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छत्तीसगढ़ पीयूसीएल के राज्य सम्मेलन में मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर दमन और जन विरोधी कानूनों के को वापस लेने की मांग . आगामी दो साल के लिये आंदोलोनों के लिये गये संकल्प .

25.02.2019 रायपुर

छत्तीसगढ पीयूसीएल का राज्य सम्मेलन रायपुर मे 24 फरवरी को आयोजित किया गया .सम्मेलन में विभिन्न जिलों से करीब सौ प्रतिभागियों ने भाग लिया.आगामी दो साल के लिये नई कार्यकारणी का चुनाव किया गया .संगठन की गतिविधियों की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई और आगामी काल के लिये कार्यभार तय किये गये.


सम्मेलन के पश्चात पीयूसीएल की महासचिव सुधा भारद्वाज तथा अन्य मानव अधिकार कार्यकर्ताओं की रिहाई एवं उनपर झूठे मुकदमों को वापस लेने की मांग को लेकर जय स्तंभ चौक से अंबेडकर चौक तक प्रभाव शाली विरोध प्रदर्शन किया गया .


सम्मेलन ने तय किया कि वो छत्त्तीसगढ विशेष जन सुरक्षा अधिनियम को रद्द करने ,जेल में बड़ी संख्या में आदिवासीयों की रिहाई ,सामाजिक कार्यकर्ताओं ,पत्रकारों पर झूठे मुकदमें वापस लेने .पत्रकार सुरक्षा कानून पारित करने. सामाजिक बहिष्कार कानून बनाने, सलवा जुडुम के समय में हत्याओं, आगजनी ,महिलाओं के साथ यौन हिंसा की जांच करने तथा जिम्मेदार लोगों को सज़ा दिलाने ,सुप्रीम कोर्ट के निर्देश की रोशनी में अपराधों के लिये जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों पर जुर्म दर्ज करने उनपर कानूनी कार्यवाही करने , सुप्रीम कोर्ट के निर्णय जिसमें पूरे देश में करीब 23 लाख आदिवासियों तथा अन्य समुदायों के विस्थापन के खिलाफ सरकारों द्वारा आपराधिक लापरवाही और षडयंत्रों के खिलाफ़ एवं आंदोलन करने एवं समुचित कार्यवाही करने का निर्णय लिया .

राज्य सम्मेलन ने निम्न मुद्दों पर चिंता व्यक्त की तथा प्रस्ताव पास करके कार्यवाही की मांग की .

1. पूरे देश में मानव अधिकार कार्यकर्ताओं, लेखकों, अधिवक्ताओं, मज़दूर संगठनों के कार्यकर्ताओं,मानवाधिकार दलित एक्टिविस्टों और संगठनों पर दमन की कार्यवाही की जा रही है, जिसमें PUCL छत्तीसगढ़ की महासचिव सुधा भरद्वाज भी शामिल हैं, जो न केवल मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं, बल्कि पेशे से वकील, मज़दूर संगठन की नेत्री एवं छत्तीसगढ़ में विस्थापन से पीड़ित समुदायों के पक्ष में संघर्षशील साथी भी हैं । भीमा कोरेगांव की शौर्य परंपरा के खिलाफ कार्यकर्ताओं को षड्यंत्रपूर्वक गिरफ्तार किया गया, और उन पर झूठे तथ्यहीन आरोप लगाए गए जिन के अंतर्गत सुधा भारद्वाज, सुरेन्द्र गडलिंग, शोमा सेन, महेश राउत, अरुण फेरेरा, वेरनॉन गोंसाल्वेस, वरवरा राव, और रोना विल्सन गिरफ्तार हैं, और गौतम नवलखा, फादर स्टेन स्वामी और आनंद तेलतुम्बडे को प्रताड़ित किया जा रहा है, और गिरफ्तार करने के लिए घेराबंदी की जा रही है।

PUCL छत्तीसगढ़ राज्य सम्मेलन इन गिरफ्तारियों की निंदा करता है तथा राष्ट्रपति से मांग करता है कि गिरफ्तार मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को रिहा किया जाए, झूठे प्रकरण रद्द किये जाए, तथा देश में ऐसा माहौल बनाया जाए जिसमे लोकतांत्रिक अधिकारों की बात की जा सके और संविधान की सुरक्षा की जा सके।

2.राज्य सम्मलेन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित 13 फरवरी 2019 के आदेश पर अप्रसन्नता ज़ाहिर करता है, जिसके कारण पूरे देश में लगभग 23 लाख 30 हज़ार परिवार अर्थात 1 करोड़ परिवारों के विस्थापन का खतरा पैदा हो गया है। ऐसा पहली बार होगा जब कि इतनी बड़ी संख्या में आदिवासी और अन्य समुदायों का विस्थापन हो सकता है। केंद्र एवं राज्य सरकारों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में समुचित पैरवी न करने के कारण ही यह स्थिति उत्पन्न हुई है। अतः छत्तीसगढ़ PUCL राज्य सम्मलेन मांग करता है कि समुदायों की रक्षा के लिए कोर्ट में समुचित कार्यवाही की जाए, और यदि आवश्यक हो तो अध्यादेश लाया जाए।

3. तमाम दमनकारी कानूनों – AFSPA, UAPA, ,छ ग विशेष जन सुरक्षा कानून जैसे जन विरोधी कानूनों की कोई आवश्यकता नहीं है और उन्हें अविलंब समाप्त किया जाए।

4.बस्तर समेत छत्तीसगढ के विभिन्न जेलों में माओवादी आरोपों में गिरफ्तार तमाम निरपराध विचाराधीन आदिवासी बंदियों को रिहा किया जाए, और उनके ऊपर दर्ज मुक्कद्दमें वापस लिए जाएँ।
5. मानवाधिकार हनन के मामले में कुख्यात पीलिस अधिकारियों पर मुक्कद्दमे चलें।


6.पिछले कई वर्षों से हो रही फर्ज़ी मुठभेड़ों की जांच हो।
7. सैनिक और अर्धसैनिक बलों द्वारा आदिवासी महिलाओं पर यौन हिंसा और उत्पीड़न की जांच हो, और अप्राधियो को जल्द सज़ा मिले।


8 पत्रकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर विद्वेषपूर्वक दर्ज किये गए मुक्कद्दमे वापस लिए जाएँ।
9 सलवा जुडूम के समय की हिंसा, प्रतिहिंसा, आगज़नी, विस्थापन, यौन हिंसा, महिला उत्पीड़न, हत्याओं के सम्बन्ध में सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश के अनुरूप व्यापक जांच की जाए, ज़िम्मेदार लोगो पर अपराध दर्ज किये जाए, तथा पीड़ित लोगों को न्याय और राहत प्रदान की जाए।


10. पत्रकारों और मानवाधिकार रक्षकों की सुरक्षा के लिये एवं अभिव्यक्ति की आज़ादी सुनिश्चित करने के लिए एक कानून बनाया जाए।


11.सामाजिक बहिष्कार के विरुद्ध और इस बहिष्कार से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकारों को सुरक्षित करने के लिए एक कानून बनाया जाए

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