कला साहित्य एवं संस्कृति

चैत के नेवता -नवल शर्मा 

चित्र साभार 

नौरात्रि के ,

मेला देखे बर –
मैया – तैं चले आबे .
मैया तैं चले आबे …..

लीपे पोते –
घर के दुआरी ,
अगोरत – मोला पाबे .
मैया तैं चले आबे …..

गरीब भिखारी के –
मैं छोटके टूरी .
गांव शहर बीच –
अब्बड़ हे दूरी .
कनिहा मं बैठा के , तैं मोला दाई
अपन – दरस करवाबे .
मैया तैं चले आबे …..

उतरन चिरहा –
जनम ले पहिने हौं
नया अभी तक ले नई चीन्हे हौं
मांगे मिले ल खा के जियत हौं
आ जा –
आंखी देखी पतियाबे
मैया तैं चले आबे

बिंदिया – चूड़ी
देखे भर जानत हौं
लुगरा – पैरी
छुए तक नहीं पाए हौं
मोर कस कतको – तरसत हैं दाई
सब्बो ल सब दिलवाबे
मैया तैं चले आबे ।

जंगल – खेती उजड़त हे दाई
जांगर धरे हन तभो ले माई
बिलख बिलख के दिन गुजरत हे
भिखमंगा कहलाथन – 2

ए दारी हमर बिनती ल सुन ले
मंदिर ल छोंड़ – बस्ती मं रहि ले
कइसे कटत हे जिनगानी ल देखे बर
मैया तैं चले आबे – 2
मैया तैं खचिज आबे …..

 

नवल शर्मा ,

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