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छत्तीसगढ़ : धान ख़रीदी केन्द्रों में बारदाना की कमी से परेशान किसानों पर पुलिस ने किया लाठीचार्ज

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मंगलवार 18 फरवरी की रात छत्तीसगढ़ के केशकाल इलाके में किसानों पर पुलिस ने बेरहमी से लाठीचार्ज कर दिया इसमें कई किसान घायल हो गए। उन्हें इलाज के लिए अस्पताल लेजाया गया। ये किसान धान ख़रीदी केन्द्रों मे बारदाना उपलब्ध कराने की मांग कर रहे थे। इस लाठीचार्ज मे नवभारत के एक संवादाता को भी चोट आई है।

आज धान ख़रीदी का आखिरी दिन है और लाखों किसान अब भी अपना धान नहीं बेच पाए हैं। धान ख़रीदी की समयसीमा बढ़ाने की मांग किसान सभा ने की थी पर उसे नहीं माना गया।

बारदाना न होने के कारण प्रदेश के अधिकांश केन्द्रों मे धान ख़रीदी नहीं हो पाई है।

भाषणो मे किसान हितैषी भाजपा, समर्थन मूल्य बढ़ाने को राज़ी नहीं

2018 मे सत्ता मे आने के बाद प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने अपने चुनावी वादे के अनुरूप किसानों से 2500 प्रति क्विंटल की दर से धान की ख़रीदी की थी। और हर साल इसी दर पर ख़रीदी करने की बात कही थी।

किसानों की आय दुगनी करने का वादा करने वाली केंद्र की भाजपा सरकार ने धान का समर्थन मूल्य बढ़ाने के छत्तीसगढ़ सरकार के फैसले को सिरे से नकार दिया। केंद्र ने राज्य को एक धमकाता हुआ खत लिखा कि 2500 रुपए की कीमत पर यदि उसने धान की ख़रीदी की तो केंद्र सरकार सेंट्रल पूल में छत्तीसगढ़ का चावल ख़रीदेगी ही नहीं।

इस बार भूपेश सरकार ने इस बार 85 लाख टन धान ख़रीदी का लक्ष्य रखा था। उसके लिए ये चिंता का विषय है कि यदि सेंट्रल पूल मे उसका चावल नहीं ख़रीदा गया तो इतने चावल का वो करेगी क्या।  

लेकिन केंद्र की भाजपा सरकार के दबाव में या सीधे शब्दों मे कहें तो केंद्र सरकार की धमकियों के चलते छत्तीसगढ़ सरकार को अपने फैसले से पीछे हटना पड़ा और उसने धान का न्यूनतम समर्थन मूल्य घटाकर 1815 और 1835 रुपये प्रति क्विंटल कर दिया।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इस मामले में कहा कि भारतीय जनता पार्टी की तुष्टि के लिए सभी संग्रहण केन्द्रों में 1815 और 1835 की दर के ही बैनर लगाए जाएंगे और बचे हुए अंतर की राशि अलग से किसानों को दी जाएगी। इसके लिए पाँच मंत्रियों की एक समिति भी बना दी गई है।

इस समिति ने क्या नीति बनाई इस बारे मे तो जानकारी नहीं है पर ये ज़रूर कहा जा रहा है कि धान ख़रीदी उस मात्र में नहीं हुई जीतने कि सरकार ने घोषणा की थी।

बारदाने की व्यवस्था तो राज्य सरकार को ही करनी थी

भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने आरोप लगाया कि भूपेश सरकार 2500 मे धान न खरीदकर किसानो को धोखा दे रही है। हालांकि इस आरोप का कोई सिर-पैर नहीं है। 2500 कीमत की मंजूरी केंद्र को देनी थी जो उसने नहीं दी इसलिए रमन सिंह का ये आरोप बेबुनियाद हो जाता है।

लेकिन…केन्द्र सरकार की इस आनाकानी के अलावा, इतनी बड़ी मात्रा में धान खरीदने के लिए भूपेश सरकार के द्वारा जिस तरह के इंतजामात किए जाने थे उनमें भारी कमी देखी गई।

धान ख़रीदी केन्द्रों में बारदाने की कमी होना ऐसी ही एक समस्या है।

रस्सी के जिस बोरे मे धान रखा जाता है उसे बारदाना कहते हैं। पूरे छत्तीसगढ़ से बारदाने की किल्लत के समाचार आ रहे हैं।

बंसल न्यूज़ ने लिखा है कि कवर्धा, दामापुर, सुकली, कुंडा, कूवामालगी, राजनवागांव समेत 50 से भी अधिक केन्द्रों मे बारदाने की कमी के कारण धान ख़रीदी नहीं हो सकी। पेंडरा में भी लंबी कतारें लगी रहीं।

नईदुनिया ने लिखा है कि बड़गांव में बारदाने के आभाव में ख़रीदी नहीं होने से नाराज़ किसानों ने बुधवार को हाइवे क्रमांक 25 में चक्काजाम कर दिया। बड़गांव धान उपार्जन केन्द्र में तकरीबन 311 किसान पंजीकृत धान बेचने मे असमर्थ हैं इनके लिए लगभग 10 हज़ार बारदानों की ज़रूरत है।

एक और खबर में अखबार लिखता है कि गुरुवार कि सुबह बारदाने कि कमी के चलते पथरिया में ग्राम पीड़ा, भूलन, डाकचाका के किसानों ने एसडीएम कार्यालय आकार नारेबाज़ी की।

पखांजूर के पीव्ही 78 धान खरेदी केन्द्र के बाहर भी किसानों ने चक्काजाम किया। इस केन्द्र मे न तो संचालक है, न कंप्यूटर ऑपरेटर है और न बारदाना ही उपलब्ध है।

यही हाल कांकेर का भी है। शहर के पुराना बस स्टैंड में प्रदर्शन करते हुए आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने कहा कि बारदाने की कमी के कारण इलाके के सभी केन्द्रों मे धान ख़रीदी बन्द है।

न्यूज़ 18 ने लिखा है कि धान ख़रीदी कि अंतिम तिथि यानि 20 फरवरी के पहले ही सुकमा इलाके के कई केन्द्रों मे ताले लटक रहे हैं।

दैनिक भास्कर की खबर के अनुसार कोंडागांव के 44 में से 30 केन्द्रों में बारदाने की समस्या बनी हुई है।

केशकाल से 14 किलोमीटर दूर बहीगांव में सोमवार को धान ख़रीदी मे हो रही देरी, बारदाने की कमी के विरोध में किसानों ने राष्ट्रीय राजमार्ग में चक्काजाम कर दिया। केशकाल विधानसभा के 3 ब्लॉक के किसान हजारों की संख्या में दोपहर 1 बजे हाइवे पर बैठ गए। किसानों ने कहा “कि 15 दिनों से टोकन लेकर भटक रहे हैं पर यहां बारदाना नहीं है, कलेक्टर नीलकंठ टीकाम और विधायक मोहन मरकाम से भी हम इसकी शिकायत कर चुके हैं। जब किसी ने कोई कदम नहीं उठाया तो हमें मजबूरन चक्काजाम करना पड़ा”।

किसानों पर लाठीचार्ज क्यों

धान ख़रीदी केन्द्रों मे भंडारण की व्यवस्था करना राजी सरकार की ज़िम्मेदारी है। उसे ठीक करने के बजाए प्रशासन ने आंदोलनरत किसानों पर ही लाठीचार्ज कार्वा दिया।

18 फरवरी की रात केशकाल में बारदाना उपलब्द कराने की मांग कर रह किसानों को पुलिस ने बेरहमी से पीटा। इलाज के लिए अस्पताल आए किसानो के विडियो फुटेज भी प्राप्त हुए हैं।

छत्तीसगढ़ किसान सभा ने इस लाठीचार्ज की निन्दा की है। छत्तीसगढ़ किसानसभा के अध्यक्ष संजय पराते और महासचिव ऋषि गुप्ता ने कहा कि पंचायत चुनाव बीत जाने के बाद कांग्रेस सरकार सीधे तौर से दमन पर उतर आई है। लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार पुलिस अधिकारी पर कार्रवाई कि मांग करते हुए उन्होने धान ख़रीदी की समयसीमा को 28 फरवरी तक बढ़ाने की मांग की है।

उन्होने कहा कि “बारदाना संकट सरकार की अक्षमता का प्रमाण है। दिनभर में बारदाना तक न जूता पाने वाली सरकार ने रात के अंधेरे में किसानों पर लाठीचार्ज करके अपना किसान विरोधी चरित्र दिखा दिया है। उन्होने कहा कि पूरे प्रदेश में बारदाना संकट का एकसाथ आना इस बात का प्रमाण है कि शुरू से ही ये सरकार धान ख़रीदी के घोषित मूल्य को प्राप्त करने के प्रति गंभीर नहीं थी।“  

सरकार कहती है आंदोलन प्रायोजित है

प्रदेश में धान खरीदी को लेकर जगह-जगह किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को पहले खाद्यमंत्री अमरजीत भगत ने प्रायोजित बताया और फिर कृशिमंत्री रवीद्र चौबे ने भी इस विरोध प्रदर्शन को प्रायोजित कह दिया है।

मंत्री रवीन्द्र चौबे ने कहा कि मंगलवार तक 82 लाख टन धान ख़रीदा जा चुका है। बारदाना आपूर्ति के आदेश दे दिए गए थे। जो असंतोष दिख रहा है वह प्रायोजित हैं।

धान के समर्थन मूल्य के अंतर की राशि का भुगतान किसानों को किए जाने के बारे में उन्होने कहा कि बजट में 5 हज़ार करोड़ की अतिरिक्त राशि की व्यवस्था की गई है।

वैसे किसानों के आंदोलन को प्रायोजित कहने वाला छत्तीसगढ़ कांग्रेस का ये बयान वैसा ही है जैसा महाराष्ट्र और केंद्र की भाजपा सरकार ने कहा था जब हजारों किसान पैदल मार्च करते हुए मुंबई गए थे। या जब उड़ीसा के हजारों किसान दिल्ली में पेशाब पीकर विरोध कर रहे थे। तब भी वहां की सरकारों ने उन किसान आंदोलनों को प्रातोजित कह दिया था।

किसान सभा ने कहा कि 3 लाख से ज़्यादा किसान अब तक सोसायटियों मे नहीं पहुंच पाए हैं। उन्होने कहा कि जिन 16 लाख किसानों का धान खरीदने का दावा सरकार कर रही है, वो केवल आंकड़ेबाजी है, क्योंकि इनमें से अधिकांश किसान अपना पूरा धान नहीं बेच पाए हैं।

उन्होने ये भी आरोप लगाया है कि धान ख़रीदी से बचने के लिए सरकार ने पूरे प्रदेश में 50000 हेक्टेयर से ज़्यादा रकबे में कटौती कि गई है और किसान बाज़ार में औने-पौने भाव पर अपनी फसल बेचने के लिए मजबूर हैं।

बारदाना उपलब्धता के नियम

नियमानुसार किसी किसान को धान बेचने के लिए केन्द्र द्वारा साठ-चालीस के अनुपात में बारदाना दिया जाना चाहिए। इसमें 40 प्रतिशत पुराना व 60 प्रतिशत नया बारदाना होना चाहिए।

तौल में हेराफेरी की भी मिल रही शिकायत

किसानों से अधिक धान लेकर कम तौलने की शिकायत पड़ियाइन के ख़रीदी केन्द्र से मिली थी जैस्पर कोई कार्रवाई नहीं की गई। सभी केन्द्रों मे इलेक्ट्रोनिक तौल मशीन नहीं होने के कारण तौल अपारदर्शी बना हुआ है।

नियम के अनुसार किसान के सामने ही धान का वज़न किया जाना चाहिए। अखबार ने खबर प्रकाशित की है कि कुछ केन्द्रों में शाम 5 बजे गेट बन्द हो जाने के बाद किसानों की अनुपस्थिति में ही धान को तौला जा रहा है।

पत्रिका की खबर के मुताबिक बालाघाट, मोहगांव, सालेटेकरी, अचानकमार, कचनारी बहराभाटा, मजगांव, रघोली, आगरवाड़ा, तौरगा, मासूलवाड़ा, लालपुर, मछुरदा आदि अनेक स्थानों के केन्द्रों में सैकड़ों किसान अपना धान नहीं बेच पाए हैं जिसका मुख्य कारण है बारदाना न होना। 

स्वामीनाथन आयोग के अनुसार न्यूनतम समर्थन मूल्य

धान के समर्थन मूल्य को लेकर छत्तीसगढ़ के किसानों मे शुरू से ही असंतोष रहा है। देशभर के किसानो की तरह यहां के किसान भी भारत सरकार द्वारा बनाई गई एमएस स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने की मांग करते रहे हैं।

कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन भारत मे हरित क्रान्ति के जनक कहे जाते हैं। उनकी अध्यक्षता मे 18 नवंबर 2004 को भारत में राष्ट्रीय किसान आयोग का गठन किया गया था.

इस आयोग ने सिफारिश की थी कि किसानों को लागत का कम से कम डेढ़ गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य मिलना चाहिए.

लेकिन आज तक किसी भी सरकार ने स्वामीनाथन आयोग की इन सिफारिशों को लागू करने की दिशा मे कोई खास रूचि नहीं दिखाई।

अपने वादों (जिन्हें अब लोग जुमला भी कहने लगे हैं) में 2022 तक किसानों की आय दोगुनी कर देने का दावा करने वाली मोदी सरकार ने भी आयोग की सिफ़ारिशों को लागू नहीं किया है।

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