शिक्षा-स्वास्थय

छठवाँ और सातवाँ सवाल . कभी कोई चमत्कार नहीं होता , इस बात पर इतना पक्का विश्वास कैसे.

डॉ . दाभोलकर इस सवाल के जवावं में कहते हैं , सीधी बात है , जहाँ प्रकाश होता , वहीं अघेरा नहीं होता जी अधेरा रहता है , वहाँ प्रकाश नहीं होता । क्या आप इस तथ्य के बारे में भी मुझसे पूछेंगे कि निश्चित तौर यह कैसे कह रहा इसका उत्तर है वैज्ञानिक दृष्टिकोण , जिसका अर्थ है कार्यकारण भाव .चमत्कार का अर्थ है ? कार्य – कारण भाव का अभाव , कहते हैं , ध्यान दीजिए , जादूगर आपको खाली टोपी दिखाता है और फिर उसमें जिंदा खरगोश निकालता है । कोई बाबा तो सिर्फ खाली हाथ दिखाता है और उसमें भभूत निकालता है । क्या आप जादू के खेल के बाद जाकर उस जादूगर पैर पकड़ते क्या आप उससे कहते हैं कि आज आपने खाली टोपी में से जिंदा खरगोश निकाला तो उससे कल के लिए मेरा प्रश्नपत्र निकाल दीजिएगा । तो वह कहाँ से निकालेगा बेचारा जादूगर पेट केन्द्रित कलाकार होता है मगर बाबा का चमत्कार दैवी शक्ति आविष्कार होता है , यह कहा
जाता है ।

हालाँकि अब तक कोई भी व्यक्ति चमत्कार सिद्ध नहीं कर पाया है । क्या उसका कारण जानते हैं ? ‘ चमत्कार ‘ और ‘ सिज ये दोनों ही शब्द परस्पर विपरीत है । चमत्कार सिद्ध होने का क्या आशय है ? मैं कहता है , एक बात आप कभी नहीं कर पाएंगे – हम कभी नहीं लिख पाएंगे कि हम कितने बजे गाड़ी नींद में सो गए । इसे अगर हम अपने हाथ से लिखते हैं , तो इसका मतलब ही है कि हम गाड़ी नींद में नहीं सोए थे । और अगर गाढ़ी नींद में सो गए तो लिख नहीं सकते । ‘ ‘ मगर हमारे देश में संतों के चमत्कारों के प्रति लोगों को बहुत लगाव है । इसलिए इसकी विवेचना करना लोग पसंद नहीं करते । मेरी बात छोड़िये , तुकडोजी महाराज , जिनका नाम नागपुर विश्वविद्यालय को दिया गया है , उन्होंने कहा है – चमत्कारों के कारण अनेक जिंदगियाँ धूल में मिल गई , इसलिए अब आगे चमत्कारों का वर्णन किसी को नहीं करना चाहिए । लोगों के इस भोले भक्ति – भाव के कारण ही अनेक पाखंडी गाँव में आते हैं और लोगों को बेवकूफ बनाकर उन्हें लूट लेते हैं । लोग चमत्कारों के चक्कर में आकर क्या करते हैं ? स्वयं कोशिश करना छोड़ देते हैं और मुफ्त में हिन में कैद हो जाते हैं । ‘

सीधी बात है , जहाँ प्रकाश होता है , वहाँ अंधेरा नहीं होता और जहाँ अंधेरा रहता है , वहाँ प्रकाश नहीं होता क्या आप इस तथ्य के बारे में भी मुझसे पूडेंगे कि मैं निश्चित तौर पर यह कैसे कह रहा हूँ । इसका उत्तर है वैज्ञानिक दृष्टिकोण , जिसका अर्थ है । कार्य – कारण भाव । । चमत्कार का क्या अर्थ है ? कार्य – कारण भाव का अभाव ।

इसलिए चमत्कार तो कभी भी चमत्कार नहीं ही होता , परंतु को प्रयत्नवाद लगातार परे हटा देता है । यह उसका अधिक खतरनाक पक्ष है । डॉ . नरेन्द्र दाभोलकर सातवें प्रश्न के उत्तर में बताते हैं कि उनकी समिति ने खुलेआम चमत्कार दिखाने वाले को 21 लाख रूपये का ईनाम घोषित किया है मगर आज तक किसी ने इस आह्वान को स्वीकार नहीं किया है ।

प्रारंभिक वक्तव्य

इप्टा रायगढ ने बहुत ही समसामयिक पुस्तक प्रकाशित की * धर्म और जाति संबंधी दृष्टिकोण पर पुनर्विचार संदर्भ नरेन्द्र दाभोलकर.* जिसका संयोजन जानी मानी रंगकर्म उषा आठले वैरागकर ने किया है .
मुझे यह पुस्तक कपूर वासनिक जी के माध्यम से मिली ,वो बिलासपुर में हम सभी को पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराने का सबसे महत्वपूर्ण कार्य कर रहे है . नरेन्द्र दाभोलकर की अब और ज्यादा जरूरत भारत की मार्क्सवादी सैद्धांतिकी में प्रायः धर्म और जाति के सवालों पर चर्चा कम मिलती है । धर्म और जातियों का विभेद दूर हुए बिना समाज – परिवर्तन या व्यवस्था – परिवर्तन नहीं हो सकता , भारतीय परिप्रेक्ष्य में अब इस पर विचार करने की पहल हो चुकी है और कुछ क्षेत्रों में इस दिशा में आंदोलन की नींव भी पड़ गई है । जाति – उन्मूलन की दिशा में प्रयास शुरू हो गए हैं । भारत का समाज सिर्फ वर्गाधारित समाज नहीं है । उसमें धर्म – सम्प्रदाय जाति – उपजातियों की अनेक दृश्य – अदृश्य दीवारें खड़ी हैं । इनकी जड़े भी बहुत गहरी हैं । इसलिए इस वास्तविक परिस्थिति से जमीनी स्तर पर जूझते हुए ही वामपंथी आंदोलन आगे नए रास्ते खोज पाएगा । जब 2015 में नरेन्द्र दाभोलकर की हत्या हुई , उस समय से ही यह सवाल करेद रहा था कि अंध श्रद्धा निर्मुलन का काम क्या वाकई इतना अधिक अवरोधक है कि कट्टरपंथियों ने उनकी हत्या कर दी । इस बीच रावसाहेब कसले की किताब भक्ति और धम्म का अनुवाद करते हुए मुझे स्पष्ट महसूस हुआ कि समूचे विश्व में ही धर्म नामक संस्था का कितना जबर्दस्त प्रभाव मध्य युग से रहा है और आज उसकी जड़े और भी फैलकर अपना रूप बदल चुकी हैं । अब धर्म की राजनीति शुरू हो गई है । ऐसे समय में धर्म की प्रचलित धारणाओं के प्रति अपनी सैद्धांतिकी पर हमें पुनर्विचार करना ही होगा । यूट्यूब पर नरेन्द्र दाभोलकर से पचीस सवालों का एक धारावाहिक , लघु जवाबों के रूप में ( हर्षल जाधव संपादित ) जब मैंने मराठी में सुना तो मुझे लगा कि उनकी अधिकांश किताबों का हिंदी अनुवाद हो चुकने के बावजूद इस सीरीज के छोटे – छोटे सवाल – जवाबों के आधार पर पुनर्विचार के लिए बिंदु प्रस्तुत किये जाने चाहिए . उषा आठले .

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