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ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की कविता – परायी धरती

ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का का जन्म 21 अक्टूबर 1921 को लुबलिन (पोलैंड) में हुआ था. नाज़ी जर्मनी के काल में भूमिगत संगठन के. ओ. पी. की सक्रिय सदस्य थीं. उन्हें और उनकी बहन को 8 मई 1941 को गेस्टापो ने गिरफ़्तार कर लिया और कुछ महीनों बाद खास तौर पर महिला बंदियोंके लिए बनाए गए रावेन्सब्रुक (जर्मनी) के यातना शिविर में डाल दिया गया था. 

वहीं ग्राज़्यना को 18 अप्रेल 1942 को अन्य 11 पोलिश महिला बंदियों के साथ नाज़ी फायरिंग स्क्वाड द्वारा गोली से उड़ा दिया गया.

इस तरह हम देखते हैं कि मात्र इक्कीस बरस का लघु जीवन इस कवयित्री ने जिया वह तो अभी  ठीक तरीके से इस दुनिया के सुख – दु:ख और छल -प्रपंच को समझ भी नहीं पाई थी कि अवसान की घड़ी आ गई।

उनकी स्कूल के दिनों में लिखी जितनी भी कवितायें उपलब्ध है. उनसे गुजरते हुए सपनों के बिखराव से व्याप्त उदासी और तन्हाई से उपजी तड़प के साथ एक सुन्दर संसार के निर्माण की आकांक्षा को साफ देखा जा सकता है.

ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का की कुछ कविताओं का प्रसारण 1943 में बीबीसी लंदन से कैम्प के समाचारों के साथ हुआ था. प्रस्तुत कविता जारेक गाजेवस्की द्वारा मूल पोलिश से अंग्रेजी में किए गए अंग्रेजी अनुवाद पर आधारित है.

परायी धरती

नीची इमारतों की खामोश भूरी कतार
और उसी की तरह भूरा – भूरा आसमान
यह भूरापन जिसमें नहीं बची है कोई उम्मीद

उदासी में डूबे अलहदा किस्म के
इंसानों के झुण्ड

भयानक तस्वीरें, अनोखी अजनबियत
और बहुत ज्यादा सन्नाटा

इस मृत खालीपन में
घर की याद घसीटती है अपनी ओर
जिससे उपजता है सूनापन

घेरती है पीली कठोर और गूँगी निराशा
जिसमें दम घुटता है भावनाओं का
और वे भटकती हैं अँधेरे – अंधे कोनों में

सुनो , बावजूद इसके
आजाद जंगलों में अंकुरित होते हैं
नए – नन्हें वृक्ष

क्या हमें ?
क्या हमें सहन करना है ?
यह सब जो विद्यमान है शान्तचित्त

मैं खोती जा रही हूँ अनुभव अपने अस्तित्व का
कुछ नहीं देख पा रही हूँ
न ही कर रही हूँ किसी सूत्र का अनुसरण
हम यह जो छोड़े जा रहे हैं निशान
वे इस परायी रूखी धरती पर
वे कितने छिछले हैं कितने प्राणहीन

मात्र इतना
कि हम यहाँ आए थे

और कोई अर्थ नहीं नहीं था हमारे होने का

यह कविता घोर निराशा के इस समय में भी आशा का संचार करती है और कई सवाल खड़े करती है .. यह मनुष्य को झकझोर कर पूछ्ती है  .. इस पराई धरती पर हमारे होने का क्या अर्थ है ..? यह कविता आपको कैसी लगी ज़रूर बताइयेगा  – शरद कोकास

कविता :ग्राज़्यना क्रोस्तोवस्का
अनुवाद : सिद्धेश्वर सिंह
प्रस्तुति : शरद कोकास

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