दलित मानव अधिकार शिक्षा-स्वास्थय

गुरू घासीदास विश्वविधालय बिलासपुर ःः पीएचडी जैसी उच्च शोध उपाधि से गणेश कुमार कोसले को रोकना इसी मनुवादी व्यवस्था के तहत वही दृष्टांत उत्पन्न करना है

हेमलता महिश्वर

ज्ञातव्य है कि विद्यार्थी गणेश कुमार कोसले ने प्रवेश हेतु लिखित परीक्षा उत्तीर्ण की और साक्षात्कार में उन्हें अयोग्य ठहराया गया और उपलब्ध आरक्षित स्थान को रिक्त रखा गया।
अनुसूची पॉंच के तहत् गुरु घासीदास विश्वविद्यालय को वंचित तबक़ों के सर्वांगीण विकास के स्वप्न के साथ स्थापित किया गया था। तत्कालीन अविभाजित मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री माननीय अर्जुन सिंह ने विश्वविद्यालय के पचीसवें स्थापना दिवस के अवसर पर दिए गए अपने संदेश में इसका स्पष्ट उल्लेख किया है कि कुछ नेता गुरु घासीदास का नाम विश्वविद्यालय को नहीं देना चाहते थे। आज भी वंचित तबके के लोग इसी ब्राह्मणवादी मानसिकता का शिकार हो रहे हैं।
पीएच. डी. जैसी उच्च शोध उपाधि से गणेश कुमार कोसले को रोकना इसी मनुवादी व्यवस्था के तहत वही दृष्टांत उत्पन्न करना है जिसमें ज्ञान प्राप्त करते हुए शंबूक की हत्या नरोत्तम राम द्वारा की जाती है। आज कितने ही शंबूकों का वध कैसे – कैसे रामों द्वारा किया जा रहा है?


यदि आरक्षित स्थान रिक्त नहीं होता तो गणेश कुमार कोसले कोई शिकायत नहीं करते। विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षा को उत्तीर्ण करने के बाद साक्षात्कारः में अयोग्य ठहराते हुए स्थान को रिक्त रहने देना जातिगत उत्पीड़न है।
हमारी मॉंग है कि गणेश कुमार कोसले के साथ न्याय किया जाए और विश्वविद्यालय में जातिगत उत्पीड़न संबंधी मामलों की सुनवाई के लिए एक आंतरिक समिति का गठन किया जाए, ताकि ऐसे मामलों पर त्वरित कार्यवाही हो और किसी भी विद्यार्थी का नुक़सान न हो।

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