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जाति – व्यवस्था का चक्रव्यूह : लोक शाहिर संभाजी भगत

कल रात यानी कि 28 मई के समाचार के अनुसार डॉ . पायल की संस्थात्मक हत्या के संदर्भ में एक आरोपी को गिरफ्तार करने में मुंबई पुलिस कामयाब हुई । पता चला है कि , बाकी दो फरार घोषित हुई आरोपियों ने गिरफ्तारी से पूर्व जमानत के लिए आवेदन किया है । आरोपियों की पृष्ठभूमि का अध्ययन करने पर नजर आता है कि , जाति – व्यवस्था की प्रपाती संरचना या श्रेणीबद्धता में आरोपियों की ऊँची जाति और पुख्ता आर्थिक स्थिति के कारण न्यायव्यवस्था और पुलिस – प्रशासन को अपने पक्ष में झुकाने की ताकत उनमें अधिक होने की स्वाभाविक संभावना है । इसीलिए अपराध घटित होने के सात दिन के बाद भी उन्हें कोई छू नहीं पाया है । उक्त प्रकरण अगर सड़क पर न आया होता तो शायद अन्य प्रकरणों की तरह इसे भी चारदीवारी में दफ्न कर दिया जाता परंतु प्रकरण के सोशल मीडिया और सड़क पर आने के कारण प्रशासन सक्रिय हुआ । खैर ..

सात दिनों के सतत संघर्ष और खासकर विभिन्न संगठनों द्वारा सड़क पर उतरकर संघर्ष किये जाने के कारण एक नजर में यह आंदोलन सफल कहला सकता है मगर इसतरह के प्रकरणों पर फोकस कर अंत तक लड़ने वाली व्यवस्था आंदोलन के पास नहीं है , इसलिए यह आग धीरे – धीरे ठंडी पड़ जाती है और शेष रह जाते हैं सिर्फ दोनों ओर के अभिभावक .अंततः इसतरह की लड़ाइयों अभिभावकों को ही लड़नी पड़ती हैं । अभिभावक भी अपने – अपने कामों – व्यवसायों में फँसे होते हैं इसलिए बाद बाद में वे भी थक जाते हैं और कहने लगते हैं , जाने वाले की जान तो चली ही गई , अब लड़कर वक्या फायदा ? और आरोपी अंततः छुट जाते हैं या फिर प्रकरण सालोंसाल कोर्ट नामक धीमी गति से चलने वाली पनचक्की पर लटका रहता है और अभिभावक मरनेवाले के दुःख को मन ही मन पचाकर अपनी दिनचर्या में लग जाते हैं । मगर आज उनकी क्या स्थिति है ? क्या पायल की माँ के दिल में लगी आग की कल्पना की जा सकती है ? कल मैंने उसके पिता को टीवी पर देखा । वे बोल रहे थे मगर उनकी आँखें बुझी हुई थीं । पायल के पति की क्या मनःस्थिति होगी ?

उसके भाई – बहन – रिश्तेदारों के गले के नीचे भोजन नहीं सरक रहा होगा । यह , जो बलि हुआ है , उसका पक्ष हैं इसतरह की घटनाओं में जिन्हें आरोपी घोषित किया जाता हैं , क्या वे सुखी हैं ? इसतरह के प्रकरण के आरोपी और उनके परिवारों का आगे क्या हश्र होता है ?
क्या हमने इस बाबत कमी जानने की कोशिश की है ? ? इसतरह के प्रकरणों में सजा मिलने का अनुपात बहुत कम है , मगर जिन्हें सजा होती है , वे जेल में सड़ते रहते हैं । उनका तो समूचा जीवन बरबाद हो ही जाता है परंतु उनके परिवारों का आगे चलकर क्या होता हैं ?


आरम्म में तो जाति के नाम पर किये गये दुराचरण को कट्टर जातिवादी लोग समर्थन देते रहते हैं परंतु बाद में जाति का भूत उतरता जाता है और जाति – व्यवस्था में ऊँची पायदान पर होने का घमंड टूट जाता है और परिवार तबाह हो जाता है । दूसरी ओर जो लोग इसतरह के प्रकरण में छूट जाते हैं , क्या उनके मन में पैठा हुआ जातिरूपी जहरीला साँप मर जाता है ?

इसतरह के आरोपी आदतन अपराधी नहीं होते , फिर भी क्या उन्हें अपने किये का पश्चात्ताप होता है ? इसतरह के सवाल मेरे दिमाग में काफी पहले से आते रहे हैं । रमाबाई नगर हत्याकांड में मेरा जिगरी दोस्त विलास घोगरे गुज़र गया , उस हत्याकांड का प्रमुख आरोपी मनोहर कदम जिसतरह से छूटकर बाहर आया , उसे मैंने प्रत्यक्ष देखा है मनोहर कदम अगर आज जीवित है , तो कैसी जिंदगी जी रहा होगा ? 

खड , खैरलांजी , सनई , कोपर्डी प्रकरणों के कुछ आरोपी जेल में हैं , तो कुछ बाहर हैं । इन्हें बोलने के लिए प्रेरित करना चाहिए । सभी आरोपी बेशर्म नहीं होते । वे अगर बाहर आकर अपना पक्ष स्पष्ट करें , तो जातियों के पाश में जकड़े और इसप्रकार के अपराध अनजाने में करने वाले लोगों का लोक – शिक्षण होगा ।मगर हमारे यहाँ इसप्रकार के अत्याचारविरोधी , निरतर काम करनेवाली और उसका नियंत्रण करने वाली कोई प्रबंध – व्यवस्था अस्तित्व में नहीं है । हैं तो सिर्फ अंधे कानून ! !

डॉ . पायल की मृत्यु के बाद जिसतरह मुझे पायल के परिवारजनों के दुःख से कुम्हलाए चेहरे दिखाई दे रहे हैं , उसीतरह ज्यादा गहराई से विचार करने पर इस प्रकरण की आरोपी तीनों लड़कियों और उनके अभिभावकों के घबराये हुए चेहरे भी दिखाई दे रहे हैं । आप सोचेंगे कि मैं इसतरह का उल्टा विचार क्यों कर रहा हैं ? उनके द्वारा किया गया अपराध बहुत घृणित है , इसलिए जाति – व्यवस्था के शिकार लोगों में उनके प्रति प्रचंड रोष का होना स्वाभाविक है । मगर मेरे मन में रोष के साथ साथ इन लड़कियों के प्रति करूणा भी पैदा हुई है ।

मैंने उनकी फोटो देखी है । वे तीनों तथाकथित सुसंस्कृत परिवार की हँसमुख लड़कियाँ हैं । परंतु उनके इन हँसमुख चेहरे के पीछे जातिकेन्द्रित जहर से जहरीला हुआ मन , मस्तिष्क और हृदय भी है , क्या इसका दर्शन किसी को हुआ था ? क्या वे खुद जानती थीं कि उनके मन में इतना जातिकेन्द्रित जहर भरा हुआ है ? एक नजर में ये लड़कियों शहरी लग रही हैं । क्या उन्होंने कभी गाँव देखे हैं ? क्या उन्होंने कभी देखा है कि , उनके देश में ही गाँव की सीमा के बाहर बसाये जाने वाले आदमी के प्रति किसतरह अन्य आदमी जानवर जैसा व्यवहार करते हैं उनके जातियों की मिल्कियत वाली शहरी सीमाओं के बाहर फैली झोंपडपट्टियों में नरकयातना भगतने वाले जीवों को क्या उन्होंने कभी देखा है ? उनकी सवर्ण बस्तियों के नरक जैसे गटर में उतरकर गू – पानी अपने शरीर पर झेलने वाले मारूति कांबळे को क्या उन्होंने देखा है ? जिस पायल को उन्होंने तंग किया , उस पायल की आदिवासी बस्ती में रोटी के बिना मरने वाले बच्चों के मृत शरीर क्या उन्होंने देखे हैं ?

सच तो यह है कि उन्हें ये बातें किसी ने बताई ही नहीं होंगी कि , रोटी के एक टुकड़े के लिए गइरभर लकड़ियाँ तोड़ने वाले लोग भी इस देश में हैं । उन्हें ऐसी अफवाहों के बारे में फुसफुसाकर बताया गया होगा कि पिछड़ी जातियों के आरक्षण के कारण सवर्ण बच्चों का कितना ज्यादा नुकसान हुआ है । उन्होंने जिस समाज में जन्म लिया है , वहाँ पिछड़े वर्ग को प्राप्त आरक्षणसंबधी नकारात्मक टिप्पणियाँ ही भरपेट खाने के बाद उन्होंने सुनी होंगी । उनके तथाकथित स्टैण्डर्ड स्कूलों में तथाकथित उच्चवर्णीय सर , मैडम द्वारा कक्षा में ही दिया गया भावनात्मक ‘ भाषण उन्होंने सुना होगा , जिसमें वे बताते रहे हैं कि आरक्षण के कारण देश किसतरह रसातल को जा रहा हैं ! मैं 27 वर्षों तक शिक्षक रहा हैं इसलिए शिक्षकों के मन में छिपे जातिकैन्द्रित जहर का मुझे डायरेक्ट फस्र्टहैण्ड अनुभव है । उनके तथाकथित आधुनिक परिवार में सभी रिश्ते उन्होंने जाति के अंतर्गत होते हुए देखे होंगे और उनके सभी रिश्तेदारों की शादियाँ , कुछ सम्माननीय अपवादों को छोड़कर , स्ट्रिक्टली जाति में ही हुई होंगी ।

इन तथाकथित सुसंस्कृत घरों में प्रतिदिन आने वाले और जनमत तैयार करने वाले अखबारों में विवाह के लिए उत्सुक लोगों द्वारा SC / ST माफ कीजियेगा ! ! इसतरह के शीर्षकों के अंतर्गत दिये गये खालिस विज्ञापन भी पढ़े होंगे ! ! ! उनकी शालाओं की शैक्षणिक यात्राएँ इंस्टेन्टली प्रसन्न होने वाले आधुनिक भगवान के दर्शन के लिए गई होंगी और उनकी विज्ञान की शिक्षिका ने इसी भगवान की मनौती पूरी करने के लिए अपनी छात्राओं के सामने ही पूजा की होगी ! किसी भी शाला की शैक्षणिक यात्रा कभी खैरलांजी नहीं जाती या ससुराल के लोगों ने दहेज के लिए जलाई गई बहू को ऍडमिट किये हुए अस्पताल में नहीं जाती । कम से कम एक बार अगर ये बच्चे इस जले हुए देश को देख लें तो शायद वे इंसानियत के कुछ नजदीक हो सकेंगे । मगर अभी तो उन्हें यही लगता है कि इसतरह की दुनिया का कहीं कोई अस्तित्व ही नहीं है । इसीलिए जब ये बच्चे बड़े होते हैं तो बड़े विश्वास के साथ कहते हैं कि अब जातियाँ बची हाँ कहाँ हैं ?इसीलिए इन लड़कियों की वैचारिक समझ जिस ज़हरीले दर्शन की छत्रछाया में विकसित हुई हैं , उसमें इसतरह की बातों की जाँच की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती ।

हमारे देश में जिसतरह खून करने वाले , लूटने वाले , डाका डालने वाले गढे जाते हैं , उसीतरह सांस्कृतिक अपराधी गढ़ने वाली एक समानांतर व्यवस्था है और वह बहुत ही निरीह है । अत्यंत निरीह भाषा में , मृदु स्वर में वह इन सांस्कृतिक अपराधियों को प्रशिक्षित करती है । मजेदार बात तो यह है कि किसी को भी महसूस नहीं होता कि यह अपराध है । जिसके विरुद्ध यह अपराध घटित होता है , उसे भी यह अपराध नहीं मालूम देता । इसलिए अपनी कोई एक हरकत गंभीर छेड़छाड़ है , इसकी कल्पना भी ये सांस्कृतिक अपराधी नहीं कर पाते । इसके विपरीत जाति के प्रति कट्टरता उनके लिए गर्व का विषय होता है । उसके बाद ये अपराधी ही गर्व करते हुए प्रार्थनास्थलों को गिराने चले जाते हैं , या फिर जो जाते हैं , उनका सार्वजनिक अभिनंदन करते हैं या इन सांस्कृतिक अपराधियों के लिए उनकी छाती चौड़ी होती है .

पिछले दिनों उत्तर भारत में एक प्रसिद्ध प्रार्थनास्थल को गिराने के बाद एक बहुत ही निरीह लगने वाला , मगर भीतर से कट्टर सांस्कृतिक अपराधी , जो हमारा तथाकथित दोस्त भी था , बहुत खुश होकर मिठाई बाँटने लगा । उसने मुझे भी मिठाई दी । मैंने लेने से इंकार किया , तो उसने सबके बीच मेरी हँसी उड़ाते हुए कहा कि , इसके सभी अंगों की ठीक से जांच करनी होगी . उसके इस वक्तव्य पर मिठाई खाने वाले मेरी खिल्ली उड़ाते हुए हँसने लगे । खास बात यह है कि यह मिठाई बॉटनेवाला व्यक्ति उच्चवर्णीय नहीं था ! तो इसतरह से सांस्कृतिक अपराधी गढ़ने का बहुत बड़ा कारखाना हमारे देश के भीतर अविराम चल रहा है मगर सतही तौर पर इसकी आशंका भी किसी के मन में नहीं आती ।

इन तीनों लड़कियों को जिस परिवार ने , शाला ने और समाज ने सांस्कृतिक अपराधी के रूप में गढ़ा है , उस व्यवस्था के जहरीले स्वरूप का जरा – सा अहसास भी इन लड़कियों को नहीं होगा । वे डॉक्टर हैं , अर्थात् वे होशियार होंगी , उन्होंने बहुत अध्ययन भी किया होगा , विज्ञान भी पढ़ा होगा । मनुष्य के शरीर की हरेक नस का अध्ययन विज्ञान की रोशनी में किया होगा ।

मेरी बेटी डॉक्टर है इसलिए मुझे अच्छीतरह पता है कि इन्हें किसतरह पढ़ना पड़ता है । रात – दिन मानव – शरीर का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाले डॉक्टरों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बारे में कभी कुछ भी नहीं पढ़ाया जाता अन्यथा अस्पतालों में मंदिर सजाकर ये डॉक्टर नामधारी लोग दुकानदारी नहीं करते । इन तीन लड़कियों को यह दृष्टि इस देश की शिक्षा – व्यवस्था ने प्रदान नहीं की होगी तथा इस दृष्टि को विकसित करने वाले डॉक्टर नरेन्द्र दाभोलकर का नाम तक उनके कानों में न पड़ने की सावधानी इस व्यवस्था ने बरती होगी ।

आराम से अज्ञान का आदान – प्रदान करने वाले इस माहौल में ये लड़कियाँ पली – बढ़ी होंगी ! उन्होंने क्या अपराध किया है , आज उन्हें इस बात का अहसास तक न होगा । जहाँ तक मुझे जानकारी मिली है उसके अनुसार , पायल को फाँसी के फंदे से उतारने का काम इन्हीं लड़कियों ने किया था । फॉसी के फर्दे से उसकी लाश उतारते समय उन्हें क्या महसूस हुआ होगा ?

आज जिस लड़की को पुलिस ने गिरफ्तार किया है , उसकी मनःस्थिति क्या होगी ? जिदगी में कभी पुलिस स्टेशन का मुंह तक न देखने वाली लड़की को कोठरी में क्या लगता होगा ? ? उसके अभिभावकों पर क्या बीत रही होगी ? ? ? जो दो लड़कियाँ फरार हैं , उनकी क्या हालत होगी ?

( लेखक ने यह लेख 29 मई को लिखा है , जब बाकी दो लड़कियों की गिरफ्तारी नहीं हुई थी – अनु . )

जाति – व्यवस्था का जहरीला पौधा अगर उगते ही उखाड़ दिया गया होता तो उसका इसतरह का महावृक्ष नहीं हो पाता और उसमें जहरीले फल नहीं लगते । मगर अब इनको बोने वाले तो जगदगुरु होने जा रहे हैं ! जाति – व्यवस्था सिर्फ इसकी बलि चढ़ने वालों की गर्दन नापती है , यह अर्धसत्य है बल्कि जाति – व्यवस्था के लाभार्थियों का भी इसने बहुत नुकसान किया हैं । जातिरूपी साँप मन में धारण करने वाला मनुष्य क्या वास्तविक मानव – जीवन जी पाता है ? कदापि नहीं । मनुष्य के रूप में जन्म लेने के बावजूद जाति – व्यवस्था उसे मनुष्य नहीं बनने देती । विशिष्ट जाति का वृथा अभिमान मन में पालनेवाला मनुष्य , मनुष्य नहीं बन पाता , सार्थक जीवन नहीं जी पाता ! ! एक खोखली कुंठा उसकी इंसानियत छीन लेती है । इसीलिए इंसानियत की खोज में इसतरह के बेचैन लोग मंदिरों के सामने लम्बी लाइनों में प्रतीक्षा करते रहते हैं , बाबा महाराज के सत्संग में अपनी तथाकथित उच्च शिक्षा की मृतप्राय उपाधियाँ छोड़कर अज्ञानरूपी अफीम के नशे में झूमते हुए दिखाई देते हैं ।

इसके बाद नशे से चूर यह भीड़ किसी तानाशाह की खोज में मतदान की कतारों में दिखाई देने लगती हैं । क्या इसे इंसानी जिंदगी कहेंगे ? उसे क्या एक बार भी इस बात का अहसास होता है कि मनुष्य जन्म कितना महान है ? ? इसके विपरीत , मैं और मेरे लोग जाति – व्यवस्था के शिकार होने के बावजूद , चूंकि हमारे जीवन को बुद्ध का संस्पर्श हुआ है , इसलिए गरीबी में भी हमारा मन करूणा से ओतप्रोत रहता है । हम प्रत्यक्ष दुःखभोगी होने के बावजूद किसी दूसरे को दुःख देने की विकृति हममें नहीं है । हम खुद लुटे हुए होने के बावजूद हमें किसी और को लूटने की इच्छा नहीं है ।

जातीय दंगों में हमारे ही घर जलते हैं फिर भी हम किसी के जलते घर नहीं देख सकते । यह करूणा ही अखिल मानव जाति के सुख का सपना हमें दिखाती हैं , मगलमय मैत्री की फैलनेवाली बेल हमारे दिल में जड़ जमाए हुए है इसीलिए इन लड़कियों के प्रति मेरे मन में करुणा उपजी हैं । इतिहास में जिन्होंने जाति – व्यवस्था का निर्माण किया , उनके उत्तराधिकारी के रूप में से तथाकथित उच्च वर्ग के लोग जी रहे हैं इसीलिए उनके हिस्से में इसप्रकार का निरर्थक जीवन है ।

मगर यही जीवन उन्हें लाभार्थी प्रतीत होता है । यही इनकी और सुख की या जीवन की राह खो गई है । इसीलिए इस ज़हर को जड़ से समाप्त करने का काम उन्हें ही करना होगा , जिन्होंने यह जहर बोया है । बाबासाहेब मी यही कहते थे । भारत के बाहर भेदभाव काले – गोरे के बीच था , जो आज भी कछ अशों में शेष है । मगर वहाँ के गौरवर्णीय लोग जल्दी समा गए और उन्होंने इस भेदभाव को पाटने की कोशिश की । मगर हमारे यहाँ उच्चवर्णीयता का इंजेयशन लगे हुए लोग अब भी होश में आने के लिए तैयार नहीं हैं ।

जिसतरह पायल इस जाति – व्यवस्था का शिकार हुई है , उसीतरह ये आरोपी लड़कियाँ भी जाति – व्यवस्था की ही शिकार हैं । यह बात जब तक तथाकथित उच्चवर्णीय लोगों की समझा में नहीं आएगी , तब तक मानस – जीवन के दरवाजे उनके लिए बंद ही रहेंगे । अगर इस देश में सभी लोगों को विशुद्ध मानव के रूप में रहना हो तो इस जहरीले पौधे को उखाड़ फेंकने के लिए उच्चवर्णियों को पहल करनी ही होगी ।

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लोक शाहिर संभाजी भगत

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