आंदोलन दलित

त्रिपुरा में वाम मोर्चे के बहाने दलित चेतना और कम्युनिस्ट अन्तर्सम्बन्ध अनुभव के आधार पर . : जगदीश्वर चतुर्वेदी

8.02.2018

**
जगदीश्वर चतुर्वेदी की फेसबुक वाल से .

 

कम्युनिस्टों का जिन राज्यों में सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव रहा है वहां पर दलितों -अल्पसंख्यकों के ऊपर हमलों की घटनाएं बहुत कम हुई हैं,यह संयोग नहीं है,बल्कि कम्युनिस्ट राजनीतिक सच्चाई है कि वंचितों को ऊँचा सिर करके जीने में उनसे मदद मिली है।

मैं कोलकाता में 27साल से अछूतकन्या के हाथ का खाना खा चुका हूँ,वही सब कामकाज करती थी,उसकी वजह से मैं निश्चिंत होकर लिख-पढ़ पाया ,लेकिन मैंने उसकी भाव-भंगिमा-भाषा-नजरिए आदि में कभी दलितचेतना के दर्शन नहीं पाए,वह हमेशा मजदूरों की भाषा में बेहद सजगभाव से बोलती थी,बहुत साफ समझ रखती थी,वह एकदम अनपढ़ थी,लेकिन सैंकड़ों कविताएं और लोकगीत उसे कंठस्थ थे।बेहद तकलीफ में रहती थी लेकिन हमेशा खुश नजर आती ,बेहद स्वाभिमानी और विनम्र ।

वह लालझंड़े की समर्थक थी,उसके पास मजदूरों की चेतना और हकों की सटीक समझ है,वह बेहद विनम्र है।
तकरीबन अछूतों का अधिकांश हिस्सा बंगाल में अछूतों की तरह नहीं मनुष्यों की तरह सोचता है,यह सब बनाने में कम्युनिस्टों के संघर्षों की बड़ी भूमिका रही है।बंगाल,केरल और त्रिपुरा में दलित सबसे ज्यादा सुरक्षित हैं और सम्मान की जिंदगी जीते हैं।

दलित अपनी मौजूदा बदहाल और शोषित अवस्था से मुक्त हों यह कम्युनिस्टों का सपना रहा है। दलित यदि जातिचेतना में बंधा रहेगा तो वह कभी जातिभेद के चक्रव्यूह से निकल नहीं पाएगा। दलितों के नाम पर आरक्षण एक सीमा तक दलितों की मदद करता है लेकिन दलितचेतना से मुक्त नहीं करता।

कम्युनिस्टों ने हमेशा लोकतांत्रिकचेतना के विकास पर जोर दिया है, इस समय दलितों का बडा तबका लोकतांत्रिक हक के रूप में आरक्षण तो चाहता है लेकिन लोकतांत्रिकचेतना से लैस करना नहीं चाहता,वे आरक्षण और जातिचेतना के कुचक्र में फंसे हैं।

कम्युनिस्ट चाहते हैं दलितों के लोकतांत्रिक हक, जिसमें आरक्षण भी शामिल है, न्यायबोध,समानता और लोकतंत्र भी शामिल है।इनके साथ जातिचेतना की जगह लोकतांत्रिक चेतना पैदा करने और दलित मनुष्य की बजाय लोकतांत्रिकमनुष्य बनाने पर कम्युनिस्टों का मुख्य जोर है, यही वह बिंदु है जहां तमाम किस्म के बुर्जुआदलों और चिंतकों से कम्युनिस्टों के नजरिए का अंतर है।

सामाजिक परिवर्तन के सपने देखना सामाजिक परिवर्तन के लिए बेहद जरुरी है। जो व्यक्ति परिवर्तन का सपना नहीं देख सकता समझो उसका दिमाग ठहर गया है।जड़ ।दिमाग परिवर्तन के सपने नहीं देखता। डरपोक लोग दुःस्वप्न देखते हैं।

वामदलों की बहुत बड़ी भूमिका यह रही है कि उन्होंने आम जनता में सामाजिक परिवर्तन के विचार को यथाशक्ति जनप्रिय बनाया है। क्रांति,बदलाव,सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय, सामाजिक समानता आदि के तमाम नारों का स्रोत क्रांति का सपना रहा है।

क्रांति का मतलब हिंसा या अन्य के प्रति घृणा नहीं है। बल्कि इसका अर्थ है व्यक्ति के द्वारा व्यक्ति के शोषण का खात्मा। यह भावना हम सबमें होनी चाहिए। इस भावना से प्रेरित होकर ही हम अपने दैनंदिन जीवन के फैसले लें। हम जान लें त्रिपुरा में वाम मोर्चा फिर से चुनाव जीतने जारहऊआ रहा है और यह बात जितनी सफाई के साथ समझेंगे अपने हितों की उतनी ही स्पष्टता के साथ रक्षा कर पाएंगे।मजदूरों-किसानों-मध्यवर्ग के हितों के वे सच्चे रखवाले हैं।

**

 

Related posts

औरतें उट्ठी नहीं तो ज़ुल्म बढ़ता जायेगा Women March for Changeभारत में महिलाओं के मार्च के लिए राष्ट्रीय आह्वान, बिलासपुर और भिलाई में हुआ प्रतिरोध मार्च.

News Desk

त्रिपुरा में हिंसा के खिलाफ कल भोपाल के यादगारे-शाहजहानी पार्क में प्रतिरोध सभा और प्रदर्शन .

News Desk

मजदूर दिवस: सिर्फ़ खाने की नहीं साहब मजदूरों की और भी समस्याएँ हैं, पढ़ियेगा तो जानियेगा

News Desk