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जब-जब झूठ गढ़े जाते हैं तब-तब नेहरु और निखर के सामने आते हैं

स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों में नेहरु जी की आज तक जितनी आलोचनाएँ हुई हैं, और एक विचारधारा विशेष के लोगों के द्वारा उनके लिए जितने प्रकार के झूठ गढ़े गए हैं, भारत के इतिहास में शायद ही किसी राष्ट्र नायक के साथ ऐसा हुआ हो.

चूंकि नेहरू देश की आजादी के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बने अतः देश की सफ़लताओं अथवा असफलताओं के लिए वे आलोचनाओं से मुक्त हो भी नही सकते.

प्रारम्भ से ही नेहरू के जीवन पर गांधी जी का विशेष प्रभाव रहा है. उस समय देश के सुप्रसिद्ध एवं नामी बैरिस्टर मोतीलाल नेहरू के इकलौते वारिस जवाहर लाल नेहरू लन्दन की केम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध ट्रिनिटी कॉलेज से लॉ की डिग्री लेने के बाद जब स्वदेश लौटे तो किसी ने यह सोचा भी नही था कि मूँह में सोने की चम्मच लेकर पैदा होने वाला यह युवा, गांधी जी के आह्वान पर खादी के कपड़े पहन कर लोगों की समस्याओं को समझने के लिए देश गाँव-गाँव, गली-गली छान मारने निकल पड़ेगा. 

उन दिनों एक उच्चशिक्षित, देश और दुनिया के इतिहास की अच्छी समझ रखने वाला, आधुनिक और  वैज्ञानिक दृष्टिकोण का हिमायती, बेहद सौम्य एवं खूबसूरत युवा जवाहर लाल नेहरू, गांधी जी के बाद देश का सर्वाधिक प्रसिद्ध नेता बन गया था. नेहरू ने अपनी जवानी के बहुमूल्य दस साल से भी अधिक समय अंग्रेजो की काल कोठरी में बिताए. जब टीबी की बीमारी से उनकी पत्नी कमला नेहरू का देहावसान हुआ तब भी वे जेल में ही थे. जेल में ही उन्होंने “भारत एक खोज”, “विश्व इतिहास की झलक” जैसी अमर कृति की रचना की जिनका इतिहास में एक विशेष महत्व है. जेल से ही उन्होंने पुत्री “इंदिरा” को पत्र लिखे जो “पिता का पत्र पुत्री के नाम “से संकलित है. 

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में जब उन्होंने शपथ ली तब देश अनेक कठिनाइयों एवं चुनौतियां से जूझ रहा था. बंटवारे के दंश ने करोड़ो लोगों के जीवन को बुरी तरह से प्रभावित किया था. यह विभाजन दुनिया का सबसे बड़ा इंसानी माइग्रेशन था. हिन्दू-मुस्लिम दंगो से पूरा देश जल रहा था. अंग्रेज भारत को पूरी तरह से कंगाल कर स्वदेश वापस लौट चुके थे. अब बेरोजगारी, अशिक्षा, बढ़ती जनसंख्या, एवं शरणार्थियों का पुनर्वास, हमारी सबसे बड़ी समस्या थी. उस वक्त तक हम अपनी जरूरत का अनाज भी नही उगा पाते थे. नेहरू के सामने देश को इन समस्याओं से उबार कर बाहर ले जाने की बड़ी चुनौतियां थीं. उन्होंने इन चुनौतियों को स्वीकार किया और देश के विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं, योजना आयोग जैसे संस्थान बनाए. सिंचाई के लिए भाखड़ा नांगल, सरदार सरोवर बांध, हीराकुंड जैसे अनेक बड़े-बड़े बांधो की आधारशिला रखी. बोकारो, भिलाई जैसे अनेक अत्याधुनिक कारखाने बनवाए. उन्होंने इन कल-कारखानों को आधुनिक भारत के तीर्थ कहा था. आईआईटी, आईआईएम, एम्स जैसी विश्वस्तरीय संस्थानो की नींव रखी. वे देश की समृद्धि के लिए विश्व मे शांति को आवश्यक मानते थे. वे दुनियां को हथियारों की अंधी दौड़ से बाहर निकलना चाहते थे. वे चाहते थे कि देश का जो पैसा हथियार खरीदने में व्यय होता है वो पैसा लोगों की भलाई में खर्च हो इसीलिए उन्होंने अमेरिका एवं सोवियत रूस गुट से अलग कर्नल नासेर, डेनिस टीटो के साथ मिलकर गुट निरपेक्ष की नींव रखी और चीन के साथ पंचशील समझौता किया. हिंदी चीनी भाई भाई के नारे लगाए पर बदले में चीन ने नेहरू की पीठ पर छुरा घोंप दिया.

नवनिर्माण के दौर से गुजर रहे देश को अनचाहे युद्ध मे कूदना पड़ा और बिना कारण के चीन द्वारा थोपे गए इस युद्ध में भारत को हार का सामना करना पड़ा. यह आलोचना का विषय हो सकता है कि नेहरू ने सैन्य तैयारियों की जगह देश के नवनिर्माण को तरजीह क्यों दी ?

जब नेहरू जी के कार्यों की आलोचना होती है तब आलोचकों द्वारा तमाम झूठ भी गढ़े जाते हैं. ये आलोचक उन्हें कभी सरदार भगत सिंह के विरोधी के तौर पर पेश करते हैं तो कभी नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के दुश्मन के तौर पर पेश करते रहे हैं तो कभी सरदार पटेल के विरोधी के रूप में पेश कर उनके व्यक्तित्व को छोटा बनाने का प्रयास करते हैं.

दरअसल नेहरू पर जब-जब झूठ गढ़े जाते हैं तब-तब वे और निखर कर सामने आ जाते हैं. सरदार भगत सिंह एक जगह लिखते हैं कि देश के युवाओं को चाहिये कि वे गांधी, सुभाष की अपेक्षा नेहरू जो तरजीह दें. नेहरू के विचारों में एक ताजगी है और इस वक्त पंजाब के युवाओं को वैचारिक खुराक की आवश्यकता है जो केवल नेहरू के विचारों से ही पूरी हो सकती है.

कुछ लोग नेता जी सुभाष चन्द्र बोस के नाम पर नेहरू को बदनाम करने के लिए ऐसे कुतर्क गढ़ते हैं जिससे जाने अनजाने वे नेताजी का ही अपमान कर जाते हैं. वे अफवाह फैलाते हैं कि नेता जी आजादी के बाद भी कई सालों तक जीवित थे और नेहरू के डर से छुप-छुप कर भारत में रह रहे थे. क्या कोई मान सकता है कि नेता जी जैसी शख्सियत जिसने आजाद हिंद फौज बनाकर पूरे अंग्रेजी सम्राज्य के खिलाफ लड़ाई लड़ी थी वे अपने ही देश में गुमनाम जिंदगी जीते हुए वर्षों तक छुप कर रहना कुबूल करते?  नेहरू को नीचा दिखाने के लिए ऐसे अनेक झूठ गढ़े जाते रहे हैं. नेहरू जी, नेता जी के अनन्य साथी एवं समर्थक थे.

नेता जी सुभाष के गांधीजी के साथ वैचारिक मतभेद जरूर रहे हैं पर उनके मध्य के आपसी सम्मान को समझ पाना सबके बूते की बात नहीं है. ऐतिहासिक तथ्य है कि जब नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने आजाद हिन्द फौज की कमान अपने हाथ मे ली तब उन्होंने रेडियो पर देश को सम्बोधित करते हुए गांधी जी को “राष्ट्रपिता” का प्रथम सम्बोधन दिया. उन्होंने अपनी एक बटालियन का नाम गांधी जी के नाम पर तथा दूसरी बटालियन का नाम नेहरू जी के नाम पर रखा. महिला बटालियन का नाम रानी लक्ष्मी बाई के नाम पर रखा था. अगर वैचारिक मतभेदों के बावजूद उनमें एक दूसरे के लिए सम्मान नहीं होता तो क्या कोई व्यक्ति अपने विरोधी के लिए इतना सम्मान जाहिर कर सकता है ?  

आज भी नेहरू जी के खिलाफ झूठ गढ़े जा रहे हैं. उन पर आजादी के बाद नेता जी और उनके परिवार की जासूसी कराए जाने का झूठ फैलाया गया. नेता जी से सम्बंधित जिन दस्तावेजों को कांग्रेस सरकार सार्वजनिक नही करना चाहती थी इस सरकार ने आते ही उन फाइलों को सार्वजनिक किया. उन्हें उम्मीद थी कि शायद उन फाइलों में नेहरू के खिलाफ कुछ निकल जाए पर उन फाइलों में जो निकल कर सामने आया, विरोधियों की पैरो के नीचे से जमीन ही खिसक गई. नेहरू जी ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की बेटी एवं पत्नी की काफी आर्थिक मदद की थी यह सिलसिला इंदिरा गांधी तक भी चलता रहा.

अब नेहरू जी को नीचा दिखाने के लिए सरदार पटेल को हथियार बनाया जा रहा है. झूठ फैलाया जा रहा है कि देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू नहीं सरदार पटेल बनने वाले थे, गांधी जी की जिद की वजह से नेहरू जी प्रधानमंत्री बने. जबकि सच्चाई यह है कि उस समय देश के सामने नेतृत्व का कोई विवाद ही नही था. उस वक्त नेहरू जी देश के निर्विवाद नेता बन चुके थे. नेहरू और सरदार पटेल दोनों, सरकार के दो आधार स्तम्भ थे. सरदार पटेल द्वारा नेहरू को लिखे खत में उन्होंने नेहरू के नेतृत्व में काम करने को खुद के लिए गौरव का क्षण बताया है.

जब देश आजाद हुआ तब नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने और सरदार पटेल को उप प्रधानमंत्री एवं गृह मंत्रालय का कार्य सौंपा गया. देश की तमाम छोटी-बड़ी रियासतों के एकीकरण की जिम्मेदारी सरदार पटेल पर थी जिसे उन्होंने बखूबी अंजाम भी दिया. आलोचक इस कार्य का पूरा क्रेडिट केवल गृह मंत्री सरदार पटेल को देते हैं. पर क्या ऐसा महत्वपूर्ण कार्य देश के प्रधानमंत्री की बगैर सहमति या बगैर निर्देशन के सम्भव हो सकता है? वही लोग आज की कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को पूरी तरह जिम्मेदार ठहरा देते हैं. सच यह है कि सरदार पटेल कश्मीर मसले पर हाथ ही नही डालना चाहते थे. आज कश्मीर भारत के साथ जितना और जैसा है वह नेहरू की वजह से है अगर नेहरू नही होते तो कश्मीर हमारे साथ नही बल्कि पूरा का पूरा पड़ोसी देश के साथ होता यह एक कड़वी सच्चाई है.

‌नेहरू के कार्यों को देखें तो वे लोकतंत्र के सबसे बड़े हिमायती के रूप में उभर कर आते हैं. उन्होंने जितनी विरोधी आवाज़ों को सुना और उन्हें महत्व दिया ऐसा दुनियां के इतिहास में कम ही दिखाई पड़ता है. तमाम वैचारिक मतभेदों के बावजूद उन्होंने डॉ आंबेडकर को देश का पहला कानून मंत्री बनाया. जनसंघ के श्यामा प्रसाद मुख़र्जी को कश्मीर मामले का मंत्री बनाया. पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी की वाक क्षमता के वे कायल थे और वे हमेशा प्रयास करते थे कि अटल बिहारी जीत कर संसद में जरूर पहुँचें. गांधी जी की हत्या के बाद जब सरदार पटेल ने आरएसएस पर प्रतिबन्ध लगा दिया तब पंडित नेहरू ही थे जिन्होंने आरएसएस पर लगे प्रतिबंध को हटवाया था क्योंकि वे चाहते थे कि आरएसएस जैसी संस्था देश के लिए रचनात्मक कार्य करे. 

“क्योंकि नेहरू विचारों को कुचलने के नही बल्कि विचारों को बदलने की हिमायती थे”

आलेख : यासीन खान
संकलन : प्रतीक वासनिक

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