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ग्रामीणों ने किया अम्बिका कोल ब्लॉक जनसुनवाई का विरोध, कहा नही चाहिए कोयला खदान

कोरबा जिले के ग्राम कलतरी में प्रस्तावित अम्बिका कोल ब्लॉक जिसका आवंटन SECL को हुआ था उसकी पर्यवर्णीय स्वीकृति के लिए आयोजित लोक सुनवाई का ग्रामीणों ने बहिष्कार कर खनन परियोजना का विरोध किया है

अबिका ओपेन कॉस्ट कोयला खदान के लिए शुक्रवार को आयोजित पर्यावरणीय जनसुनवाई का ग्रामीणों ने विरोध किया. इससे होने वाले नुकसान की ओर जिला प्रशासन और पर्यावरण संरक्षण मंडल का ध्यान आकृष्ट कराया और एसईसीएल पर पेसा एक्ट के उल्लंघनका आरोप लगाया भी इलाके के ग्रामीणों ने लगाया है. जनसुनवाई में क्षेत्रीय विधायक भी ग्रामीणों के साथ खड़े नजर आए उन्होंने भी खदान नहीं खोलने का समर्थन किया.

शुक्रवार 11 अक्टूबर को कोरबा जिला स्थित पाली-तानाखार विधानसभा क्षेत्र के ग्राम करतली में आयोजित अंबिका कोयला खदान जन-सुनवाई का गाँववालों ने बहिष्कार कर दिया है. साउथ-ईस्टर्न कोल लिमिटेड(SECL) के अधिकारी जब करतली में जन-सुनवाई के लिए पहुँचे, तो ग्रामीणों ने जमकर विरोध किया. स्थानीय रहवासियों ने साफ़ कह दिया है कि उन्हें किसी भी कीमत पर इस इलाके में कोयला खदान नहीं चाहिए. भारी विरोध के बाद सुनवाई रद्द कर अधिकारियों को खाली हाथ लौटना पड़ा.

खदान से कृषिभूमि को होगा नुक्सान

विकासखंड पाली के ग्रामपंचायत करतली में एसईसीएल प्रबंधन अबिका ओपेन कॉस्ट कोयला खदान खोलने की योजना पर कार्य कर रहा है. इसके लिए शुक्रवार को ग्राम करतली के पूर्व माध्यमिक शाला परिसर में पर्यावरणीय जनसुनवाई का आयोजन किया गया था. खदान के लिए कंपनी को लगभग 134 हेक्टेयर जमीन की जरूरत है. कंपनी खदान से सालाना एक मिलियन टन से 1.35 मिलियन टन कोयला खनन करना चाहती हैं.

खदान को लेकर आयोजित पर्यावरणीय सनवाई में ग्रामीणों की राय जानने के लिए शुक्रवार को गांव में खुली चौपाल आयोजित की गई. इसमें ग्राम पंचायत करतली और इसके आसपास स्थित कोयला खदानों से प्रभावित होने वाले लोग शामिल हुए. ग्रामीणों ने एक स्वर में अंबिका कोयला खदान का विरोध किया, कहा कि खदान से प्रभावित होने वाला क्षेत्र कृषि प्रधान है. इस पर आदिवासी समाज के लोग खेती-बाड़ी करके परिवार चलाते हैं. खेती ही यहां लोगों के आजीविका की साधन है. ग्रामीणों ने कहा कि खदान खुलने से खेती की जमीन को नुकसान होगा. लोगों के समक्ष परिवार के जीवन यापन की गंभीर समस्या आ जाएगी. ग्रामीणों ने जनसुनवाई के दौरान खदान का विरोध किया.

पेसा एक्ट के उल्लंघन का लगाया आरोप

एक आवेदन पर 300 लोगों ने हस्ताक्षर किए. आवेदन पर्यावरणीय जनसुनवाई कराने वाले अधिकारी को सौंपा गया है. कड़े स्वर में ग्रामीणों ने अधिकारियों से कहा कि गांव में खदान नहीं खुलनी चाहिए. ग्रामीणों ने पेसा एक्ट का पालन नहीं करने का आरोप भी एसईसीएल प्रबंधन पर लगाया. लोगों ने कहा कि जिले में पांचवी अनुमचि लागू है. इसके बाद भी गांव में खदान खोलने के लिए ग्राम सभा से मंजूरी नहीं ली गई. जनसुनवाई का विरोध करने से पहले ग्रामीणों ने स्कूल परिसर में ही अलग से बैठक कर रणनीति बनाई. इसमें विधायक भी शामिल हुए.

छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन के संयोजक आलोक शुक्ला का कहना है कि जिन क्षेत्रों में अभी खदानें संचालित है वहाँ के बहुत से विस्थापितों को न समूचित मुआवजा मिला है और न ही रोजगार. पर्यावरण का संतुलन बना पाने में एसीईसीएल और सरकार पूरी तरह नाकाम रही है. यही वजह है कि स्थानीय निवासी आक्रोशित हैं. लिहाज़ा वे अपने इलाके में अब और कोल खदान नहीं चाहते हैं.

जलस्त्रोत पर भी असर

ग्रामीणों का कहना है कि खदान से प्रभावित होने वाले क्षेत्रों में नदी नाले भी हैं. खदान खुलने पर नदी नालों के अस्तित्व पर संकट आ जाएगा. प्रभावित क्षेत्र में जल संकंट भी गंभीर हो जाएगा. ग्रामीणों ने कहा कि खदान के लिए कीमती वृक्षों की कटाई होगी इससे जंगल उजड़ जाएगा.

लल्लूराम में प्रकाशित ख़बर के अनुसार उर्जाधानी भू-स्थापित कल्याण समिति के दीपका क्षेत्र सचिव प्रकाश ने कहा, कि गाँववालों ने पहले ही कह दिया था, कि वे इस इलाके में अब और कोयला खदान नहीं चाहते. पहले से गेवरा, दीपका, कुसमुंडा और कोरबा में कोयला खदानें है. इन खदानों की वजह से जिले में प्रदूषण की स्थिति भयावह है. ऐसे में अब एक और कोयला खदान यहाँ नहीं चाहिए. फिलहाल इन चार क्षेत्रों में स्थित खदानों से सालाना 119 मिलियन टन कोयले का खनन हो रहा है. वहीं अंबिका कोयला खदान शुरू होने पह वहाँ से 1.35 मिलियन टन सालाना खनन किया जाना है. ऐसे में इस अतिरिक्त खनन की भरपाई पुराने खदानों से ही हो सकती है.

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