तव ‘अज्जू’, वरिष्ठ रंगकर्मी, भोपाल।
मंगेश बंसोड, सम्यक, मुम्बई।
शरद शबल, रंगदिशा, इन्दौर।
अवधेश कुमार मिश्र, नाट्यांगन, कानपुर।
दीपक कबीर, दस्तक मंच, लखनऊ।
अनिल तिवारी, प्रतिशोध, ग्वालियर।
ज़रीफ मलिक आनन्द, इप्टा, कोरोनेशन आर्ट थियेटर, शाहजहांपुर।
चन्द्रजनिकर जोशी, वरिष्ठ रंगकर्मी, बीकानेर।
संजीव माथुर, समय सारथी, गाजियाबाद।
दीपक वोहरा, संस्कृतिकर्मी, करनाल।
सुशील मानव, संस्कृतिकर्मी, फूलपुर, इलाहाबाद।
दिनेश चौधरी, इप्टा, डोंगरगढ़।
पवन भगत, कबीर ग्रुप, चंद्रपुर, महाराष्ट्र।
प्लाबन बसु, रंगशिल्पी, कोलकाता।
अजय कुमार शर्मा, अर्चना रिद्म रंगमंडल, कुरुक्षेत्र।
आशीष मोदी, अभिव्यक्ति नाट्य एवं कला मंच, कोटा।
आकाश कुमार, स्वतंत्र रंगमंच, पटना।
अजय आठले, इप्टा, रायगढ़।

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