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छत्तीसगढ़: कमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए 600 से ज़्यादा परिवारों को सड़क पर फेक दिया सरकार ने, देखिए लाईव वीडियो

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में कल 6 जून की दोपहर को निगम व पुलिस की टीम ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 668 परिवारों को घरों से बाहर निकाल कर सड़कों पर पटक दिया

शनिवार 6 जून की सुबह छत्तीसगढ़ सरकार ने गरीबों पर अत्याचार की एक नइ कहानी लिखी है.

छत्तीसगढ़ का एक जिला है बिलासपुर, चूंकि यहाँ प्रदेश का हाईकोर्ट है इसलिए इसे यहाँ न्यायधानी कहते हैं. कल 6 जून की दोपहर न्यायधानी के निगम व पुलिस की टीम ने गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले लगभग 668 परिवारों को घरों से बाहर निकाल कर सड़कों पर पटक दिया.

कल की बर्बरता का विवरण

बिलासपुर जिले में बहतराई नाम का गाँव है. गाँव में ग़रीब परिवारों को बसाने के लिए ‘अटल आवास’ नाम से सरकारी आवास इमारतें बनाई गई हैं. इन इमारतों में लगभग 768 मकान हैं. इनमें से 500 मकान विधिवत आबंटित कर दिए गए हैं, बाकि ख़ाली पड़े 268 मकानों में गरीबी रेखा से नीचे जीवन जीने वाले लोग मजबूरी में ख़ुद ही आकर रहने लगे हैं. आज के नईदुनिया अखबार ने लिखा है कि विधिवत आबंटित 500 मकानों में से केवल 100 ही ऐसे हैं जहां उनके असल मालिक रहते हैं बाकि 400 में लोगों ने कब्जा कर रखा है.

शनिवार 6 जून की सुबह नगर निगम और पुलिस की एक टीम इस आवासीय परिसर में पहुची. बगैर आबंटन के रह रहे सभी लोगों को पुलिस ने तुरन्त घर खाली कर देने के आदेश दिए. ग़रीब लोगों ने पुलिस के सामने हाथ जोड़े कि साहब थोड़ी मोहलत दे दीजिये इस लॉकडाउन में हम कहां जाएँगे. किसी ग़रीब की फ़रियाद नहीं सुनी गई और उन्हें ज़बरदस्ती घरों से बाहर निकाल दिया गया. लोग पुलिस और नगर निगम की इस कार्रवाई का विरोध कर रहे थे. एक मीडिया पोर्टल ने मारपीट का वीडियो जारी किया है जिसमें सफ़ेद शर्ट पहने मुह में गमछा बांधे हुए एक व्यक्ति मारपीट की शुरुआत करता हुआ दिखता है . फिर निगम के अधिकारी और पुलिस मिलकर एक व्यक्ति की पिटाई करते दिखते हैं. बेघर हुए लोगों की भीड़ भी आक्रोशित हो जाती है और खाली खड़ी पुलिस गाड़ियों पर पत्थर फ़ेंक देती है. फिर अपने स्वभाव के मुताबिक पुलिस भारी बल के साथ वापस आती है और लोगों को पीट पीट कर घरों से बाहर निकालने लगती है. लोगों ने बताया कि महिलाओं और विकलांगों से भी मारपीट की गई.

देखिए कल रात 2 बजे का लाईव कवरेज

जिस समय पुलिस ये कार्रवाई कर रही थी तब बहुत से लोग घर पर ताला लगा कर काम पर गए हुए थे. उनके घरों का ताला तोड़कर सामन बाहर निकलवा दिया गया. लोगों को बाहर निकाल कर अब सभी घरों में सरकारी ताला लगा दिया है. कईयों को अपना सामन निकालने तक का समय नहीं दिया गया और सामन सहित उनके घरों पे ताला जड़ दिया गया.

पीड़ितों के ही कर दी FIR दर्ज

बिलासपुर में जिन गरीबों को सरकार ने बेघर कर दिया, जिन्हें पुलिस ने पीटा, उनपर ही FIR दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया गया है. पुलिस ने महिलाओं समेत 13 लोगों के ख़िलाफ़ धरा 147, 148, 186, 294, 332, 353, 427, और 506 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

ये सारे परिवार कल रातभर सड़क पर सोए रहे, आज दिनभर तेज़ धुप में भी वो बाहर रहे और अभी जब मैं ये खबर लिख रहा हूं तो बाहर बारिश शुरू हो गई है.

कमर्शियल प्रोजेक्ट आगे बढाने के लिए गरीबों को बेघर किया जा रहा है

ग़रीब परिवारों को बेरहमी से पीटकर घर से बाहर सड़क पर फ़ेंक देने की ये सारी कवायद एक कमर्शियल प्रोजेक्ट को आगे बढाने के लिए की जा रही है. प्रदेश की पिछली भाजपा सरकार में शहर की अरपा नदी के किनारे नया बिलासपुर बसाने के लिए अरपा प्रोजेक्ट तैयार किया गया था. इस प्रोजेक्ट का मास्टर प्लान फरवरी 2014 में पास हुआ. नदी के दोनों ओर 200-200 मीटर चौड़ाई में ज़मीन की खरीदी बिक्री पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया. प्रोजेक्ट के लिए संभावित ज़मीन में से 450 एकड़ ज़मीन को प्रोजेक्ट एरिया का नाम दिया गया जहां गार्डन, व्यावसायिक कॉम्पलेक्स, कम्युनिटी सेंटर, आदि बनाए जाने हैं. ग्राम दोमुहानी से सेंदरी तक के इस प्रस्तावित इलाके की दूरी लगभग 27 किलोमीटर की थी. विरोध के कारण प्रोजेक्ट को अघोषित तौर पर 15 किलोमीटर करने की बात कही गई. एनिकट, चौपाटी, काम्प्लेक्स आदि बनाने की इस योजना के ज़मीन पर दिखने से पहले इसकी तैयारियों में ही करोड़ों ख़र्च किए जाने की ख़बरें आने लगीं. कितने प्रभावितों को मुआवज़ा मिला इसकी कोई आधिकारिक जानकारी हैं. लगभग 1850 करोड़ के इस अनुमानित प्रोजेक्ट में अब फिर से हलचल शुरू हो गई है.

निगम की बचकानी हरकत

अरपा प्रोजेक्ट को आगे बढाने के लिए ज़रूरी है कि नदी किनारे प्रोजेक्ट एरिया में रह रहे लोगों को वहां से हटाकर दूसरी जगह बसाया जाए. नदी किनारे रह रहे लोगों के घर तोड़कर उन्हें अटल आवास में बसाने की योजना है. पर जो लोग पहले से अटल आवास में रह रहे हैं उनको कहां बसाया जाएगा इसकी कोई योजना नहीं है. एक दिन पहले तक अटल आवास और नदी किनारे दोनों ही जगह के लोग घर के अन्दर रह रहे थे. पर अब अटल आवास वाले सड़कों पर हैं और नदी किनारे वालों के घर तोड़कर उन्हें शहर से दूर अटल आवास में भेजा जाएग. मतलब स्थिति पहले से भी बत्तर हो जाएगी. अब तक सभी घर के अन्दर थे अब आधे सड़कों पर आ गए हैं.

इस पूरी कार्रवाई में ग़रीब लोगों का कहीं से कोई लाभ नहीं है. इसके मूल में बेघरों को घर देने की मंशा बिलकुल भी नहीं है. दरअसल बात ये है कि अरपा नदी शहर के बीच से गुज़रती है. नदी के दोनों ओर शहर के मुख्या बाजारों वाला मंहगा इलाका है यहाँ शॉपिंग कॉम्पलेक्स बनेगा तो खूब चलेगा. और शॉपिंग कॉम्पलेक्स तभी बनेगा जब ग़रीब लोगों को वहां से हटा दिया जाएगा. नदी किनारे रहने वाले ग़रीब फिलहाल बिलासपुर के सिटी एरिया में रह रहे हैं. उन्हें यहां से हटाकर दूर बहतराई गाँव भेज दिया जाना उनके लिए नुक्सान की ही बात है. और बहतराई में जो ग़रीब अभी रहे हैं उन्हें घर से बाहर निकाल देना तो उनका नुक्सान है ही. कुल मिलाकर इस करोडो के प्रोजेक्ट से फायदा केवल सरकार और अधिकारियों का ही होना है ग़रीब आदमी का नहीं.

लॉकडाउन में बेघर हुए ये लोग क्या कोरोना से मरने के छोड़ दिए गए हैं?

महत्वपूर्ण बात ये भी है कि ग़रीब परिवारों को बेघर कर देना की ये कार्रवाई इस कोरोना लॉक डाउन के गंभीर संक्रमण वाले समय में की जा रही है. एक तरफ मुख्यमंत्री भूपेश बघेल लोगों से घर पर रहें सुरक्षित रहे की अपील कर रहे हैं तो वहीँ दूसरी तरफ़ उनकी सरकार ने इन सैकड़ों ग़रीब परिवारों को घर से निकाल कर सड़कों पर खुले में, कोरोना महामारी के तमाम खतरों के बीच मरने के लिए छोड़ दिया है.

बेघर किए गए इन लोगों ने बताया कि वे अब तक दूसरी जगह किराए के मकान में रह रहे थे. पर लॉक डाउन में घर का किराया देने जितने भी पैसे नहीं थे इसलिए मकान छोड़ना पड़ा और उन्हें मजबूरी में अटल आवास में पनाह लेनी पड़ी. मारपीट करने वाली पुलिस और निगम के दस्ते से इन लोगों नें हाथ जोड़कर अपनी समस्या बताई और समय मांगा कि लॉकडाउन के कारण बिगड़ी आर्थिक स्थिति थोड़ी सुधर जाएगी तो हम फिर से किराए के मकान में चले जाएंगे हमें कम से कम एक महीने का समय दे दीजिये. पर उनकी एक नहीं सुनी गई.

अखबारों ने गायब कर दी असल ख़बर

“घर खाली करवाने गए निगम के दस्ते पर बेजाकब्जाधारियों ने किया पथराव” ऐसी वाली सुर्ख़ियों के साथ शहर के सभी अखबारों और मीडिया पोर्टल्स ने खूब ख़बरें चलाईं. एक पोर्टल ने लिखा कि “गरीबी वाला कार्ड हर बार थोड़ी न चलेगा” एक ने गरीबों को चोरी और ऊपर से सीनाजोरी करने वाला बता दिया. किसी ने लिखा कि ग़रीब अवैध रूप से घरों में घुसे हुए थे. इस मुद्दे पर ग़रीब विरोधी होकर और प्रशासन तथा पुलिस का चाटुकार होकर मीडिया जो कुछ लिख सकती थी उसने लिखा है. एक्सक्लूज़िव होड़ सबने लिखी और असल खबर गायब कर दी.

अखबार ने ये नहीं लिखा कि ये ग़रीब लोग जिन्हें कल ज़बरदस्ती घर से निकाल दिया गया वे पिछले 6 वर्षों से लगातार सरकारी आवास के लिए आवेदन कर रहे हैं पर उन्हें घर नहीं मिला है.

अखबार ने ये नहीं बताया कि मकान आबंटित कराने के नाम से इन ग़रीब लोगों से निगम में रिश्वत मांगी जाती है.

अखबार ने ये नहीं लिखा घर से बाहर निकाल दिए गए एक बच्चे को बुखार है और वो सड़क में कुत्तों के साथ सोया हुआ है.

अखबार ने ये नहीं लिखा कि इन गरीबों को पूरी रात मच्छर कटवाते हुए सड़कों पर खुले आसमान के नीचे बितानी पड़ रही है.

अखबार ने ये नहीं लिखा कि दुधमुहा बच्चा गोद में लिए माएं रातभर बाहर जागती रहीं.

अखबारों ने नहीं लिखा कि टोटल लॉकडाउन में बगैर किसी पूर्व सूचना के एक हज़ार से भी ज़्यादा लोगों को एक घंटे के अन्दर घरों से निकाल कर सड़कों पर फ़ेंक दिया गया.

बेघर कर दिए गए इन ग़रीब मजबूर लोगों की तरफ से एक भी बात अखबार ने नहीं लिखी.

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