कला साहित्य एवं संस्कृति

तो टिनोपाल की अपनी कहानी राजकुमार की जुब़ानी

जी हां , आजकल वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी बाजार के उन प्रोडक्ट का जिक्र कर रहे है जो उनके जीवन का अंग बन गये और लंबे समय तक प्रभावित करते रहे . लाईफ बाँय ,ब्लेक केट ,अफगानी क्रीम और बोरोलिन के बाद टिनोपाल की बात कर रहे है.

आज एक छोटी सी पोस्ट नील और टिनोपाल पर. जब मैं सेक्टर छह भिलाई के क्रमांक दो स्कूल में पढ़ता था तो एक रोज अचानक चंद्राकर गुरुजी ने कहा-शनिवार को बाल दिवस होगा. सभी लोग सफेद कपड़े और सफेद जूतें पहनकर आएंगे. सफेद कपड़ों में नील लगी होनी चाहिए. सफेद कपड़ा तो जानते थे और सफेद जूता भी…लेकिन नील के बारे में पता नहीं था.जैसे-तैसे पता चल ही गया कि नील छोटे से डिब्बे में आती है और इसका इस्तेमाल कपड़ों को चमकाने के लिए किया जाता है. शायद उन दिनों ब्लू बर्ड के नाम से कोई नील बाजार में उपलब्ध था.

मुझे बाल दिवस बेहद पसंद था.यही वह दिन होता था जब मैं गाना-वाना गाकर थोड़ा छा जाया करता था.पढ़ाई में औसत था. बस भगवान से यही प्रार्थना करते रहता था कि जैसे भी हो पास कर देना. भगवान बड़े दयालु थे और वे मेरी हर अर्जी पर ध्यान देते थे. शायद भगवान को भी मालूम था कि बंदा अपने पास एक ही काम लेकर आता है. गांधी डिवीजन से लगातार पास होने का किस्सा फिर कभी. अभी थोड़ी सी बात नील की.

तो भाइयों पहली बार जब कपड़ों को नील से धोया तो इतना ज्यादा धोया कि हर जगह नीला-नीला धब्बा रह गया. बाल दिवस में सब मेरा मजाक उड़ाते रहे लेकिन चंद्राकर गुरुजी ने रोने से बचा लिया. उन्होंने सबके सामने कहा-देखो…थोड़ी सी नील को पहले खूब घोलना…फिर उसमें कपड़ा डालकर बगैर निचोड़े सूखा देना.फिर उन्होंने मेरे जूतों की तरफ देखकर पूछा- तुम्हारे जूतें तो चमक रहे हैं. मैंने भी उन्हें बता दिया कि मैं जूतों में नील नहीं बल्कि ब्लैकबोर्ड में लिखने वाली चाक लगाता हूं और ये चाक हर रोज आपसे ही मांगकर ले जाता हूं. वे हंसने लगे. उन्होंने मुझे गाना सुनाने के लिए कहा. गाना सुनाया तो कपड़ों पर लगे नील के दाग मिटने लगे.गाने का असर यह था कि हर कोई मेरी ही टेबल पर बैठना चाहता था. लेकिन कक्षा पांचवी तक मेरा जिगरी दोस्त अलीवर जेकब ही बना रहा. आधी छुट्टी होते ही मैं जमकर गाता था और अलीवर जमकर टेबल बजाता था. नील के बाद टिनोपाल आया और टिनोपाल के बाद रानीपाल लेकिन अलीवर और मेरी दोस्ती कालेज तक कायम रही.

मुफलिसी और बेबसी से भरे हुए दिनों को याद करता हूं तो हिंदी फिल्मों के फ्लैशबैक की तरह पीछे चला जाता हूं. कई बार अतीत की तरफ लौटना अच्छा लगता है. उस अतीत की तरफ जिसमें मजेदार बदमाशियां भी शामिल है. मैं सब कुछ भूल सकता हूं अपनी बदमाशियां नहीं भूल सकता.

लाईफ बाँय ,चैरी ब्लैक कैट ,अफगान स्ऩ और बोरोलिन

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