कला साहित्य एवं संस्कृति

? ढिबरी की रौशनी में : रंगत ए गोल बाज़ार ——होली के हुडदंग में खोये नवल शर्मा 

3.03.2018

बिलासपुर 

 

होली जली – हुड़दंग शुरू । अगली सुबह के लिये रूकता कौन और रोकता कौन । रंग – गुलाल चेहरे पर और ज़ुबां पर नीचे के बाल .

मन पर थाप कर रखी साल भर की गंदगी और नालियों में बहती घरेलू गंदगी , उलीचने का मौका है ‘ होली ‘ । गंदगी – गलियों में कीचड़ बन कर , हवाओं में गालियां बन कर बहने लगती और मस्ती इतनी कि हर कोई इस गंदगी को जिस्म पर लपेटता और दिल से बाहर फेंक देता । बाहर गहरे रंगों से सराबोर और अंतर मन उजला – उजला । हुड़दंग में कौन बड़ा – छोटा , सब के सब लाल हैं —– बाल हैं .

हलवाई लाइन की दूकानें दो दिन पहले ही , बताशे – शक्कर के सिक्कों से बनी मालाओं से सज जाती थीं । खटिया – तखत पर रंग गुलाल और मनिहारी की दूकानों पर पिचकारियां लटकने लगती । लौंडे लपाड़ी – होली की लकड़ी का चंदा टोलियां बना कर मांगते .

चंदा मांगने का अंदाज़ भी निहायत शरीफ़ाना : अरे ओ सेठ , दे होली का चंदा —– .
चेला : सौ रूपया का टीका लगा सेठ को , सेठ साला लाल है ——- ; दुगुनी ताक़त से जयकारा लगता ———- बाल है .

 


सेठ खिसिया के रूपया देता और गिड़गिड़ा कर कहता – यार – इस बार गू की हंडी मेरी दूकान पर नहीं फूटनी चाहिये ।
बाज़ार की रौनक और रिवाज़ बदस्तूर निभते – निभाये जाते । होली – खेली जाती पर किसी के अहं से खिलवाड़ हो , ये रवायत गोल बाज़ार की कभी न रही ।

इस बार होली का बाज़ार सजने को तो सजा ; चाइनीज़ लाइटों की चकांचौंध में – नोटबंदी के बाद की मंदी की झांई साफ़ – साफ़ दिखलाई पड़ रही है ।दूकानदार इंतज़ार में – ग्राहक नदारद । ग़रीबों का इकलौता त्यौहार – होली। नोटबंदी ने ग़रीबों से त्यौहार झीन लिया ।
रंग तो हैं – बिखेरे कौन , बिखरे नहीं तो लाल कैसे होंगे 

 


  • न लाल हुए न ——- बाल हुए ,
    अबकी होली पर नोटबंदी के शिकार हुए ।
    जैसे भी हो – ग़रीब की होली शुभ हो ———

???

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