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तालाब पानी का घर है , हमारी बसाहट ने पानी को बेदखल कर दिया है . पानी परंपरा का एक मंदिर है – ” चुन्नी सिंह तालाब ” :. नवल शर्मा  ,बिलासपुर

तालाब पानी का घर है ,
हमारी बसाहट ने पानी को बेदखल कर दिया है .
पानी परंपरा का एक मंदिर है – ” चुन्नी सिंह तालाब ” यहां का पानी दो गांवों की सरहदों को बांटता और पानी का निस्तार उसे वापस जोड़ देता है । तालाब का एक घाट – लिंगियाडीह में तो दूसरा घाट – मोपका के हिस्से में आता है ।

क़रीबी लोंगों की आस्था – बरसों से यहां बसी है । किनारे पर मंदिर , मेड़ों पर वृक्ष , घाट पर पूरे होते संस्कारों के पूजा पाठ ; सब कुछ लोक जीवन के हिस्से हैं .
अब नहावन की रस्म पूरी नहीं हो पाती , पानी की गहराई – छिछले कीचड़ में बदल गयी है .गणेश – दुर्गा की प्रतिमा हों , ताजिये हों , वक्त ने इनके आकार को ठिंगना कर दिया , पर अब पानी की इतनी भी गहराई न रही कि ठिंगने भी डूब सकें .चुल्लू भर का हो कर सिमट गया – पानी का ये ठौर .

सड़कों की जीभ – ज़मीन को चाटती चलती है .
बिलासपुर से सीपत को जाती सड़क ने इस तालाब की दक्षिणी मेड़ को चाट लिया , बाक़ी की तीन दिशाओं से तालाब को – ‘ विकास ‘ नाम की नयी गाद ने पाट दिया , ‘ पैठू ‘ पर पैठ वाले काबिज हो पसर रहे हैं .
हम सूखे को पाल रहें हैं – तालाबों को पाट रहे हैं ।

चेत जायें – हम , समय रहते । पानी हमारा जिस्म है , और पानी सूख रहा है ।
*
पाटने और चाटने वालों के लिये , साथी ” अजय पाठक ” की कही : ये रही –

दूर्वादल हैं कुछ को हासिल ,
घूम घूम चरने को ।
कुछ को सूखे तिनके दूभर ,
शिकम यहां भरने को ।
कुछ को सुंदर गुफा मिली है ,
कुछ के हिस्से दलदल .

 


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( नवल शर्मा )
*

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