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गुलाबी अर्थव्यवस्था का काला साल :बिलासपुर मे भारी प्रतिरोध

cg basket – protest in bilaspur against demonetization

फेंकू  शब्द तो आपने सुना ही होगा, ये शब्द सुनकर अगर आपको भी उन्ही नेता जी का चेहरा दिख रहा है जिनका हमे दिखता है, तो इससे आगे और क्या कहें आप तो ख़ुद ही समझदार हैं. आज 8 नवम्बर है, आज हम आपके बीच आये हैं पिछले 8 नवम्बर की बात करने. 8 तारीख़ रात 8 बजे का समय था हमारे प्रधान सेवक माननीय श्री नरेन्द्र मोदी जी अचानक टीवी पर प्रकट होते हैं और सारे देश के लिए एक फ़रमान जारी कर देते हैं कि मित्रों आज रात्रि 12 बजे से 500 और 1000 के नोट चलन से बाहर हो जायेंगे.


बटुए में रखे पैसे, दिन भर की मेहनत के बाद एक दुकानदार या किसी चाय की टापरि चलाने वाले के गल्ले में आये पैसे, माँ ने पेटी के अन्दर टीन के डिब्बे में और साड़ी के पल्लू में जो नोट बाँध कर रखे थे, आम आदमी की उस कीमती जमा पूँजी के मिनटों में बेकार हो जाने का दर्द क्या होता है यह शायद हमारे प्रधान सेवक महोदय कभी नही समझ पाएंगे, बड़े लोग हैं भाई, राजा हैं देश के, आम आदमी के लिए अब ये नीतियां नहीं बनाते फ़रमान जारी करते हैं.


-: भले ही ही दस दोषी छूट जाएं लेकिन एक भी निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए :-
यह कथन किसी भी कानून का आधार है लेकिन नोटबंदी के संदर्भ में यह सिद्धांत लागू नहीं हुआ. 8 नवंबर की मध्यरात्रि को हुए नोटबंदी की घोषणा के बाद, इससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर से जुड़ी, अब तक लगभग 150 से मौतें हो चुकी हैं.


इसमें कोई शक नहीं, कुछ मौतें जिन्हें नोटबंदी से जोड़ा जा रहा है, वह फिर भी होती अगर नोटबंदी नहीं होती. लेकिन फिर भी यह तथ्य  है कि इनमें से अधिकतर मौतें नहीं होती, अगर नोटबंदी नहीं होती.
सरकार की प्रतिक्रिया एक बयान से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि सरकार इन मौतों के बारे में क्या सोचती है, जब वेंकैया नायडू ने लोगों की ‘परेशानियों’ को प्रसव पीड़ा कहा.
नायडू ने कहा- ‘जहां तक लोगों को हो रही परेशानियों का सवाल है, किसी बच्चे को पैदा करना आसान नहीं है. लेकिन एक बार जब बच्चे की पैदाइश हो जाती है, तब मां की खुशी का ठिकाना नहीं होता.’


उन्होंने लोगों की मौतों पर बयान देने की बजाय रचनात्मक होने का रास्ता चुना. नायडू ने कहा कि कैसे स्वच्छ भारत अभियान ‘तन, मन, धन’ की सफाई है और नोटबंदी एक ‘महायज्ञ’ है.
सरकार ने ऐसे पेश किया कि जैसे कहीं कोई मौत ही नहीं हुई है और देश की गुलाबी तस्वीर पेश की, जहां हर कोई प्रधानमंत्री के फैसले से खुश हैं.
भाजपा के नेताओं एक बड़ा ही बेहूदा तर्क तर्क दिया कि ‘हर साल, लगभग 3,500 लोग रेलवे ट्रैक पर कटकर मरते हैं, पांच लाख लोग रोड दुर्घटना में मरते हैं, बहुत से लोग आतंकी घटनाओं और अन्य घटनाओं में मारे जाते हैं, कोई इसके बारे में नहीं बोलता है.’और ‘कई बार लोग राशन की कतारों में भी मरते हैं.’

cg basket – protest in bilaspur against demonetization

सरकार क्यों है जिम्मेदार
सरकार नोटबन्दी का ढांचा बनाने और अधूरे बने उस ढांचे के क्रियान्वयन में पूरी तरह असफ़ल रही इसी का नतीजा थीं अस्पतालों और बैंक की कतारों में हो रही मौतें
सरकार ने सार्वजनिक यातायात और अस्पतालों में पुराने नोटों को 24 नवंबर तक मान्य रखने की बात तो कह दी पर सच्चाई यह है कि मौतें इसीलिए हुईं क्योंकि इन जगहों पर पुरानी नोटों को लेने से मना कर दिया गया था. यह सबूत है सरकार की लापरवाही का.क्या प्रधानमंत्री जी ने एक बार भी ये नहीं सोचा अस्पताल जैसी जगहों पर नोटबंदी क्या दुष्परिणाम हो सकते थे?
किसी की मौत ‘छोटा’ बलिदान नहीं


सामाजिक बदलाव के लिए लिए गए सरकारी फैसलों के कारण पहले भी मौतें हो चुकी हैं, जैसे 1990 में मंडल कमीशन के खिलाफ हुए प्रदर्शन में. आखिर में, कोई भी मूलभूत बदलाव जटिल होता है, अगर यह प्रशासन से जुड़ा हो.फिर भी मौत किसी भी तरह से ‘छोटा बलिदान’ नहीं है
नोटबंदी ने कहीं से भी काले धन के ऊपर ऐसा कोई बड़ा प्रभाव नहीं डाला जिसके चलते इन मौतों को जस्टिफाई किया जा सके. पी. साईनाथ ने अपने लेख पीपुलएस् आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया,  में लिखा है- ‘बहुत से लेखकों, विश्लेषकों और आधिकारिक रिपोर्टों ने इस तथ्य कि पुष्टि की है कि भारत की ‘काली’ अर्थव्यस्था सोने, बेनामी जमीन के सौदों और विदेशी करेंसी में है.’ उन्होंने यह भी बताया कि केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ने 2012 की अपनी रिपोर्ट में यह कहा है कि पहले भी दो बार 1946 और 1978 में नोटबंदी असफल हो चुकी है.
हम और भी उदार होकर अगर सोचें कि नोटबंदी काले धन को समाप्त कर देगी. फिर भी यह एनडीए सरकार की गलत सोच है क्योंकि किसी भी तरह का आर्थिक बदलाव चाहे वह कितना ही जरुरी क्यों न हो, किसी व्यक्ति के मानवाधिकार से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हो सकता.
किसी भी निर्दोष व्यक्ति के जीने का अधिकार सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण

ज़रा सोचे कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन???

दुनिया की सातवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के सभी 1.2 अरब लोग बेचारों की तरह लाइन में खड़े थे.
वर्तमान में रिजर्व बैंक में 99 फीसदी पुराना धन वापस जमा हो गया, तो आखिर कला धन का क्या हुआ? क्या घरो में माँ और बहनों की जमापूंजी काला धन थी?
4 से 5 करोड़ मजदूरों के लिए रोजी रोटी की समस्या पैदा हो गयी
बांको ने ग्राहकों के जमा पूँजी पर ब्याज दर कम कर दी और अपना खुद जमा पूँजी एटीएम से निकालने के लिए चार्ज लगा दिए.
देश के इतिहास में पहला ऐसा प्रधानमन्त्री जिसने लाल किए से देश की जनता को गलत आकडे बताकर गुमराह करना चाहा, मानो देश का प्रधानमन्त्री नही बल्कि बीजेपी का प्रवक्ता भाषण दे रहा हो.
नोटबंदी की मार ने पूरे देश को ऐसा हिलाया कि कही युवा बेरोजगार हो गया, कही किसी की शादी में अडचने आई, कितने बच्चे अस्पताल में इलाज न पाने के कारण मारे गये, किसी का व्यापार शुरू करने से पहले ही ख्त्मं हो गया. जिसके बदले में बीजेपी के नेताओं और विकास के पापा के द्वारा दिए गये असंवेदनशील भाषण देश के लगो को उपहार मिली.
पूरे देश 150 से ऊपर लोगो की मृत्यु हो जाती है जिसके बाद बीजेपी के ही नेता वन्कैया नायडू ने इसको प्रसव पीड़ा से तुलना कर दी. ज़रा सोचिये कि कितने नेता लाइन में खड़े हुए और कितने नेता के परिवार के लोग उपरोक्त नेता के द्वारा बोले गये प्रसव पीड़ा का हिस्सा बने?

 

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