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दिल्ली विश्वविद्यालय में विध्यार्थी परिषद की गुंडागर्दी के खिलाफ जनवादी लेखक संघ का वक्तव्य.

देश भर में पाठ्यक्रमों को अपने मन-माफ़िक ढालने की भाजपा-आरएसएस की कोशिशें लगातार अधिक उग्र होती जा रही हैं| कई विश्वविद्यालयों में तो वे पाठ्यक्रम को बनाने और पारित करने वाली समितियों में अपनी मनमानी चलवा ले रहे हैं; जहाँ ऐसा नहीं हो पा रहा, वहाँ उनसे जुड़े संगठन हंगामे, धमकियों और तोड़-फोड़ का सहारा लेकर इस काम को अंजाम दे रहे हैं, जिसमें उन्हें संस्थानों के चाटुकार प्रशासनिक अमले का प्रकट या परोक्ष सहयोग मिल रहा है| अभी-अभी देश के शीर्ष अध्ययन-केन्द्रों में से एक, दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी|

16/07/2019 को विश्वविद्यालय की विद्वत परिषद् की बैठक में विभिन्न विषयों के पाठ्यक्रमों को लेकर बहस होनी थी| उसमें अंगरेजी और इतिहास के पाठ्यक्रम भी शामिल थे, जिन्हें लेकर भाजपा से जुड़े शिक्षक संगठन के सदस्यों को कुछ आपत्तियाँ थीं| लेकिन उन आपत्तियों पर कोई विद्वज्जनोचित बहस हो पाने की संभावना को ध्वस्त करते हुए आरएसएस के विद्यार्थी विंग, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् ने मौके पर पहुँच कर जैसा हिंसक हंगामा बरपा किया, उसकी तुलना सिर्फ एबीवीपी के पिछले ऐसे कारनामों से ही की जा सकती है| एबीवीपी के सदस्य बड़ी संख्या में न सिर्फ़ कुलपति कार्यालय के निषिद्ध क्षेत्र में पहुँच गए, बल्कि गाली-गलौज की भाषा में नारेबाज़ी करते हुए वे अंगरेजी और इतिहास के पाठ्यक्रम के निर्माण से जुड़े शिक्षकों—इतिहास विभागाध्यक्ष सुनील कुमार, अंगरेजी विभागाध्यक्ष राजकुमार और विद्वत परिषद् के सदस्य सैकत घोष—को बैठक से बाहर निकालने और भीड़ के हाथ में सौंपे जाने की मांग भी करते रहे|

वाईस रीगल लॉज, जिसमें कुलपति कार्यालय और विद्वत परिषद् की बैठक का कक्ष है, के जिन हिस्सों तक एबीवीपी के कार्यकर्ताओं को प्रवेश मिल पाया, वहाँ तक दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक भी बिना पूर्व-अनुमति के नहीं पहुँच सकते| इससे यह ज़ाहिर है कि उन्हें प्रशासन का पूरा सहयोग मिल रहा था| ‘मार्क्स के दलालों को एक धक्का और दो’, ‘लेनिन की औलादों को एक धक्का और दो’—इस तरह के नारों के बीच अंगरेजी, इतिहास और राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रमों को विचारार्थ वापस सिलेबस-कमिटी को भेज दिया गया|

जनवादी लेखक संघ भाजपा-आरएसएस की ऐसी कारगुजारियों की कड़े शब्दों में भर्त्सना करता है| अगर हमारे विश्वविद्यालय राजनीतिक गुंडागर्दी के दबाव में अपने पाठ्यक्रम तय करने लगें, नए विचारों और आलोचनात्मक सोच को छोड़कर दकियानूसी के प्रोत्साहन का केंद्र बनने लगें, तो विश्वविद्यालयों की ज़रूरत क्या है! तथ्यों और तर्कों की जगह झूठ और आस्था को पाठ्यक्रम-निर्माण का आधार नहीं होना चाहिए और न ही पाठ्यक्रम को विद्वज्जनों के बहस-मुबाहिसे के बजाये राजनीतिक महत्वाकांक्षा से प्रेरित विद्यार्थियों की तोड़-फोड़ से तय होना चाहिए|

हम दिल्ली की कानून-व्यवस्था के लिए ज़िम्मेदार केंद्र सरकार से यह मांग करते हैं कि वह शिक्षकों पर बनाए जा रहे ऐसे ग़ैर-कानूनी दबाव का संज्ञान ले और ऐसे वातावरण की गारंटी करे जिसमें विश्वविद्यालय की विद्वत-परिषद् के लिए दबाव-मुक्त विचार-विमर्श के आधार पर निर्णय ले पाना संभव हो| हम इस कारनामे को अंजाम देने वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के पदाधिकारियों पर अविलम्ब कार्रवाई की मांग करते हैं|

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