आंदोलन महिला सम्बन्धी मुद्दे मानव अधिकार राजकीय हिंसा शासकीय दमन

छतीसगढ पुलिस को विरोध प्रदर्शन का हक़ है ,पुलिस पर पुलिस का दमन बन्द करें , यह राजद्रोह नहीं ,जीने योग्य सुविधाओं के लिये किये गये आंदोलन का समर्थन . पीयूसीएल छतीसगढ .

23.06.2018 ,रायपुर .

छत्तीसगढ़ में तृतीय श्रेणी के पुलिसकर्मियों के परिजनों ने अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और अन्य शासकीय सेवकों के समक्ष वेतन भत्ते और समान सुविधाओं के लिए 25 जून को विरोध प्रदर्शन की घोषणा की थी ,यह प्रदर्शन संवैधानिक और कानून है ,परिजनों का विरोध पुलिस मैनुअल का भी उलंघन नहीं है .
भारत का संविधान सभी को संगठन बनाने और विरोध का हक़ देता हैं जिसमें यूनियन बनाने का अधिकार भी निहित है.

यह आंदोलन संवैधानिक और कानून सम्मत है, पुलिस कर्मियों के परिजनों को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित करना उनके मौलिक अधिकारों के हनन के साथ साथ गैरकानूनी भी है, शासकीय कर्मचारी के परिजनों को परिवार नामक संस्था को बचाने के लिए सामने आना पड़ा है क्योंकि पुलिस की अनियमित ड्यूटी और कम वेतन उसके परिवार के ढांचे को तोड़ रहा है जिसे बचाने की जिम्मेदारी सरकार की है अतः सरकार परिजनों को यह आश्वासन दे कि उनका पारिवारिक ढांचा सुरक्षित रहेगा

छतीसगढ मे पुलिस कर्मी हमेशा प्रशासन से प्रताड़ित रहते हैं , अभी भी परिजनों ने पत्र लिखकर यही मांग की हैं , कि
कामों में राजनीतिक हस्तक्षेप ,सजा के तौर पर स्थानांतरण , समान वेतन भत्ते ,रहने योग्य आवास की व्यवस्था ,वर्तमान में मिलने वाला आवास भत्ता , प्रट्रोल भत्ता हास्यास्पद रूप से 13 रूपये हैं इसे बढाने ,पुलिस किट या उसका भत्ता, ड्यूटी के दौरान मरने पर शहीद का दर्जा और एक करोड का मुआवज़ा ,अनूकंपा नियुक्ति ,अन्य विभागों की तरह साप्ताहिक अवकाश और काम के लिये आठ घंटे तय किये जाये ,अधिक समय काम लेने पर अतिरिक्त भुगतान ,अन्य विभाग की तरह परिजनों को मुफ्त इलाज ,नक्सली क्षेत्र मे काम करने पर उच्च मानक के सुरक्षा उपकरण ,बुलेटप्रूफ़ जाकेट और आधुनिकतम हथियार ,10 साल मे पदोन्नति , वर्दी भत्ता अभी मात्र पांच रूपये मिलता हैं इसे बाजार की कीमत के अनुसार बढाया जाये ,आदि आदि मांग के लिये वाकायदा पत्र पुलिस डीजीपी और अन्य अधिकारियों को लिखा था.

पुलिस प्रशाशन और राज्यशाशन ने इन परिवारों से बात करने की जगह दमन की कार्यवाही शुरू कर दी यह पूरी तरह अलोकतांत्रिक और अमानवीय हैं .पुलिस कर्मियों के परिजनों को घर से उठाया गया ,उनकी पत्नी , बच्चों ,बूढ़े मां बाप को थाने में बैठा लिया गया ,बाजार में ,रिश्तेदारों के घर से, आटो रोक कर पकडकर ले गये और उनपर दबाव बनाया जा रहा हैं कि वे 25 जून के विरोध प्रदर्शन में शामिल न हों.

विरोध की अगुवाई करने वाले पुलिस कर्मियों को बर्खास्त किया जा रहा है ,पूरे राज्य में धरना स्थल को अभी से पुलिस ने छावनी बना दिया हैं .

बर्खास्त करने के बाद आरक्षक राकेश यादव और रोहिणी लोनिया को गिरफ्तार करके उनपर राजद्रोह का मुकदमा लगा कर बिलासपुर जेल भेज दिया .

ऐसे ही एक आरक्षक बस्तर में भुगत रहा हैं.

बस्तर में एक आदिवासी पुलिस आरक्षक को पुलिस अधिकारियों के निर्देश पर बेगुनाह ग्रामीणों को नक्सली बता कर पकड़े जाने का विरोध करने की सजा उच्च अधिकारियों की  प्रताड़ना से चुकाना पड़ा है। वो पुलिस आरक्षक जिसे कभी नक्सली मुखबिरी के शक में मारने को बेताब थे, और अपनी जान बचाने के लिए पुलिस में भर्ती हुआ अब अपनी ही पुलिस उसकी जान की दुश्मन बन गई है । आरक्षक को पुलिस के आला अफसरों ने देशद्रोही, भगोड़ा साबित करने पर तुली हुई है, लेकिन आज तक आरक्षक जिंदा है या मर गया या फिर दर-दर की ठोकरे खा रहा है। इसको जानने के लिए उसका परिवार बेताब है.

पीयूसीएल छत्तीसगढ़ पुलिसकर्मियों की मांगों का समर्थन करता है और मांग करते है कि दमन की कार्यवाही बंद की जाये ,पुलिस परिजनों से चर्चा आरंभ की जाये और जिन पुलिसकर्मियों को बर्खास्त किया गया हैं उन्हें बहाल किया जाए ,देशद्रोह जैसे आरोप वापस लिये जायें.

डा. लाखनसिंह
अध्यक्ष

अधिवक्ता सुधा भारद्धाज
महासचिव

 

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