पर्यावरण

छत्तीसगढ़ : सीएसई रिपोर्ट: प्रदेश में एक साल में ही प्रदूषण से 29 हज़ार मौतें, धूल के कण भी 40-60 % तक उड़ रहे.

आम आदमी पत्रिका से सामार

राज्य में हवा में घुल रहे हानिकारक तत्व जानलेवा हो गए हैं। यह चौंकाने वाली बात सामने आई है सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट में। भारत पर्यावरण रिपोर्ट-2019 के मुताबिक छत्तीसगढ़ में एक साल में 29,841 मौतें हुईं हैं। इतना ही नहीं, 3230 लोग प्रदूषित हवा के कारण शारीरिक रूप से कमजोर हो गए। रिपोर्ट ये भी बताती है कि अगर पर्यावरण में सुधार के उपायों को अपनाकर वायु प्रदूषण की रोकथाम की जाए तो राज्य में औसत आयु प्रत्याशा यानी जीवन जीने की संभावनाओं को 1.6 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। प्रदूषित हवा से सालभर में हो रही मौतों के मामले पूरे देश में छत्तीसगढ़ 12वें नंबर पर है। उत्तरप्रदेश में सबसे ज्यादा 2 लाख 60 हजार 28 मौतें वायु प्रदूषण की वजह से सालभर में हो रही हैं, लेकिन चिंताजनक बात ये भी है कि वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली विकलांगता में छत्तीसगढ़ तीसरे नंबर पर है। राजस्थान में दूषित हवा की वजह से सबसे ज्यादा 3744 लोग विकलांग हुए हैं। दूसरे नंबर पर उत्तरप्रदेश है, जहां प्रदूषित हवा की वजह से सालभर में 3 हजार 717 लोग विकलांगता के शिकार बने। 

रिपोर्ट में प्रदेश में स्वास्थ्य की स्थिति का भी आंकलन किया गया है, जिसके मुताबिक राज्य में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में 45 प्रतिशत डॉक्टरों या चिकित्सा अधिकारियों की कमी है। सप्ताह के सातों दिन स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया कराने वाले केवल 40.4 प्रतिशत अस्पताल ही हैं। राज्य के हॉस्पिटल में एक बार भर्ती होने के बाद मरीज को औसतन 14 हजार 43 रुपए का खर्च स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए करना पड़ता है। इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं नहीं मिलती हैं। 

निगरानी के दावे फेल, चिमनियों से निकल रहा काला धुआं 

प्रदूषण की रोकथाम के लिए जिम्मेदार एजेंसियां नियमित रूप से निगरानी के दावे करती हैं, लेकिन सीएसई की रिपोर्ट ने दावों को गलत साबित कर दिया है। औद्योगिक क्षेत्र में आज भी कारखानों की चिमनियों से काला धुआं निकलता रहता है। सिर्फ उद्याेग ही नहीं, बल्कि शहरों में कचरे को खुलेआम जलाया जाता है। इस पर रोक के बावजूद कोई सख्ती नहीं की जा रही है। एनजीटी के आदेश के बावजूद शहरी निकाय सॉलिड वेस्ट मैनेजमेंट में कोताही बरत रहे हैं। 

डॉक्टरों की कमी के मामले में 

अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश में चौथे नंबर पर है। बिहार के 63.6 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों की कमी है, जबकि इसके बाद मध्यप्रदेश दूसरे नंबर पर है, जहां 58.3 प्रतिशत प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों की कमी है। झारखंड तीसरी पायदान पर है, जहां 48.7 फीसदी डॉक्टरों की कमी है। 2013 के मुकाबले प्रदेश में क्वालिफाइड डॉक्टरों की तादाद में 40 फीसदी तक कमी हुई है। 

सतत विकास लक्ष्य में 

सतत विकास के लक्ष्य हासिल करने में प्रदेश का स्कोर 58 है, जो पूरे देश में इस श्रेणी में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों हिमाचल और केरल से 11 अंक पीछे है। दोनों राज्यों को इसके लिए 69 अंक हासिल हुए हैं। पीने के साफ पानी और सफाई के और लाइफ ऑन लैंड के बिंदू पर राज्य बेस्ट है। पीने के साफ पानी और सफाई में हमारा स्कोर 98 और लाइफ ऑन लैंड में हमारा स्कोर 100 है।

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