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झारखंड में 133 योजनाएं फिर भी आत्महत्या क्यों कर रहे हैं किसान

झारखंड में किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को मिलाकर कुल 133 योजनाएं चल रही हैं, आखिर इन सब के बावजूद किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं?

किसानों द्वारा आत्महत्या किए जाने की सूचना के बाद, लाश खोजते गांव वाले/ फोटो- आनंद दत्ता

रांची : बीते 10 अगस्त को उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना की शुरुआत की. रांची के हरमू मैदान में आयोजित एक समारोह में मौके पर 13.60 लाख किसानों के बीच 442.48 करोड़ रुपए बांटे गए. लगभग 35 लाख किसानों को इसका लाभ देने की घोषणा की गई. सभी को प्रति एकड़ पांच हजार रुपए.

रांची से 207 किलोमीटर दूर गढ़वा जिले के रक्शी गांव के किसान शिवकुमार बैठा को शायद इसकी जानकारी नहीं थी. अपने पांच लाख रुपए के कर्ज से परेशान थे. यह उन्होंने बैंक और महाजनों से लिए थे. रविवार 12 अगस्त की रात को उन्होंने पत्नी बबीता और दो बेटियों तान्या और श्रेया संग फांसी लगा ली.

बीते 20 दिनों में झारखंड में यह तीसरी घटना थी जब किसी किसान ने आत्महत्या की है. तीनों ही कर्ज में डूबे थे. इससे पहले बीते 30 जुलाई को गुमला जिले के शिवा खड़िया नामक किसान ने आत्महत्या की थी.

उनका 80 प्रतिशत धान का बिचड़ा सूख गया था. शिवा खड़िया के बेटे करमा खड़िया ने बताया कि दो बेटियों की शादी और कर्ज चुकाने की चिंता पहले से थी.

वहीं, 27 जुलाई को रांची जिले के लखन महतो (45) नामक किसान ने अपने ही कुएं में कूदकर जान दे दी. लखन महतो की पत्नी विमला देवी ने बताया कि यह कुंआ उन्होंने कर्ज लेकर मनरेगा के तहत बनवाया था.

कुंआ सूख न जाए इसके लिए 1 लाख 10 हजार कर्ज भी ले लिया और अपनी दो गाय 52 हजार रुपए में भी बेच दिए. कुंआ निर्माण के लिए सरकार से मिलनेवाले पैसों का पूरा भुगतान नहीं हो पा रहा था.

झारखंड कृषि बजट 2017-18  के मुताबिक राज्य में कुल कृषि भूमि के 80 प्रतिशत हिस्सों में एकफसलीय खेती होती है. इसमें भी केवल धान. बाकि 20 प्रतिशत में सब्जी. पूरे राज्य में मात्र 13 प्रतिशत सिंचित भूमि (सिंचाई की उचित्त सुविधा) है. सरकार का दावा है कि कुल 30 प्रतिशत हिस्सों में सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराई गई है, साथ ही वह खुद ही ये मानती है कि इन जगहों पर खेती शुरू नहीं हो पाई है.

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद प्लांडू (रांची) शाखा के रिटायर्ड वैज्ञानिक शिवेंद्र कुमार के मुताबिक सिंचाई और बिजली की उचित्त सुविधा न होने के बावजूद भी किसानों में आत्महत्या जैसी बात कभी नहीं रही. यहां के किसान पहले छोटा-मोटा कर्ज लिया करते थे. अब कुछ लाख में लेने और फसल के उचित्त दाम न मिलने की वजह से हताश हो रहे हैं.

इसी साल एक फरवरी को रांची जिले के ही कुडू सब्जी मंडी में दस से अधिक गांवों के किसानों ने सैंकड़ों टन टमाटर सड़क पर फेंक दिए. क्योंकि यहां उनके एक रुपए प्रति किलो की दर से खरीदा जा रहा था. लागत तो दूर की बात, उन्हें सब्जी लाने में खर्च हुए किराया भी नहीं मिल पाया था.

योजनाएं 133, फिर भी हताश किसान

डायरेक्टर एग्रिकल्चर की ओर से जारी डेटा के मुताबिक पूरे राज्य में अब तक मात्र 36 प्रतिशत धान की रोपाई हो सकी है. वहीं मात्र 22 एमएम बारिश हो सकी है. आठ जिलों में तो 8 प्रतिशत से भी कम बारिश हुई है.

इस वक्त झारखंड में किसानों के लिए केंद्र और राज्य सरकारों की योजनाओं को मिलाकर कुल 133 योजनाएं चल रही हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इन सब के बावजूद किसान आत्महत्या क्यों कर रहे हैं.

जीन कैंपेन नामक संस्था ने झारखंड में कृषि के क्षेत्र में बीस साल से अधिक काम की है. संस्था की निदेशक डॉ सुमन सहाय ने बताया कि यहां के किसान खेती के अलावा जंगल से भी फसल लेते रहे हैं. इसमें जामुन, ईमली, महुआ, कटहल जैसे फसल थे. धीरे-धीरे इसपर निर्भरता कम हो रही है, जिस वजह से वह जल्दी हताश हो जा रहे हैं.

बीते तीन सालों में बढ़ा है आत्महत्या का प्रचलन

बीते तीन सालों में राज्य में 12 किसानों ने आत्महत्या की है. इसमें सबसे अधिक साल 2017 में सात किसानों ने आत्महत्या की.  वहीं कृषि विशेषज्ञ देविंदर शर्मा कहते हैं कि एनसीआरबी के डेटा के मुताबिक 1995 से 2015 तक पूरे भारत में 3,18,528 किसानों ने आत्महत्या की है. यानी हरेक 41 मिनट में एक किसान सुसाइड कर रहा है.

रोते बिलखते किसानों के परिजन । फोटो साभार : आनंद दत्ता

साल 2018 में टीएमसी सांसद दिनेश त्रिवेदी के सवालों के जवाब में संसद में तत्कालीन कृषि मंत्री राधामोहन सिंह ने कहा था कि 2016 से अब तक किसानों के आत्महत्या से जुड़ा डेटा सरकार के पास नहीं है. एनसीआरबी ने इसे जारी नहीं किया है.

झारखंड में राज्य स्तरीय बैंकर्स समिति (एसएलबीसी) की आखिरी बैठक के बाद जारी आंकड़ों की माने तो झारखंड में अब तक मात्र 18 लाख किसानों को ही किसान क्रेडिट कार्ड बांटा गया है. साल 2018-19 में मात्र छह लाख किसानों ने ही इसका इस्तेमाल किया है. बाकि 12 लाख निष्क्रिय रहे.

मंत्री की घोषणा और लोभ में फंस गए किसान

यह विचित्र है कि बीते साल 12 लाख गैर-कर्जदार किसानों ने फसल बीमा कराया. जबकि बैंकों से ऋण लिए मात्र 3.3 लाख किसानों ने ही बीमा कराया. छह लाख किसानों के बीच फसल ऋण बांटा गया है.

19 जुलाई को दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक जून माह में कृषि मंत्री रणधीर सिंह ने सुखाड़ को देखते हुए घोषणा किया कि फसल बीमा प्रीमियम का भुगतान सरकार करेगी. इस घोषणा के बाद किसानों ने फसल बीमा नहीं कराया. अगर वो ऐसा करते तो उन्हें अपने हिस्से का प्रीमियम भरना पड़ता.

इधर मंत्री ने घोषणा तो कर दी, लेकिन इस संबंध में विभागीय आदेश जारी नहीं किया गया है. किसान बीच में फंसकर रह गया है. सरकार ने कुल 27.50 लाख किसानों के फसल बीमा करने का लक्ष्य रखा है.

इस फाइनेंसियल ईयर में 3824.82 करोड़ रुपए ही बांटा गया है. यह कुल लक्ष्य का 46 प्रतिशत ही है. सरकार को यह भी नहीं पता है कि इस फाइनेंसियल ईयर में कितने किसानों ने केकेसी के तहत आवेदन दिया है और कितनों को लोन मिला है.

ठाकुरगांव के किसान राजू साव कहते हैं यहां ज्यादातर किसान साल में एक फसल उगाते हैं, ऐसे में उसपर ही निर्भर रहते हैं. कुछेक जगहों पर ही एक साल में दो फसल उगाते हैं. ऐसे में उस एक फसल का खराब होना, मतलब पूरी तबाही.

सुखाड़ झेलने को फिर तैयार हैं किसान

अभी सुखाड़ का सही से आकलन भी विभाग ने नहीं किया है. स्थिति अगस्त के अंत तक साफ होगी. इससे पहले ही सरकार ने 350 करोड़ रुपए सुखाड़ से निपटने को जारी कर दिए हैं. चीफ सेक्रेटरी डीके तिवारी ने आदेश दिया है कि इन पैसों से दलहन, तिलहन, कम पानी में होनेवाले फसल और उनके लिए खाद-बीज की उपलब्धता बढ़ाई जाए.

साल 2018 और 15 में भी यहां के किसान सुखाड़ झेल चुके हैं. 2018 में 18 जिलों के 129 प्रखंड को सूखाग्रस्त घोषित किया गया था. वहीं साल 2015 में 15.88 लाख हेक्टेयर खेत में 25.69 लाख मिट्रिक टन धान का उत्पादन किया गया था. जबकि साल 2016 में इतने ही खेत में 49.88 लाख मिट्रिक टन उत्पादन हुआ था.

खेती के क्षेत्र में सालों से काम कर रहे विकास भारती संस्था के मुख्य कृषि वैज्ञानिक डॉ संजय पांडेय कहते हैं कि झारखंड के किसानों में आत्महत्या की प्रवृत्ति ना के बराबर रही है. यह पिछले कुछेक सालों में बढ़ा है. उन्होंने बताया कि यहां सिंचाई की उचित्त व्यवस्था का न होना सबसे बड़ी समस्या है.

किसान हैं, उनके लिए योजनाएं हैं. उत्पादन और मंडी के बीच में बिचौलिए हैं. इस बीच कृषि मंत्री रणधीर सिंह पर जनसभा नामक संगठन के इनामुल हक ने करोड़ों रुपए के घोटाले का आरोप लगाया है. इसी संगठन के पंकज यादव ने मामले में सीबीआई जांच की मांग की है. साथ ही हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी इस संबंध में दायर कर दी गई है.

(आनंद दत्ता स्वतंत्र पत्रकार हैं. उनकी ये रिपोर्ट दिप्रिंट की वेबसाईट पर प्रकाशित हो चुकी है. मूल ख़बर का लिन्क नीचे दिया गया है )
https://hindi.theprint.in/india/in-last-20-days-three-farmers-commit-suicide-in-jharkhand/80364/

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