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जागरूक आदिवासी सरकार के लिए सिरदर्द, नक्सली बताकर ‘चुप’ कराने की कोशिश!: तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट ,जनचौक से

स्पेशल रिपोर्ट , बस्तर, शुक्रवार , 05-01-2018

जन चौक से आभार सहित

तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट

बस्तर। छत्तीसगढ़ के आदिवासी जबसे भारत के संविधान में लागू अपने अधिकारों को जान कर अमल करने लगे हैं, संविधान से प्रदत्त मिनी संसद (ग्राम सभा) को मिली शक्तियों का प्रयोग करने लगे हैं, तबसे वे सरकार की आंखों में खटकने लगे हैं।

आदिवासियों का कहना है कि छत्तीसगढ़ की रमन सरकार संविधान का उल्लंघन कर ग्राम सभा के अधिकारों को साजिशन कुचलने में लगी हुई है। बस्तर में ग्राम सभा के सदस्यों और अध्यक्ष/सभापति के ऊपर नक्सली होने का आरोप लगाया जा रहा है, जिससे ग्राम सभा को कमजोर किया जा सके। उन्हें फर्जी नक्सल मामलों में जेल भेजने की साजिश की जा रही है। धमकाया जा रहा है। 

आपको बता दें कि उत्तर बस्तर कांकेर जिला के पखांजूर परतापुर में पारम्परिक ग्राम सभा के सदस्यों, सभापति/अध्यक्ष, सचिवों के खिलाफ नक्सली जैसे गंभीर आरोपों में मामले दर्ज कर दिए गए हैं। 

आदिवासियों के मुताबिक ये सब फर्जी मामले हैं। दरअसल पिछले दो सालो से पखांजूर के गांवों में ग्रामीण संवैधानिक पारम्परिक ग्राम सभा कर फैसले लेने लगे थे। इससे पुलिस प्रशासन और अन्य प्रशासनिक अमला खफा होने लगा जिसके चलते पुलिस ने ग्राम सभा को निशाना बनाते हुए सदस्यों और सभापति/अध्यक्ष के खिलाफ नक्सल आरोपों में मामले दर्ज करने शुरू कर दिए। 

मालूम हो कि पारम्परिक ग्राम सभाओं के अध्यक्ष/सभापति की वही संवैधानिक शक्ति होती है जो शक्ति लोकसभा/राज्यसभा/विधानसभा के अध्यक्ष/सभापति की होती है।

आदिवासियों का सीधा आरोप है कि ओ.आई.जी.एस अर्थात ऑलट इंडिया गवर्नमेंट सर्विस के सेवक ही लोकतांत्रिक मूल्यों और शक्तियों के विकेंद्रीकरण की हत्या कर असंवैधानिक कृत्य कर राजद्रोह का अपराध कर रहे हैं। यह बेहद गंभीर मामला है।

 

हाल ही में पुलिस ने परतापुर ग्राम सभा के अध्यक्ष राजाराम कोमरा और सदस्य श्यामलाल कोमरा के खिलाफ नक्सली आरोप लगा कर मामला दर्ज कर लिया है। 

अध्यक्ष राजाराम ने पुलिस अधीक्षक कांकेर को लिखित शिकायत करते हुए कहा कि मुझे एक दैनिक अखबार से पता चला है कि नक्सलियों द्वारा लगाए गए आईडी बम में मेरा नाम अथवा श्यामलाल का नाम जोड़ दिया गया है और मामला दर्ज कर लिया गया है। पत्र में उन्होंने कहा कि “मैं नक्सली नहीं बल्कि एक आम भारतीय नागरिक हूँ और परतापुर ग्राम सभा का अध्यक्ष हूँ और श्यामलाल परतापुर ग्राम सभा के सदस्य हैं। परतापुर के थाना प्रभारी द्वारा ग्राम सभाओं द्वारा लिए जा रहे संवैधानिक निर्णयों से द्वेष पूर्ण उनका नाम नक्सल मामलों में जोड़ दिया है। पुलिस इस प्रकार से संविधान के विरुद्ध राजद्रोह कर रही है।”

जानकार बताते हैं कि किसी गांव में अगर नक्सल वारदात होती है तो आस-पास के ग्रामीणों के नाम मामले में दर्ज कर लिए जाते हैं। उन ग्रामीणों को मालूम भी नहीं रहता कि उनके खिलाफ मामले दर्ज हैं। उन्हें अखबारों के माध्यम से पता चलता है। ऐसे सैकड़ों लोग बस्तर में है जिनका नक्सलवाद से दूर-दूर तक नाता नहीं है लेकिन उनके खिलाफ बाकायदा थानों में मामले दर्ज हैं। यह बात नक्सली मामलों में बेकसूर रिहा होने वालों की संख्या से भी साबित होती है।

परतापुर ग्राम सभा के सचिव अमृत तांडिया ने बताया कि परतापुर में स्थित कोटरी नदी में ग्राम सभा के बिना अनुमति आदेश के  अवैध रूप से रेत उत्खनन कर परिवहन किया जाता था और पुलिस इस पूरे मामले में सहयोग कर अवैध वसूली करती थी लेकिन ग्राम सभा ने इसमें हस्तक्षेप कर अवैध परिवहन पर रोक लगाते हुए परिवहन करने वालो को ग्राम सभा द्वारा जारी प्रस्ताव/निर्णय के सदस्यों को टैक्स चुकाने के लिए कहा इससे पुलिस नाराज हो गई जिसके चलते राजाराम और श्यामलाल को नक्सल मामलों में जोड़ दिया गया।

उधर परतापुर के थाना प्रभारी राकेश खुटेश्वर के मुताबिक चार लोगों के खिलाफ 307 आईपीसी 4,5 एक्सप्लोसिव एक्ट  जान से मारने का प्रयास, विस्फोट रखने इस्तेमाल करने के तहत आरोपी बनाया गया है  जिसमें राजाराम और श्यामलाल भी शामिल हैं। इससे आगे उन्होंने जानकारी न होने से इंकार करते हुए जांच करने  की बात कही है।

मालूम हो कि यह दो ही मामले नहीं हैं। इनके अलावा पखांजूर क्षेत्र की ग्राम सभाओं के दर्जनों मामले हैं। 30 अक्टूबर को राजेश नुरेटी जो अंजडी ग्राम सभा के सदस्य हैं उन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया कि वह एक मोबाइल दुकान में बैठे हुए थे और उनके मोबाइल की फ्लैश लाइट जल गई। वहां मौजूद पुलिस को लगा कि यह नक्सलियों का खबरी है और उनके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 151 लगाकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

ऐसे ही परतापुर से राजकुमार नाग  धारा 151 लगाकर जेल भेज दिया गया। बिसहू हुपेंडी को भी 151 लगा कर जेल भेजा गया। लिखित में जिन्होंने पुलिस और सुरक्षा बलों द्वारा मारपीट की  शिकायत की है उनमें लोकेश चक्रधारी, अक्षय चक्रधारी ने परतापुर पुलिस स्टेशन में मारपीट का आरोप लगाया है, वही गौतम नर्वस को ग्राम सभा नहीं करने को लेकर मारपीट कर धमकाया गया, रानू कवाची ने सुरक्षा बलों के द्वारा नक्सल आरोप लगाते हुए बेहोश होने तक पीटने की शिकायत की है। कलपर से बुर्सू पद्दा को नक्सल आरोप के तहत मामला दर्ज कर जेल भेज दिया गया।

पखांजूर क्षेत्र के ग्राम सभा संगठनों के संयोजक सुखरंजन उसेंडी कहते हैं कि राज्य सरकार भारत के संविधान का उल्लंघन कर रही है। आदिवासियों को पांचवी अनुसूची के तहत प्रदत्त ग्राम सभा के अधिकार को हर संभव कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। क्षेत्र में ग्राम सभा काफी सक्रिय है और ग्राम सभा के प्रस्ताव के बिना कोई कार्य नहीं होता है इसी वजह से इसे कमजोर करने के लिए ग्राम सभा के सदस्यों, अध्यक्षों के ऊपर पुलिस फर्जी मामले बनाकर कार्रवाई कर रही है। उसेंडी बताते हैं कि क्षेत्र में लगभग 300 गांवों में 150  गांवों में ग्राम सभा सक्रिय है। 

उसेंडी ने आरोप भी लगाया है कि छोटेबेठिया बाजार से एक ग्राम सभा सदस्य मनीराम नुरेटी को पुलिस ने जबरन उठाया था जिसका आज तक पता नहीं है। इसको लेकर कई बार आंदोलन हुआ और ग्राम सभा से प्रस्ताव पारित कर प्रशासन के समक्ष रखा गया लेकिन किसी प्रकार का उचित जवाब नहीं मिला। 



क्या है आदिवासियों की मिनी संसद (ग्राम सभा)?

पारंपरिक ग्राम सभा को अनुसूचित क्षेत्रों में विधायिका, न्यायपालिका व कार्यपालिका की शक्ति, भारत के संविधान के  अनुछेद 13(3) क, 244(1), पांचवीं अनुसूची के पैरा 2 व 5 तथा भारत सरकार अधिनियम 1935 के अनुच्छेद 91, 92 से प्राप्त है।  

उच्चतम न्यायालय ने समता का फैसला 1997 में साफ कहा है कि अनुसूचित क्षेत्रों में केंद्र व राज्य सरकार या गैर आदिवासी की एक इंच जमीन नहीं है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(5),19(6) अनुसूचित क्षेत्र में गैर आदिवासियों की स्वतंत्रता के अधिकार को प्रतिबंधित करते हैं। 

यह अधिकार इन क्षेत्रों में लोकसभा न विधानसभा, सबसे ऊंची पारंपरिक ग्रामसभा (वेदांता का फ़ैसला 2013) से ज्यादा साफ होता है। इसलिए इन क्षेत्रों में कोई भी जमीन अधिग्रहण, निर्माण परियोजना, नई योजना लागू करने से पहले पारंपरिक ग्राम सभा का अनुमति आदेश अनिवार्य होता है।

पेसा कानून

पेसा कानून लाने का उद्देश्य आदिवासी क्षेत्रों में अलगाव की भावना को कम करना और सार्वजनिक संसधानों पर बेहतर नियंत्रण तथा प्रत्यक्ष सहभागिता के साथ आदिवासियों की परंपरागत लोकतांत्रिक रूढ़ी प्रथा गत व्यवस्था के साथ जल जंगल जमीन वनोपज गौड़ खनिज पर पूर्ण अधिकार तय करना था। जिसकी जमीन उसका खनिज इसका मूल उद्देश्य था इनका नारा था मावा नाटे,मावा राज। आदिवासियों की लम्बी लड़ाई के बाद  73 वें संविधान संशोधन में पेसा कानून को सम्मिलित किया गया। 

पेसा कानून के अनुसार किसी भी ग्राम पंचायत में सरपंच, पंच व सचिव सर्वोच्च नहीं हैं पारम्परिक ग्रामसभा का निर्णय आदेश  बड़ा होता है। सरपंच व सचिव पंच एक सरकारी एजेंट होते हैं। पूरा अधिकार पारम्परिक ग्राम सभा के पास होता है।

ग्राम सभा के निर्णय सर्वमान्य व सर्वोच्च हैं लेकिन इसके उलट व्यवस्था जिला प्रशासन द्वारा सरपंच व पंच को सर्वोच्च बता दिखाकर ग्राम सभा के प्रस्ताव निर्णय को अमान्य किया जा रहा है जो कि संविधान की मूल भावना के विपरीत है।

तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट

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