अभिव्यक्ति राजकीय हिंसा राजनीति

घुसकर मारूँगा पीओके खाली करवाया जाएगा जैसे दावे करने वाली सरकार के मुखिया को ऐसे राज्य में जाने से डर लग रहा है, जहाँ उसी की सरकार है

Written by Rakesh Kayasth

प्रधानमंत्री के बेइज्ज़त होकर लगातार दूसरी बार असम यात्रा रद्ध करने से मुझे बहुत दुखा हुआ है। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री को अपने ही देश के किसी हिस्से में जाने से डर लगे तो फिर यह समझ लेना चाहिए कि आंतरिक सुरक्षा और कानून व्यवस्था की स्थिति क्या है।

यह भी साफ होता है कि देश किन ढपोरशंख लोगों के हाथ में है। घुसकर मारूँगा, पीओके खाली करवाया जाएगा जैसे दावे करने वाली सरकार के मुखिया को ऐसे राज्य में डर लग रहा है, जहाँ खुद बीजेपी की सरकार है।

अब कॉरपोरेट मीडिया और भक्त मंडली की प्रतिक्रिया पर गौर कीजिये। किसी को गुस्सा नहीं आ रहा है। कोई प्राइम टाइम डिबेट नहीं हो रहा है। ऐसा इसलिए है कि सबको पता है कि सरकार का बोया हुआ पाप है।

बरसों तक पार्टनर रहा असम गण परिषद भी खुलकर मोदी की यात्रा का विरोध कर रही है और इस पार्टी का पूरा नेतृत्व हिंदुओं के हाथ में है। ऐसे में हिंदू-मुसलमान और पाकिस्तान-आईएसआई जैसी कोई कहानी चाहकर भी नहीं बनाई जा सकती है।

पिछले दो महीने में देश में जो कुछ हुआ है, उससे यह बात बहुत साफ है कि सरकार हिंसा और स्थायी सामाजिक विभाजन को अपने बने रहने का एकमात्र आधार मान चुकी है। वह समझ चुकी है कि अर्थव्यस्था और गवर्नेंस जैसे सवाल हल करना उसके बूते के बाहर हैं।

देश के दो शीर्ष नेताओं मोदी और शाह ने एक बार भी इस बात की कोशिश नहीं की है कि शांति का वातावरण बने। कपड़ों से दंगाई पहचानने और हिंसा होगी तो कमल खिलेगा जैसे बयान यह बताने के लिए काफी हैं कि सोच किस तरह नीचे गिर चुकी है।

घुसपैठ को पूरा देश एक बड़ी समस्या मानता है। अगर सरकार की नीयत साफ होती तो वह तीन लाइन में समझा सकती थी कि इससे निपटने का उसका रोडमैप क्या है। लेकिन क्या वाकई कोई रोडमैप है?

प्रधानमंत्री मंत्री से लेकर गृहमंत्री तक निर्लल्ज भाव से झूठ पर झूठ बोल रहे हैं और अपनी बातों को गलत साबित कर रहे हैं। सरकार क्या कर रही है और आगे क्या करेगी इसका कोई सीधा जवाब किसी मंत्री के पास नहीं है। लेकिन भक्तों के पास हरेक बात का जवाब है।

वे यह मानकर चल रहे हैं कि मोदीजी जो करेंगे उससे देश का भला होगा क्योंकि मुसलमानों के कष्ट बढ़ेंगे। इस भरोसे का आधार गुजरात में मोदीजी का ट्रैक रिकॉर्ड है। लेकिन क्या एनआरसी से सिर्फ मुसलमानों को तकलीफ होगी? ऐसा सोचने वालों को असम के डिटेंशन कैंप्स में मरने वालों के नाम पढ़ने चाहिए। वही डिटेंशन सेंटर्स जिसपर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में अच्छी-खासी कवरेज़ हो चुकी हैं और मोदीजी के मुताबिक ऐसे सेंटर देश में है ही नहीं।

इस पूरे प्रकरण ने जनमत को स्थायी रूप से विभाजित कर दिया है। एक तरफ सत्य, न्यूनतम नैतिकता और इंसानियत है और दूसरी तरफ सिर्फ फरेब और नफरत। चुनना सबको पड़ेगा कोई और रास्ता नहीं है।

लेखक राकेश कायस्थ की ये फ़ेसबुक पोस्ट उन्हें धन्यवाद देते हुए cgbasket के पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं

राकेश कायस्थ

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