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जब तक आप खुद को स्वीकार नहीं करते तब तक समाज कैसे स्वीकार करेगा ट्रांसजेंडर – विद्या राजपूत

अशिका कुजूर की रिपोर्ट आज की जनधारा के लिये .

 राजधानी रायपुर में पिछले कुछ दिनों से सार्वजनिक जगहों पर अचानक ही इन्द्रधनुष देखने को मिल जाता है. हम बात कर रहे हैं  LGBTQ समुदाय की, जिनके द्वारा फ़्लैश म़ोब के जरिये समाज में थर्ड जेंडर को सम्मान और हक दिलाने के लिए जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. रेलवे स्टेशन हो या मरीन ड्राइव, समुदाय के लोग डांस और अभिनय के द्वारा प्रस्तुति दे रहे हैं. जिसे देख कर शहरवासी आश्चर्यचकित हो उठते हैं. अगली कड़ी में अगला फ़्लैश म़ोब आज शाम भिलाई सिविक सेंटर में है. 

इस बारे में जब समुदाय की अध्यक्ष श्रीमती विद्या राजपूत से बातचीत हुई तब उन्होंने बताया कि हम जैसे हैं उसी रूप में समाज हमें स्वीकार करने में हिचकिचाता है. हम एक अलग शरीर में जन्म लेते हैं. हमारी भावनाएं अलग होती है. समाज की जो अवधारणाएं होती है हमारी कम्युनिटी को लेकर वो ऐसी हैं की लड़कों को लड़के के शरीर में और लड़कियों को लड़कियों के शरीर और लिबास में देखने की होती है. हम जैसे हैं हमें वैसे ही कोई स्वीकार नहीं करता है.जिसकी वजह से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है. लोग मानसिक रूप से प्रताड़ित होते हैं, अकेलापन महसूस करते हैं, आत्महत्याएं करते हैं, सेक्सुअल एब्यूज ज्यादा होता है, ओरल एब्यूज भी ज्यादा होता है. जिसकी वजह से एचआईवी (HIV) पाजिटिविटी बढ़ जाती है. 

जैसे ही हम अपना लिबास बदलते हैं, हमारे घर वाले भी हमें स्वीकार नहीं करते तो समाज कैसे स्वीकार करेगा. इसकी वजह से हम जैसे लोग घर छोड कर अपने कम्युनिटी के लोगों के साथ ही रहते हैं. जब हमें कोई काम नहीं देता है तो आखिर में घूम-घूम कर मांगना, ट्रेन हो या डोर टू डोर जाकर मांगना हो, वेश्यावृत्ति इत्यादी के अलावा कुछ नहीं बचता. एक तरफ लोग हमें स्वीकार नहीं करते और दूसरी तरफ ऐसे काम करने के लिए ताने भी देते हैं. 

सरकार ने हमारी कम्युनिटी के लिए कई तरह की सुविधाएँ दी हैं. स्कूल शिक्षा मुहैया कराई है. घर दिया है, लोंन की सुविधायें दी हैं. लेकिन इसके बावजूद समाज में अब तक वो सम्मान नहीं मिल पाया है जो एक आम नागरिक को मिलता है. हम कई सालों से सरकार के साथ मिलकर कम्युनिटी को सम्मान और उनका जीवन जीने का अधिकार दिलाने के लिए काम कर रहे हैं.सुप्रीम कोर्ट ने 15 अप्रैल 2014 को यह नियम लागू किया कि जो खुद को ट्रांसजेंडर घोषित करते हैं, वही ट्रांसजेंडर पर्सन हैं, अब वो किस लिबास में रहते हैं यह उनकी स्वतंत्रता है.

थर्ड जेंडर को लेकर जो मिथ्या लोगों के मन में होती हैं उसके बारे में राजपूत जी बताती हैं कि ट्रांसजेंडर में ट्रांसमेंन और ट्रांसवीमेन दोनों ही आते हैं.हिजड़ा समुदाय जो एक परिवार की तरह रहते हैं. गप्पा, शिवशक्ति, कोती ये सभी आते हैं. सरकार ने जब धारा 377 को खत्म किया तब जो गे, लेस्बियन, बायसेक्सुअल हैं, लोग उन्हें लैंगिक अल्पसंख्यक के रूप में जानने लगे हैं. 

अपना अनुभव बताते हुए कहती हैं कि मैंने खुद लड़के के रूप में जन्म लिया था. लेकिन मेरी असल पहचान एक लड़की थी. जीवन में कई तरह की समस्याएं आई लेकिन मैंने कोशिश करना कभी नहीं छोडा. आधी जिन्दगी संघर्ष में बिताया है जिसका परिणाम यह है कि आज की जनरेशन खुल कर सामने आ पा रही है, अपनी पहचान को स्वीकार कर रही है. जो देख कर बहुत अच्छा लगता है की मेहनत रंग ला रही है. सबसे पहले हमें खुद को स्वीकार करना पड़ेगा. हम खुद स्वीकार करते हैं तभी आत्मविश्वास बढेगा. इसके लिए कोई और मदद नहीं कर सकता है. हमें अपने आप से प्यार करना होगा. फिर वो दिन दूर नहीं जब समाज में हम सामान्य रूप से जीवन जी पायेंगे. कोई हमें अलग नज़र से नहीं देखेगा.

कम्युनिटी में लोगों की कई तरह की समस्याएं होती हैं. यहाँ जेंडर आइडेंटिटी, भावनायें,पसंद,जेंडर अभिव्यक्ति की लड़ाई  इत्यादी कई चुनौतियाँ हैं.  जब 2008 में कम्युनिटी का समूह बनाया था तब सिर्फ वही लोग जुड़े थे जो हिजड़ा समुदाय के थे. लेकिन आज LGBTQ  में सभी तरह के लोग जो जेंडर सम्बंधित पहचान चाहते हैं, जुड़ते जा रहे हैं. 

सरकार की तरफ से जागरूकता के लिए कई अभियान चलाये जा रहे हैं. और कई कार्यक्रम कम्युनिटी के द्वारा भी की जाती है जैसे अभी हाल ही में रायपुर में फ़्लैश म़ोब के द्वारा कई जगहों में थर्डजेंडर की समस्याओं को डांस और अभिनय के माध्यम से लोगों के सामने रखने की कोशिश कर रहें हैं. छत्तीसगढ़ में लोगों का ढेर सारा प्यार और अपनापन मिल रहा है.

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