कला साहित्य एवं संस्कृति

तमस’ पढ़ते हुए : अजय चंन्द्रवंशी ,कवर्धा .

‘तमस’ बीसवीं शताब्दी के श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है. इस उपन्यास को पढ़ना एक त्रासदी से गुजरना है. इसको पढ़ने से पता चलता है, स्वतंत्रता के ठीक पूर्व देश की स्थिति कितनी भयावह हो चली थी, साम्प्रदायिकता कैसे मानवता को तार-तार कर देती है, जहां आदमी को अपने पास-पड़ोस के लोग ही, जिनके साथ वह पला-बढ़ा है, दुश्मन नज़र आने लगते हैं. जहां दूसरे धर्मों के स्त्रियों का बलात्कार, हत्या, बच्चों-बूढ़ो की हत्या को ‘धर्मयुद्ध’ घोषित किया जाता है. लेखक ने ठीक ही लिखा है ” लड़ने वालों के पांव बीसवीं सदी में थें, सिर मध्ययुग में”. आज भी स्थिति में कोई बदलाव नज़र नही आती.

          इन साम्प्रदायिक दंगों के पीछे ब्रिटिश सरकार की फूट डालो और शासन करों की नीति की भी महत्वपूर्ण भूमिका थी. वह स्वतंत्रता की मांग से ध्यान हटाने के लिए साम्प्रदायिक झगड़ों को मौन प्रोत्साहन प्रदान करती थी जिसे रिचर्ड के व्यवहार के माध्यम से लेखक ने स्पष्ट किया है. लेकिन इन दंगों के पीछे एकमात्र ब्रिटिश सरकार नही थी.एक तो मुस्लिम लीग की साम्प्रदायिक राजनीति -'ले के रहेंगे पाकिस्तान', जो खुद को मुस्लिमों का एकमात्र प्रतिनिधि मानती थी,दूसरी हिन्दू धार्मिक संघटन जो हिन्दू राष्ट्र का सपना देखते रहें हैं और 'म्लेच्छों'  से देश को 'मुक्त' करना चाहते रहें हैं, ने भी आग में घी डालने का काम किया. इन साम्प्रदायिक झगड़ों के पीछे इतिहास की परछाईयाँ भी है. किसी को अपने अतीत के हार का बदला लेना है तो किसी को खोए साम्राज्य को प्राप्त करना, जो इन लोगों के ज़ेहन में रह-रह के उभर आता है.

          ख़ुद को अपने कौम के रहनुमा बताने वाले लोगों के भी अपने स्वार्थ होते हैं.नत्थू से सूअर मरवाकर मस्जिद के सामने फिंकवाने वाला मुरादअली ही था,जो आखिरी में सबसे पहले नारा लगाता है "हिन्दू-मुस्लिम एक हो"! स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने का दावा करने वाले कांग्रेस के नेताओं का भी स्वार्थ छुपा नही था, वे बड़े-बड़े ठेकेदार, बीमा एजेंट, टिकट की राजनीति करने वाले, दंगो में भी अपना स्वार्थ देख रहे थे.दरअसल हर दंगे का वर्गीय आधार भी होता है.देवदत्त कहता भी है "दोनों ओर ग़रीब कितने मरे, अमीर कितने मरे. इससे भी तुम्हे कई बातों का पता चलेगा". इन दंगों में ग़रीब ही अधिक मारे जाते हैं, अमीर चाहे किसी भी धर्म के हों उन्हें कम नुकसान होता है, क्योकि उनके एक-दूसरे से स्वार्थ सधते हैं. इसे लक्ष्मीनारायण और नूरइलाही के संबंधों से समझा जा सकता है.

           ऐसा नही की दंगों के दौरान सभी लोग अपनी मानवता खो देते हैं.कुछ लोग हमेशा होते हैं जिनमे संवेदना बची रहती है. नत्थु अनजाने में सुअर जरूर मार देता है लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसी सूअर को मस्जिद के सामने फेंका गया है तो वह बेचैन हो जाता है, उसे भय के साथ आत्मग्लानि भी होती है.हरनाम सिंह और उसकी पत्नी बंतो को एक मुस्लिम परिवार पनाह देते हैं, उनको गांव में खतरा होने की खबर भी करीमखान देता है. रघुनाथ और उसकी पत्नी की मदद उसका दोस्त शाहनवाज़ करता है. शाहनवाज़ के माध्यम से भीष्म साहनी जी ने आदमी के अवचेतन मन का बखूबी चित्रण किया है.शाहनवाज़ रघुनाथ के परिवार की ख़ुशी-ख़ुशी मदद करता है, लेकिन आस-पास के साम्प्रदायिक माहौल उसके अवचेतन मन को प्रभावित कर रहे थें, यही कारण है कि वह अचानक नौकर मिल्खी के पीठ पर जोर से लात मार देता है.

          इस उपन्यास के कुछ स्थल इतने डरावने और मार्मिक है कि रोंगटे खड़े हो जाते हैं. जैसे नत्थु द्वारा सूअर को मारना. ऐसा लगता है कि यहां लेखक साम्प्रदायिकता के सूअर से लड़ रहा है जो मरता ही नही. जसवीर सिंह का मुस्लिम बनाया जाना भी अत्यंत मार्मिक है, उसी तरह सिक्ख महिलाओं का बच्चों को साथ लेकर कुआँ में कूदना, रणवीर को हत्या की ट्रेनिंग देना भी डरावना चित्रण है.

           उपन्यास में रिचर्ड के चरित्र के माध्यम से लेखक ने ब्रिटिश प्रशासनिक अधिकारियों के दोहरे चरित्र को दिखाया है. एक तरफ वह अध्ययनशील, इतिहास का अध्येता, प्राकृतिक सौंदर्य का प्रेमी नज़र आता है. लेकिन उसके इस 'प्रकृति-प्रेम' की पोल लीज़ा के इस कथन से खुल जाती है, जब वे दंगाग्रस्त क्षेत्र में दंगे के बाद घूमने निकलते हैं " तुम कैसे जीव हो रिचर्ड, ऐसे स्थानों पर भी तुम नए-नए पक्षी देख सकते हो, लार्क पक्षी की आवाज़ सुन सकते हो?" इस पर रिचर्ड का जवाब ब्रिटिश शासन का यथार्थ है. " इसमें कोई विशेष बात नही लीज़ा, सिविल सर्विस हमे तटस्थ बना देती है. हम यदि हर घटना के प्रति भावुक होने लगें तो प्रशासन एक दिन भी नही चल पाएगा". यह विडम्बना है कि लोग असली दुश्मन ब्रिटिश साम्राज्यवाद को नही समझ रहें थे, और जो समझ पा रहे थें जैसे-जनरैल, उसकी बात को कोई ध्यान नही फे रहा था. आखीर में जब अमन कमेटी की मीटिंग भी होती है तो कालेज में  क्योकि वह "हिंदुओ का था, न मुसलमानों का, कालेज ईसाइयों का था".

कुल मिलाकर यह उपन्यास साम्प्रदायिकता, ब्रिटिश कूटनीति और उससे उपजे समस्याओं का मार्मिक दस्तावेज है, जो आज पहले से अधिक प्रासंगिक है, क्योकि साम्प्रदायिक ताकतें आज पहले से अधिक ताकतवर दिखाई दे रहें हैं.

अजय चन्द्रवंशी
राजा फुलवारी के सामने,
कवर्धा, छत्तीसगढ़,
मो-9893728320

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