अभिव्यक्ति राजनीति

चुनाव में चुनना क्या है? ःः सीमा आजा़द .

27.04.2019

सत्ता किसी की भी हो, कॉरपोरेट और उसका सम्बन्ध आज खुली आंखों से नज़र आने वाली बात है। जब सत्ता यानि राज्य और कॉरपोरेट एक हो जायें, तो वह फासीवाद को पैदा करता है, जो समाज का धार्मिक, जातीय और नस्लीय आधार पर विभाजन तेज करता है, और सत्ता के हर संस्थान को एकाधिकारी बनाता है। कोई भी इससे इंकार नहीं करेगा कि पिछले तीन-चार दशकों से सत्ता में रहने वाली हर पार्टी, चाहे वह केन्द्र में हो या प्रदेश में, खुलकर कॉरपोरेट्स के मुनाफे के लिए ही काम कर रही है, इन दशकों में हजारों ऐसे समझौते सत्तासीन दलों ने इन कॉरपोरेट घरानों से किये हैं, जो जनविरोधी लोकतन्त्र विरोधी और गुलामी की ओर ले जाने वाली हैं। और अब तो यह सिलसिला यहां तक पहुंच गया है कि देश की नीतियां और कानून भी इन्हीं के इशारों पर बनाये जा रहे हैं। उनसे तालमेल के कारण ही रोजगार पैदा करने की प्रक्रिया रोक दी गयी है, छंटनी की प्रक्रिया तेज कर दी गयी है। खेती की लागत लगातार बढ़ाकर छोटी जोत वालों को शहरों की ओर भागने और कम से कम मजदूरी पर काम करने के लिए मजबूर कर दिया गया है। श्रम कानून मजदूरों के खिलाफ होते जा रहे हैं, प्राकृतिक संसाधन लोगों से छीनने के लिए हर दिन नये-नये फरमान लाये जा रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य मंहगी और अप्राप्य बनायी जा रही है। और तो और, बैंक में रखे अपने रूपयों को इस्तेमाल के लिए निकालने तक पर तरह-तरह के प्रतिबन्ध लगाये जा रहे हैं।

इन बुनियादी बातों पर भाजपा से लेकर वाम दल तक सभी पार्टियां एक ही जगह खड़ी दिखाई दे रही है-‘कॉरपोरेटपरस्त‘-जिसके एकाधिकारी स्वभाव की अभिव्यक्ति ही फासीवाद है।

इन सभी पार्टियों में से भाजपा, केवल फासीवाद की अभिव्यक्ति में ही पहले नम्बर पर है। इसकी अभिव्यक्ति मुखर तौर पर साम्प्रदायिक और एकाधिकारी है क्योंकि इसकी वैचारिक जमीन ही यही है। यही बात इसे दूसरी पार्टियों से अलग करती है और यही वजह है कि पूरे देश में फासीवाद का विरोध करने वाले लोगों का गुस्सा इसे चुनावों में हराने पर ही केन्द्रित हो गया है। इस लोकसभा चुनाव में इसी कारण अनेक प्रगतिशील तबकों ने भाजपा के खिलाफ वोट डालने की खुली अपीलें जारी की हैं, जो अनजाने में उस दल के पक्ष में चली जा रही हैं, जिन्होंने कॉरपोरेटों के लिए भारत में कालीन बिछाने का काम किया। साम्प्रदायिक फासीवाद के खिलाफ उनका बोलना स्वागत योग्य है लेकिन उनके द्वारा दिया गया विकल्प वास्तव में उस कारपोरेटी फासीवादी हमले के खिलाफ लड़ाई को मजबूत करने की बजाय कमजोर कर रहा है, जिसके कारण ‘हिन्दुत्व फासीवाद’ आज ज़हर की तरह फैल चुका है। फासीवाद के खिलाफ लड़ाई का सिर्फ ‘भाजपा’ केन्द्रित होते जाने के कारण वास्तव में अब स्थिति ये है कि भाजपा जीते या हारे, वह कॉरपोरेट्स की फासीवादी नीतियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचने वाला। वह ऐसे, कि यदि भाजपा फिर से चुनाव जीत कर सत्ता में आती है, तो कॉरपोरेट्स के देश में आगे बढ़ने का रास्ता साफ होगा, और साम्प्रदायिक फासीवाद और बढ़ेगा। और यदि भाजपा हार जाती है, तो भी लोगों को बांटने वाली फासीवादी विचारधारा समाज में बनी ही रहेगी।

बेशक कॉरपोरेट्स के एजेन्डे को सबसे आक्रामक तौर पर लागू करने वाली भाजपा के हारने एक उन्हें एक हल्का झटका जरूर लगेगा, लेकिन यह झटका इस बात से बैलेन्स हो जायेगा कि यह परिणाम सिर्फ ‘भाजपा’ को फासीवादी मानने वालों, बोलने और लड़ने वालों को कई सालों तक इस भ्रम में चुप रखेगी, कि उन्होंने भाजपा के रूप में ‘साम्प्रदायिक फासीवाद को शिकस्त दे दी है।’ दोनों ही स्थितियों में कॉरपोरेटी फासीवाद आगे ही बढ़ेगा और परिणामस्वरूप नफरत की राजनीति और माहौल भी। भाजपा सत्ता में हो या न हो।

भाजपा के सत्ता में आने के पहले ही पिछले दो-तीन दशकों में कॉरपोरेटी पूंजी से पोषित मीडिया ने आतंकवाद से एक धर्म विशेष को जोड़कर, लोगों के दिमाग को जितना साम्प्रदायिक, जातिवादी, पितृसत्तात्मक, अवैज्ञानिक, और पिछड़ा बना दिया है, संस्थानों में जिस पैमाने पर ऐसी ही सोच वाले मनुवदियों को बैठाया जा चुका है, उसके कारण साम्प्रदायिक एकाधिकार की इस प्रक्रिया को अब कोई भी सत्तासीन पार्टी नहीं रोक सकती, ऐसा करने की किसी की इच्छा भी नहीं है। क्योंकि इस प्रक्रिया में इन सालों में सभी चुनावी दलों का भी जिस कदर ‘मनुवादी हिन्दूकरण’ हो चुका है, उसे देखते हुए अब इसकी उम्मीद ही नहीं की जा सकती कि मात्र भाजपा के हार जाने से ही फासीवाद हार जायेगा, जैसाकि तमाम लेखक, कलाकार, बुद्धिजीवी उम्मीद कर रहे हैं। सच्चाई तो यह है कि कॉरपोरेटी पूंजी के भारत में घुसने के बाद से पिछले कई दशकों से जिस तरीके से समाज का साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण लगातार बढ़ा है, भाजपा जैसी पार्टी को उससे ही सत्ता तक पहुंचने की जमीन मिली है और उसके कारण ही वह सत्ता में आयी है। भाजपा जैसी पार्टी का सत्ता में आना विश्व अर्थव्यवस्था के संकट में जाने और उससे निकलने की असफल कोशिश से उपजी अराजकता की एक अभिव्यक्ति है। बेशक भाजपा को पैर जमाने के लिए यहां की मनुवादी व्यवस्था ने पहले से ही कालीन बिछा रखी थी। इस कालीन पर सवार होकर ही मंदी में फंसी कारपोरेटी पूंजी भारत में पहुंची थी, इसी कारण यहां का कॉरपोरेटी फासीवाद ‘हिन्दुत्व फासीवाद’ बना।

कांग्रेस या अन्य पार्टियां इनकी सेवा में नहीं लगी हैं- ऐसी बात नहीं थी। बल्कि लम्बे समय से एक तरह से काम करते रहने के कारण वे अभी अपने आकाओं की नयी जरूरत को ठीक से समझ नहीं सकीं थीं। लेकिन सत्ता से बाहर होने पर उन्हें यह समझ में आ चुका है और अब वे भी साफ तौर पर इसी राह पर चलती दिख रहीं हैं। अपनी अभिव्यक्ति में हर पार्टी बेशक अल्पसंख्यकों और दलितों के हित की बात कर रही है, लेकिन अपना गोत्र/जाति उजागर कर, मन्दिरों में पूजा अर्चना कर खुद को अधिक ‘शुद्ध हिन्दू’ ही साबित कर रही है। आखिर उन्हें इस बात की जरूरत क्यों पैदा होने लगी? स्पष्ट है-एकाधिकारी कॉरपोरेटों की अच्छी सेवा के लिए।

इस अराजक माहौल के प्रति बुद्धिजीवियों, कलाकारों की चिन्ता जायज़ और स्वागत योग्य है, लेकिन इस अराजक स्थिति को खत्म करने का काम साम्प्रदायिक रूप से सबसे मुखर पार्टी को चुनावों में हराने भर से नहीं होने वाला, बल्कि साम्प्रदायिक और सामंती चेतना की वाहक-रक्षक-प्रचारक कॉरपोरेटी फासीवाद से लड़कर ही खत्म किया जा सकता है। यह चुनाव की लड़ाई से नहीं, बल्कि साम्राज्यवाद और सामंतवादी चेतना के खिलाफ जनवाद की चेतना बनाने से होगी। क्या आज के समय में ऐसी कोई भी चुनावी पार्टी है, जो मंदी में डूबी साम्राज्यवादी अर्थव्यवस्था का हाथ छोड़ने का वादा करती हो? एक भी नहीं। वामदल के कुछ प्रत्याशी व्यक्ति के रूप में बेहतर उम्मीदवार हो सकते हैं, लेकिन पार्टी के रूप में हम इन्हें भी पश्चिम बंगाल और केरल के साथ यूपीए के सहयोगी के रूप में केन्द्र में भी देख चुके हैं।

इसलिए वास्तव में जनता के पास चुनावों में ‘चुनने’ के लिए कुछ है ही नहीं, हम जिसे भी चुनेंगे, वह छिपे नहीं, बल्कि खुले तौर पर साम्राज्यवादी कॉरपोरेट्स की पार्टी होगी, जो मुनाफे के लिए हमारे रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, जमीन के अधिकार के साथ प्राकृतिक संसाधन भी हमसे छीन कर हमें तबाह ही करेगी, और हमें प्रत्यक्ष या प्रच्छन्न रूप से लड़ाने की राजनीति ही करेगी, विरोध करने वालों को जेलों में डालेगी या फर्जी मुठभेड़ो में मारेगी। चुनाव अब ‘लोकतन्त्र का पर्व’ नहीं रहा, बल्कि सत्ता की कॉरपोरेट परस्त फासीवादी नीतियों के लिए अपनी स्वीकृति देने की एक कवायद भर रह गया है।

सच्चाई तो ये है कि असली चुनाव इन पार्टियों के बीच नहीं, बल्कि दो राजनीति के बीच करना है- हमारे देश में फासीवाद को लाने वाली साम्राज्यवादी-मनुवादी राजनीति या इसे उखाड़ फेंकने वाली राजनीति। दूसरी राजनीति करने वाली कोई पार्टी चुनावी मैदान में नहीं है, इसलिए वास्तविक ‘चुनाव’ उनके द्वारा परोसे गये चुनाव में नहीं बल्कि सड़कों पर उतर कर करना है।

सीमा आजा़द ,संपादक . 

दस्तक मई-जून 2019 का सम्पादकीय 2

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