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छत्तीसगढ़ के वनों का विनाश जंगल – जमीन पर निर्भर समुदाय की खेती से नहीं, बल्कि खनन परियोजनाओं से हुआ हैं .: वन विभाग का यह कहना कि “वनाधिकार पत्र का वितरण हाथियों के हमले के लिए जिम्मेदार हैं” उसकी आदिवासी विरोधी मानसिकता को दर्शाता हैं .: छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन .

18.06.2018/ रायपुर .

छतीसगढ बचाओ आंदोलन ने प्रेस विज्ञप्ति जारी करते हुए कहा कि ,   वन विभाग का यह प्रतिवेदन कि “वनाधिकार पत्र का वितरण हाथियों के हमले के लिए जिम्मेदार हैं” उसकी आदिवासी विरोधी मानसिकता को दर्शाता हैं

छत्तीसगढ़ के वनों का विनाश जंगल – जमीन पर निर्भर समुदाय की खेती से नहीं, बल्कि खनन परियोजनाओं से हुआ हैं l

कोरबा जिला उप वनमंडलाधिकारी ने अपनी एक रिपोर्ट वन विभाग को सौपते हुए कहा हैं की हाथियों के हमले वनाधिकार मान्यता कानून 2006 के तहत् जारी किये जा रहे वनाधिकार के पट्टो के कारण बढ़ रहे हैं l रिपोर्ट में उनका यह भी कहना हैं की लोग खेती करते हैं और फलदार वृक्ष लगाते हैं जिससे हाथी के हमले हो रहे हैं l छत्तीसगढ़ बचाओ आन्दोलन इस रिपोर्ट की कड़े शब्दों में निंदा करता हैं और इसे और इसे वन विभाग की जन विरोधी मानसिकता का कारण मानता हैं l यह रिपोर्ट मूल समस्या से लोगों का ध्यान भटकाने और हाथी समस्या पर अपनी नाकामी छुपाने के लिए खनन कंपनियों के दवाब में तैयार की गई हैं l हाथी मानव द्वन्द को रोकने के लिए हजारों करोड़ रूपये राज्य सरकार ऐसी योजनाओं पर खर्च कर चुकी हैं जिनसे संघर्ष रुकने की बजाये लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं l

छत्तीसगढ़ में हाथी मानव द्वन्द का मूल कारण खनन व अन्य औद्योगिक परियोजनाओं के लिए वनों का भारी विनाश हैं जिसके लिए कभी भी वन विभाग ने आपत्तिया नही उठाई बल्कि, हाथी के आवास /विचरण के क्षेत्रों में हाथी की उपस्थिति को छुपाकर खनन कंपनियों के पक्ष में फर्जी रिपोर्ट प्रस्तुत कर वन स्वीकृतियां हासिल की हैं l यह तथ्य सर्वविदित कि सिर्फ 4 खनन परियोजनाओं को बचाने के लिए लेमरू एलिफेंट रिजर्व को ही निरस्त कर दिया गया l राज्य सरकार का खनन कंपनियों के मुनाफे के लिए प्रतिबद्धता हाथी और इन्सान दोनों के लिए भारी पड़ रही हैं और उसी दिशा में शासकीय अमला कार्य कर रहा हैं l आज छत्तीसगढ़ के 17 जिलों में मानव हाथी संघर्ष की स्थिति बहुत ही गंभीर हो चुकी हैं l पिछले पांच वर्षो में हाथी के हमलों से 200 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं l 7000 घरों को भारी नुकसान हुआ हैं l हाथी प्रभावित क्षेत्रों में ग्रामीण दहशत की जिन्दगी जीने पर मजबूर हैं l गाँव में समस्त काम ठप्प पड़े हैं, क्योंकि लोग रात में जागने के लिए मजबूर हैं l इस गंभीर परिस्थिति में वन विभाग कोई प्रभावी भूमिका निभाने की बजाए सिर्फ खाना पूर्ति करने में लगा हुआ हैं l

आदिवासी और अन्य परम्परागत वन निवासी पीढियों से जंगल – जमीन पर काबिज हैं और उनकी आजीविका का मूल आधार ही यही हैं l इन्ही काबिज वन भूमि पर उनके अधिकारों को मान्यता देने के लिए वनाधिकार मान्यता कानून 2006 देश की संसद के द्वारा बनाया गया था परन्तु प्रदेश में इस कानून का मखोल उड़ाया जा रहा हैं और 60 प्रतिशत व्यक्तिगत दावों को निरस्त कर दिया गया l प्रदेश में ,8 लाख 86 हजार 548 व्यक्तिगत दावों में से मात्र 4 लाख 19 हजार 532 व्यक्तिगत वनाधिकार पत्रक 3 लाख 37 हजार हेक्टेयर जमीन पर मान्य किये गए हैं जबकि लाखों हेक्टयर जंगल जमीन का विनाश विभिन्न खनन और ओधोगिक परियोजनाओं में हो चुका हैं। दल असल वन विभाग कभी चाहता ही नही हैं की इस कानून का क्रियान्वयन हो और वन संपदा को समुदाय के नियंत्रण में सौपना पड़े इसलिए इस कानून के खिलाफ लगातार विभाग द्वारा इस तरीके का दुष्प्रचार किया जाता हैं l

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