कला साहित्य एवं संस्कृति

ठग्स ऑफ हिंदुस्तान गधों-घोड़ों की तरह खरीद रहे हैं,मगर आप आलू की तरह बिक काहे रहे हैं.बादल सरोज.

कर्नाटक में लगी विधायकों की मण्डी में अपने कुछ घोड़ों के बिचक कर भाजपा की हरी घास में पहुंच जाने के बाद से मध्यप्रदेश की कांग्रेस सरकार में दहशत है। सुनते हैं अपने नवनिर्वाचित सांसद बेटे को दिल्ली ले जाकर नरेंद्र मोदी के साथ फोटो उतरवाने सहित बाकी सब करने और कुछ भी न करने के बावजूद मुख्यमंत्री कमलनाथ कारपोरेट की थैलियां लिए गोवा से कर्नाटक होते हुए मध्यप्रदेश की ओर बढ़ते ठगों के गिरोह से चौकन्ने हो गए हैं । अपने हर एक मंत्री पर जिम्मेदारी आयद की है कि वह तीन तीन विधायकों पर नजर रखे । लगता है मंत्रियों की निगरानी वे स्वयं करने वाले हैं ।


● मोदी और अमित शाह की भाजपा ने जरा से समय में भारत के संसदीय लोकतंत्र की चूलें हिलाकर रख दी हैं । खरीद फरोख्त, दल बदल, खुले आम रुपयों – बेशुमार रुपयों – की दम पर कर्नाटक से लेकर गोवा तक सरकारें खरीदने का जो खेल खेला जा रहा है उसकी कोई मिसाल भारत के संसदीय लोकतंत्र को तो छोड़िए दुनिया के किसी लोकतंत्र में नहीं मिलती ।


● यह देश में एकदलीय शासन लाने भर तक का मामला नहीं है । यह 70 के दशक की आयाराम गयाराम के प्रहसन का फिर से मंचन नहीं है । यह उससे कहीं आगे और गुणात्मक रूप से भिन्न और अलहदा मामला है । यह एकानुचालिकवर्तित राज कायम करने की दिशा में उठाया जा रहा एक और कदम है । साम दाम दण्ड भेद और विच्छेद सारी तिकड़मों को आजमा कर देश को विपक्षविहीन करने की शातिर चाल का हिस्सा है । लोकतंत्र की जगह, लोकतंत्र के नाम पर एक ऐसा तानाशाही राज कायम करने का धतकरम है जिस की निकटतम मिसाल सिर्फ फासिस्ट हुकूमतों में मिलती है । बहरहाल इस पर विस्तार से बाद में कभी ।


● कर्नाटक प्रसंग पर इसी अंक में एक अन्य टिप्पणी (देखें पेज 7 पर “जनतंत्र के ध्वंस में जुटी भाजपा”) है । इसलिए उस पर विस्तार में जाने की बजाय मध्यप्रदेश और इस घटनाक्रम के दूसरे पहलू की बात करना प्रासंगिक होगा ।
● ठग्स ऑफ हिंदुस्तान ठगी करके विधायको को खरीद रहे हैं – तो इसमें नई बात क्या है, उनका काम ही यह है !! मगर आप क्यों ठगे जा रहे हैं ? आपकी पूरी की पूरी घान थोक के भाव क्यों बिकी जा रही है ? जाहिर है यह सवाल कांग्रेस के आला कमान से लेकर उसके साधारण कार्यकर्ता तक को खुद से ही पूछना होगा !!


● यह संघ – भाजपा की वैचारिक विजय से अधिक खासतौर से कांग्रेस और आमतौर से उसकी जैसी प्रजाति की वैचारिक पराजय का परिणाम है । राजनीति जब किसी दर्शन या मूल्य के बजाय सिर्फ और केवल आर्थिक कमाई का जरिया बन जाती है तब ऐसा ही होता है । कांग्रेस नाम की सवा सौ साल से ज्यादा पुरानी पार्टी बदलते बदलते अब इतनी बदल चुकी है कि खुद ही खुद को पहचानने में असमर्थ हो चुकी है । गांधी पर हमले हो या नेहरू के खिलाफ कुत्सा का प्रचार, देश की आबादी को धर्म, जाति, उपजाति, गोत्र, क्षेत्र, भाषा, लिंग के आधार पर खंड खंड करने की खुली ऐलानिया हरकतें हों या संवैधानिक संस्थाओं और खुद संविधान पर हमले हों, कांग्रेस में पत्ता भी नहीं खड़कता । एक कांग्रेसी नहीं बोलता । बोलना तो बहुत दूर की बात है, अनेक तो कथित जनभावना के हम्माम में बचे खुचे कपड़े भी उतार कर डुबकी मारने के लिए आतुर तत्पर नजर आते हैं । गांधी नेहरू तो छोड़िये अब हाथी पर बैठकर बेलछी जाने की हिम्मत दिखाने वाली प्रजाति भी नहीं बची है ।


● कारपोरेट की लूट से कराह रहे देश के बारे में बोलेंगे नहीं । साम्प्रदायिक फासीवाद की बढ़त के खिलाफ मुंह खोलने की बजाय कारपोरेट को खुश करने के लिए वामपंथ के खिलाफ चुनाव लडने वायनाड पहुंच जाएंगे । बाबाओं की चरणरज सहेजेंगे, मंत्रालय में घंटा बजाएंगे । गुड़ खाएंगे और गुलगुलों से परहेज़ बताएंगे । ऐसा कहावतों भर में होता है, समाज या राजनीति में नहीं । जिस विचारशून्यता की स्थिति में कांग्रेस है उसमे उसका यही हाल होना है ।


● उधर मोदी अमितशाह की भाजपा सी बी आई से लेकर सारी एजेंसियों को राजनीतिक भयादोहन के लिए झोंके हुए है और इधर मध्यप्रदेश में 15 साल के भाजपा राज के एक भी कुकर्म का आरोपी जेल तो दूर थाने तक नहीं पहुंचा । एक भी नीति नहीं उलटी गई, एक भी अफसर इधर से उधर नहीं हुआ । विश्विद्यालयों से स्कूलों तक वही गिरोह है जिसे हटाने का जनादेश जनता ने दिया था । दलालों के गमछों के रंग बदलने के सिवा कुछ नही बदला ।


● कर्नाटक और गोवा दिख रहा है । मध्यप्रदेश दिखने की ओर बढ़ रहा है । मगर बहुत कुछ और है जो घट रहा है सिमट रहा है, मगर उस अनुपात में दिख नहीं रहा । महाराष्ट्र में विपक्ष का नेता भाजपा में समा रहा है तो आंध्र में पूर्व मुख्यमंत्री कांग्रेस छोड़ भाजपा में जा रहा है । बाकी सब का भी अधिकांश बुलावे के इंतजार में बैठा है ।


● जो अपने बुनियादी सरोकारों को त्याग देते हैं उनके साथ यही होता है और यह बात सिर्फ कांग्रेस के बारे में ही सच नहीं है ।


● सुकून की बात बस इतनी है कि इतिहास जनता बनाती है और जनता किसी के इंतजार की मोहताज नहीं होती । वह तूफ़ानों से आंख दिखाकर, मंझधारो को धता बताती है और मल्लाहों का भरोसा करने की बजाय तैर कर दरिया पार करती है ।


(#तेरीगठरीमेंलागाचोर सम्पादकीय #लोकजतन 16-31 जुलाई 2019)

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