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छत्तीसगढ़ी फिल्मों के पितामह मनु नायक से मुलाकात

छत्तीसगढ़ी फिल्म के पितामह मनु नायक से मुलाकात, चर्चा और उनके साथ यादों में खो जाना सचमुच में अद्भुत है. रायपुर आगमन पर वरिष्ठ पत्रकार राजकुमार सोनी ने सीजीबास्केट के लिये मनु नायक से विस्तृत चर्चा की.

मनु नायक कहते हैं कि “बचपन मे जब मेरे घर कोई सतनामी व्यक्ति आते थे तब मेरी मां उनके जाने के बाद उस स्थान को गोबर से लीपती थी, और उन दिनों जब स्कूल जाते थे तब हमारे स्कूल में बिनोबा भावे , गुलजारी लाल नंदा, रविशंकर शुक्ला, सुन्दर लाल शर्मा जैसे लोग आते और छूआछूत, ऊंचनीच के खिलाफ बाते किया करते थे .इस विरोधाभास ने उस समय से ही मन में छुआ छूत के खिलाफ एक समझ पैदा कर दी जो 1957 में बंबई जाने के बाद कहि देबो संदेश का आधार और कारण बनी”.

11 जुलाई 1937 को रायपुर तहसील के कुर्रा गांव-तिल्दा तहसील में जन्मे नायक 1957 में सपनों के शहर  बम्बई चले गए. नायक ने रेहाना सुल्ताना और काजोल की माँ तनूजा की सेक्रेट्रीशिप भी की है. फिल्म के निर्माण पूर्व प्रसारण की प्रक्रिया और बाद की स्थितियों की चर्चा करते समय मनु नायक मानों क्षेत्रीय फिल्मों के इतिहास से रूबरू होते हैं और अपने गत में डूब जाते हैं.

कही देबे संदेस के निर्माता मनु नायक से मिलना, अतीत के उस दौर को याद करके एक एहसास से गुजरने जैसा है.

1965 की अप्रैल में जब यह फिल्म रिलीज हुई, उस समय के समाज के लिये यह बहुत बड़े परिवर्तन का आग़ाज़ था. एक सतनामी युवक का ब्राह्मण युवती से प्रेम करना, इस हाव के ईर्द गिर्द घूमती इस फिल्म ने मनुवादियों के अंदर न केवल हलचल मचा दी बल्कि वे सामूहिक रूप से विरोध के लिए बाहर आ गए. पूर्व घोषणा और सहमति के बाद फिल्म के पोस्टर उतार दिए गए, सिनेमाहॉल मालिकों ने फिल्म लगाने से मना कर दिया. भारी विरोध किया. कारण यही कि कोई सतनामी लडका ब्राह्मण लडकी से प्यार कैसे कर सकता.हैं.

इंदिरा गांधी को करना पड़ा हस्तक्षेप

फिल्म की शिकायत की गई. नायक जी को पता चला, वे उस समय की सांसद मिनी माता से मिले और उनसे कहा कि फिल्म का शो कराईए जिसे देखने छत्तीसगढ़ के राजनेता और अधिकारी आएं. तब निर्णय लीजिए. और हुआ भी यही. तात्कालिन सूचना प्रसारण मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने 16 अप्रैल 1965 को विज्ञान भवन में फिल्म देखी और हाफ टाईम के बाद कहा कि यह फिल्म तो नेशनल इंटीग्रेशन की है, जरूर दिखाई जानी चाहिए. फिल्म को प्रतिबंधित करवाने वाले लोग दिल्ली मे विध्या चरण शुक्ल के घर ठहरे थे . शारदा चरण तिवारी ने भी अपनी टाकीज से फिल्म उतार.दी थी. नायक जी दिल्ली गये तब खूबचंद बघेल जी ने इन्हें फोन भी किया कि हमारे यहाँ ठहरिये .यह स्थिति भी जाति भेद को रेखांकित करती थी.

डीपी मिश्रा ने की टेक्स फ्री

मनु नायक इसकी कहानी बताते है कि उस समय के राजस्व मंत्री गुलशेर अहमद के बंगले के चक्कर लगाते लगाते भोपाल में 15 दिन हो गए लेकिन मुख्यमंत्री से मुलाक़ात ही नहीं हो पा रही थी. तब हम सीधे डीपी मिश्रा से मिलने चले गये. वहां शंकरदयाल शर्मा भी बाहर बैठे थे जो बाद में भारत के राष्ट्रपति बने. जब मेरी पर्ची पहुची तो उन्होंने तुरंत बुला लिया. मुझसे एसे बात की जैसे वे मुझे बरसों से जानते है. उन्होंने कहा कि मैंने तो आपकी फिल्म का टेक्स कबका माफ कर दिया है. आप आदेश ले जाइये.

मनु नायक की प्रतिष्ठा

अभी पिछले दिनों. जब छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बधेल से औपचारिक मुलाकात के लिए गए तो भूपेश बघेल ने नायक जी के पैर छूकर अभिवादन किया था. पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले मनु नायक को छत्तीसगढ़ में के दादा साहब फालके और राज कपूर सरीखा सम्मान हासिल है.

फिल्म में..

फिल्म में बतौर नायक कान मोहन लिए गए जो पहली सिंधी फिल्म अबाना के नायक थे. एक अन्य नायिका सुरेखा ख्वाजा अहमद अब्बास की हिट फिल्म शहर और सपना की हीरोइन थीं. फिल्म में आला दर्जे के गायक मोहम्मद रफी, महेंद्र कपूर, सुमन कल्याणपुर व मीनू पुरुषोत्तम ने स्वर दिए. रफी साहब गाए दो गाने “झमकत नदिया हिनी लागे परबत मोर मितान”  तथा “तोर पैरी के झनर.के खनर-खनर”, आकाशवाणी से आज भी बजते हैं.

फिल्म में प्रमुख रोल में रमाकांत बख्शी भी थे. संगीतकार मलय चक्रवर्ती और गीतकार डा.एस.हनुमंत नायडू थे. मुंबई में गीत रिकार्ड करवाए गए. दीगर कलाकारों में सुरेखा पारकर, उमा राजु, कानमोहन, कपिल कुमार, दुलारी, वीना, पाशा, सविता, सतीश, टिनटिन और साथ में नई खोज कमला, रसिकराज, विष्णुदत्त वर्मा, फरिश्ता, गोवर्धन, सोहनलाल, आरके शुक्ल, बेबी कुमुद, अरूण, कृष्णकुमार, बेबी केसरी भी थे.

गीतकार डॉ.एस.हनुमंत नायडू राजदीप ने गाया था

भिलाई जिसे कभी पंडित जवाहरलाल नेहरू ने तीर्थ कहा था उसे इस गीत में काशी कहा गया हैं ,जो निश्चित ही उनकी वर्ग चेतना को दर्शाती है.

भिलाई तुंहर काशी हे

ऐला जांगर के गंगाजल दौ,

ऐ भारत के नवा सुरूज हे

इन ला जुर मिल के बल दौ,

तुंहर पसीना गिरै फाग मा

नवा फूल मुस्काए रे’

सवा लाख रुपए मे पूरी फ़िल्म बन गई और 27 दिन में इसका निर्माण पूरा हो गया. 16 अप्रैल 1965 को इसे प्रदर्शित किया गया इस फिल्म की शूटिंग सिर्फ 22 दिन पलारी में की गयी.

मनुजी निर्माता महेश कौल के सहायक रहे हैं. वे उनको आज भी गुरू मानते हैं. पटकथा लेखक पं.मुखराम शर्मा के साथ व्यवसायिक साझेदारी में अनुपम चित्रा में मुलाजिम भी थे मनु नायक. काम था प्रोडक्शन से लेकर अकाउंट तक सम्हालना. सलीम (सलमान खान के पिता ) भी तब मुम्बई में जमने की कोशिश में थे, उनसे बात हुई बाकायदा उनको हीरो ले कर 501 रूपये साईनिंग अमाउंट दे दिए गए.

कैफ़ी आजमी से स्क्रिप्ट की बात तो हुई. फारुखी साब एक थे उनकी मदद मिली. मगर बात नही बनी, उनको दिलचस्पी ही नही थी. उनका घर भी दूर था. कई लेखकों के चक्कर लगे. गाना लिखवाने बिलासपुर आना हुआ. खुद एक पटकथा लिखी. हनुमंत नायडू साथ थे यहां. गीत के लिए द्वारका प्रसाद तिवारी और विमल कुमार पाठक का नाम तय हुआ मगर बात जम नही पाई.

फिल्म शुरू हुई आख़िरकार. रायपुर में खपरा भट्ठी के पास रामाधार चंद्रवंशी के निवास पर अपनी पूरी टीम को ठहराया और टहलते हुए बस स्टैंड की तरफ निकले जहां मुलाक़ात पलारी से तत्कालीन कांग्रेस विधायक स्वर्गीय बृजलाल वर्मा से हो गई. चूंकि उन दिनों मनु नायक और उनकी पहली छत्तीसगढ़ी फिल्म के बारे में काफी कुछ छप रहा था लिहाजा वर्मा ने पैदल चले जा रहे मनु नायक को रोका और हालचाल पूछा. जब नायक ने अपनी दुविधा बताई तो उन्होंने तुरंत सारी व्यवस्था करने एक चिट्ठी अपने भाई तिलक दाऊ के नाम लिख दी. बातों-बातों में श्री वर्मा ने एक प्रस्ताव भी रख दिया कि पूरी फिल्म की शूटिंग पलारी में होगी और यह सुविधा भी दे दी कि महिलाओं के लिए उनके घर के पुश्तैनी गहने इस्तेमाल किए जाएंगे.

मुहूर्त शॉट रायपुर के विवेकानंद आश्रम में लिया गया

इस फिल्म में मन्ना डे, सुमन कल्याणपुर, मीनू पुरूषोत्तम और महेंद्र कपूर ने भी गाने गाए. मनु नायक कहते हैं कि “जब रफी साहब ने बेहद मामूली रकम लेकर मेरी हौसला अफज़ाई की तो उनकी इज्जत करते हुए इन दूसरे सारे कलाकारों ने भी उसी अनुपात में अपनी फीस घटा दी”. नायक जी ने बड़े आग्रह पर बताया कि रफी साहब ने कहा कि मनु, जो भी लिफाफे में रखकर दोगे वह मैं बिना गिने ले लूंगा. यह पूछने पर कि आपने कितने का लिफाफा दिया तो बताया दो सौ रूपये एक गीत के.

14 अप्रैल 1965 को फिल्म रिलीज हुई दुर्ग की प्रभात टाकीज में. फिल्म का प्रीमियर होना था रायपुर के मनोहर टॉकीज में. लेकिन कतिपय विवाद के चलते टॉकीज के प्रोप्राइटर ने अनुबंध के बावजूद दो दिन पहले ही फिल्म के प्रदर्शन की मनाही कर दी. दुर्ग में यह फिल्म बिना  विरोधी के चली, फिर इसे भाटापारा में रिलीज किया गया और सारे विवादों के निपटारे के बाद जब फिल्म टैक्स फ्री हो गई तो रायपुर के राजकमल (आज की शानदार राज टॉकीज) में प्रदर्शित हुई. मनु नायक ने बाद में दूसरी छत्तीसगढ़ी फिल्म ‘पठौनी’ की भी घोषणा की थी. लेकिन यह फिल्म नहीं बन पाई.

मनु नायक इस पते पर रहते हैं – 4बी/2, फ्लैट-34, वर्सोवा व्यू को-आपरेटिव सोसायटी, 4 बंगला-अंधेरी, मुंबई-53 मोबाइल : 098701-07222.

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