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दंतेवाड़ा पुलिस मेरी हत्या करना चाहती है : सोनी सोरी

आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई लड़ने वाली मानव अधिकार कार्यकर्ता सोनी सोरी ने वीडियो जारी कर कहा है कि दंतेवाड़ा पुलिस उनकी ह्त्या करना चाहती है.

मानव अधिकार कार्यकर्ता हिमांशु कुमार ने अपनी फ़ेसबुक पर सोनी सोरी का पीछा करती एक गाड़ी के वीडियो के साथ ये महत्वपूर्ण सूचना साझा की है. हिमांशु का कहना है कि 2 दिन से सोनी सोरी के घर पर बार-बार नोटिस भेजकर उनसे कहा जा रहा है कि वह घर से बाहर न जाएं.

सोनी सोरी का पीछा करती बिना नंबर प्लेट वाली गाड़ी का वीडियो देखिए, वीडियो में सोनी सोरी ने अपने साथ हो रहे अत्याचार और पुलिस की साज़िश के बारे में बताया है. ये पूरी घटना पुलिस अधीक्षक तथा कलेक्टर बंगले के सामने की है.

दरअसल 2012 में बीजापुर के सारकेगुड़ा में हुए जनसंहार में मारे गए 17 निर्दोष आदिवासियों की याद में ग्रामीण वहां एक स्मारक बनाना चाहते हैं इसी से सम्बंधित कार्यक्रम में ग्रामीणों ने सोनी सोरी को आमंत्रित किया है लेकिन पुलिस उन्हें वहां जाने से रोक रही है.

उन्होंने बताया कि इसके अलावा भी अलग-अलग कई जगह से आदिवासी सोनी सोरी को अपने आंदोलनों और अपने साथ होने वाले दमन के बारे में बताने बुला रहे हैं लेकिन पुलिस सोनी सोरी को रोकना चाहती है. दो दिन पहले थानेदार ने व्यापारियों और टैक्सी मालिकों को बुलाकर धमकाया और कहा कि वे सोनी सोरी को अपनी गाड़ी किराए पर ना दें.

कल सुबह से ही सोनी सोरी का पुलिस की एक जीप बिना नंबर प्लेट के संदिग्ध हालत में पीछा कर रही है. सोनी सोरी ने हिम्मत से उस जीप के सामने जाकर पुलिस वालों को चुनौती दी और कहा कि आओ मुझे जान से मार दो मैं तैयार हूं इसके बाद वह पुलिस वाले दुम दबाकर भाग गए.

खबर है कि पड़ोसी जिले बीजापुर में करीब 10 हजार आदिवासी इकट्ठा हैं वह सोनी सोरी को नेतृत्व करने के लिए बुला रहे हैं पुलिस नहीं चाहती कि सोनी आदिवासियों का नेतृत्व करें.

सारकेगुड़ा जनसंहार

छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के सारकेगुड़ा में जून 2012 में हुई मुठभेड़ में गांव वालों ने गोलियां नहीं चलाईं. इस बात के भी सबूत नहीं मिले हैं कि इस मुठभेड़ में नक्सली शामिल थे. यह बात मामले की जांच में जुटे जस्टिस वीके अग्रवाल की न्यायिक रिपोर्ट से सामने आई है. सन 2012 में 28-29 जून को हुई इस कथित मुठभेड़ में सुरक्षा बल के जवानों ने 17 नक्सलियों के मारे जाने का दावा किया था. उनके शव भी बरामद किए गए थे. इस मुठभेड़ की जांच के लिए जांच आयोग का गठन किया गया था. 78 पन्नों की इस रिपोर्ट से सुरक्षाबलों को दावों पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं.

तमाम सामजिक संगठनों और ग्रामीणों ने इस मुठभेड़ को फ़र्ज़ी कहा. जस्टिस वी के अग्रवाल की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने 7 साल बाद जब सरकेगुड़ा मामले की न्यायिक जांच रिपोर्ट सामने राखी में सामने रखी तो नक्सली मुठभेड़ वाली पुलिस की कहानी पर ढेरों सवाल खड़े हो गए.

NDTV में प्रकाशित सारकेगुड़ा न्यायिक जाँच रिपोर्ट के कुछ अहम् बिन्दु

1. मीटिंग खुले मैदान में हो रही थी, न कि घने जंगल में – ऐसा प्रतीत होता है कि यह घटना तीन गांवों (सरकेगुडा, कोट्टागुडा और राज पेंटा) के बीच खुली जगह में हुई थी जो जंगल से सटा है.

2. बैठक के दौरान नक्सलियों की मौजूदगी का कोई सबूत नहीं, हालांकि आयोग ग्रामीणों की इस बात पर सहमत नहीं कि बैठक अगले दिन होने वाले बीज पंडुम त्योहार की तैयारी के लिए बुलाई गई थी, लेकिन मीटिंग में नक्सलियों की मौजूदगी का कोई संतोषजनक सबूत नहीं है.

उक्त परिस्थितियों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि बैठक अहानिकर नहीं थी और बीज पंडुम महोत्सव की व्यवस्था करने के उद्देश्य से नहीं बुलाई गई थी, जैसा कि शिकायतकर्ताओं की ओर से दावा किया गया है. हालांकि यह सच है कि बैठक में इकट्ठे हुए लोग या तीन गांवों – सरकेगुडा, कोट्टागुडा और राज पेंटा से मारे गए या घायल लोग नक्सली थे, इस बात को पुख्ता सबूतों के आधार पर रिकॉर्ड में स्थापित नहीं किया गया है. हालांकि उनमें से कम से कम कुछ लोगों का आपराधिक रिकॉर्ड था जो कि रिकॉर्ड पर मौजूद साक्ष्य से पता लगता है.

3. छह घायल सुरक्षाकर्मी दूसरे सुरक्षा कर्मियों की फायरिंग से घायल हुए थे. सुरक्षा बलों को लगी चोटों का गहराई से विश्लेषण करने के बाद, आयोग का निष्कर्ष है कि उनकी चोटें किसी अन्य पार्टी/लोगों द्वारा दूर से फायरिंग के कारण नहीं हो सकती थीं, और संभवतः वे अपनी ही पार्टी के सदस्यों की क्रॉस फायरिंग के कारण हुई थी. जिस तरह की चोटें घायल सुरक्षा कर्मियों को आई हैं, वह दूर से फायरिंग के कारण नहीं हो सकती थी, जैसे कि दाहिने पैर के अंगूठे पर या टखने के पास चोट. दूसरी बात, गोली से लगी चोटें… केवल क्रॉस फायरिंग के कारण हो सकती हैं, यह अधिक मुमकिन प्रतीत होता है, क्योंकि घटना के स्थान पर चारों ओर अंधेरा था और इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि सुरक्षा बलों के साथी सदस्यों द्वारा चलाई गई गोलियों से ही टीम के अन्य सुरक्षाकर्मियों को गोली लगी.

4. पुलिस की जांच दोषपूर्ण हैं एवं उसमें हेरा-फेरी की गई है: छर्रों आदि का जब्ती नामा ठीक से नहीं बनाया गया था. कथित रूप से इब्राहि खान द्वारा तैयार किए गए जब्ती ज्ञापन में जब्त किए गए सामानों का पूरा विवरण नहीं है. इसके अलावा, जब्त की गई वस्तुओं को ठीक से सील नहीं किया गया था. इस प्रकार, जब्‍ती कानून के द्वारा स्वीकृत प्रक्रिया के अनुसार नहीं थी, जो अत्याधिक विलंब से और मानदंडों के अनुसार नहीं था.

5. इस बात का कोई सबूत नहीं कि सुरक्षाबलों पर फायरिंग छर्रों से हुई थी : आयोग का निष्कर्ष है कि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि सुरक्षा बलों को छर्रों (जो भरमार में प्रयोग होते हैं) से गोली लगी न कि कारतूस (सुरक्षा बालों द्वारा प्रयोग होने वाली बंदूकों से) से. “… यह नहीं कहा और निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि घायल सुरक्षा बलों को छर्रों से मारा गया था और कारतूस से नहीं. इस प्रकार, इस बात की प्रबल संभावना है कि घायल सुरक्षाकर्मियों पर गोली क्रॉस-फायरिंग (उनकी खुद की गोलियों) हुई, जैसा की शिकायतकर्ताओं द्वारा बोला गया है.”

6. सुरक्षाबलों द्वारा की गई गोलीबारी आत्मरक्षा में नहीं थी, बजाय फायरिंग अनुचित और अत्यधिक थी. कम से कम छह मृतक ग्रामीणों के सिर में बंदूक की चोटें थीं. मृतकों में से 11 को उनके धड़ पर गोली लगने की चोटें थीं. 17 में से 10 मृतकों को पीठ पर बंदूक की चोटें थीं, जो स्पष्ट रूप से इंगित करता है कि सुरक्षा बलों ने आत्मरक्षा में गोली नहीं चलाई थी, बल्कि जब मीटिंग में मौजूद लोग गोलियां चलने के बाद घटना स्थल से भाग रहे थे, उस वक़्त उन पर गोली चलाई.” एक व्यक्ति को उसके सिर के ऊपर से गोली मार दी गई थी और बर्स्ट फायरिंग का भी सबूत है, हालांकि सीआरपीएफ ने इससे इनकार किया है

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