राजनीति

टाईम ने ईदी अमीन पर भी दो अंक निकाले थे एक तारीफ में और दुसरा आदमखोर के रूप में और अब …

नंद कश्यप ,राजनैतिक विश्लेषक

कुछ लोग होंगे जिन्हें अगस्त 1972 याद होगा। युगांडा के राष्ट्रपति ईदी अमीन ने भारतीय मूल के 75 हजार लोगों को तुरंत देश छोड़ने का आदेश दे दिया था। इनमें से 20000 से अधिक लोग ब्रिटिश पासपोर्ट धारी थे।इस संबंध में थोड़ा ईदी अमीन के बारे में भी जान लें।यह एक सामान्य सैनिक था। युगांडा ब्रिटिश उपनिवेश था। आजादी के बाद उसने भारतीय लोकतान्त्रिक व्यवस्था अपनाया।वह भारत से प्रभावित था।मिल्टन ओबोटे जब युगांडा के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने अपने देश के विकास में भारतीयों के भागीदारी को और बढ़ाया।यह बात साम्राज्यवादी देशों और खासकर ब्रिटेन को रास नहीं आया। उसने युगांडा की सेना में अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ईदी अमीन को सैन्य अधिकारी बनवाया और फिर 1971 में सैन्य विद्रोह द्वारा मिल्टन ओबोटे की सरकार का तख्ता पलट करवाया।

ईदी अमीन की सरकार को सबसे पहले मान्यता देने वाला ब्रिटेन ही था। एक प्रतिशत से भी कम जनसंख्या के भारतीयों ने युगांडा के रेल सहित सार्वजनिक परिवहन और बैंकिंग क्षेत्र को विकसित किया था। युगांडा की कुल संपत्ति का बीस फीसदी हिस्सा भारतीयों के पास था। लेकिन इसीलिए युगांडा अफ्रीका के बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश भी था। खैर जिस ईदी अमीन की सरकार को ब्रिटेन ने मान्यता दिया था उसी ईदी अमीन ने अपने को जनरल घोषित कर सेना पर अपना कब्जा कर लिया ताकि उसके खिलाफ कोई सैन्य विद्रोह न हो। फिर उसने अपने को स्काटलैंड का किंग घोषित कर दिया और ब्रिटेन की महारानी को पत्र लिखा कि उसके राजकीय दौरे का इंतजाम किया जाए। फिर 24अगस्त 1972 को भारतीय और ब्रिटिश पासपोर्ट धारकों को देश से निकाल बाहर किया।


उस समय टाईम प्रकाशन संस्था की एक चित्र पत्रिका थी टाईम लाइफ, उसने भी ईदी अमीन पर दो अंक निकाले थे। एक तारीफ में और एक आदमखोर के रूप में। टाईम ने भी पांच साल में मोदी को दो बार जगह दिया एक बार महान दूसरी बार विभाजक के रूप में

        लेकिन  इस तरह से एक खास आबादी को देश से खदेड़ने के बहुत गलत प्रभाव देखे गए हैं। दुनिया के बहुत से देशों में स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आबादियों के बीच तनाव पैदा हुए थे। तीसरे विश्व युद्ध की भविष्यवाणियां होनी शुरू हो गए थे।सत्तर के ही दशक में भारत के कुछ प्रदेशों में भी कुछ विशेष जातियों को भगाने का अभियान छेड़ा गया था। उड़ीसा का मारवाड़ी भगाओ अभियान बहुत हिंसक भी हो गया था।अस्सी दशक लगते लगते उत्तर पूर्व और पंजाब में अलगाववाद पनपने लगा था। मुझे गर्व है कि हम उस विचारधारा के लोग हैं जो मेहनतकश की एकता की बात करते थे और विभाजन कारी ताकतों से लड़ते हुए कुर्बानियां दी है। उड़ीसा से जुड़े हुए होने के कारण छत्तीसगढ़ में भी मारवाड़ी भगाओ अभियान कुछ विघ्नसंतोषी लोगों ने शुरू करने की कोशिश किया था जिसका हमने एसएफआई के बैनर तले विरोध किया था।

लेकिन आज जब सत्ता शीर्ष सारे देश में नेशनल रजिस्टर लागू कर लोगों को खदेड़ने की बात करता है, धर्म के आधार पर, सेना के नाम पर वोट मांगने की बात करता है तो लगता है यह महान देश और उसका लोकतंत्र कहीं ईदी अमीन टाईप लोगों के हाथ तो नहीं आ गया है।
मुझे पूरा भरोसा है भारत का लोकतंत्र बहुत परिपक्व है और यहां की जनता ईदी अमीन पैदा नहीं करेगी।12 मई को प्रेम भाईचारा और शांति के लिए वोट करें। नफ़रत और सामाजिक विभाजन की ताकतों को मुंहतोड़ जवाब दें।
अभी हाल ही में अमेरिकी मीडिया ने राष्ट्रपति ट्रंप की आव्रजन नीति के कारण उसकी तुलना ईदी अमीन से किया है

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