नीतियां

गांव बसने से पहले ही आ धमके_भेड़िये : बादल सरोज .

मोदीराज द्वितीय के लिए कारपोरेट एजेंडा

पूंजीवादी लोकतंत्र में चुनाव सिर्फ एक एपिसोड होते हैं । असली पटकथा फ़ायनेंसर्स चुनाव के पहले ही लिख देते हैं , चुनाव बाद उसका मन्चन भी उन्ही के डायरेक्शन में होता है । मोदी सरकार प्रथम इसका ड्रेस रिहर्सल थी और अब मोदीराज द्वितीय इसका सार्वजनिक प्रदर्शन है ।


● गिनती पूरी होने के पहले बीच रुझानों में ही – जिन्होंने पैसा लगाया था – वे नई सरकार के कामों की सूची लेकर आ धमके । उन्हें पहले से ही चुनावी घुड़दौड़ मेंअपने घोडे की जीत का पक्का यकीन था, इसलिए पहले 100 दिनों में किये जाने वाले कामो की लिस्ट एडवांस में बनाई जा चुकी थी । चुनाव परिणामों के बाद अब रंगबिरंगे अखबारों में छापकर और टीवी चैनलों की बतकही में बार बार उच्चार कर उसे आम सहमति बनाया जा रहा है, नोम चोम्स्की के शब्दों में “मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट” हो रहा है । मोदी सहित उनकी पूरी टीम से हुंकारा भरवाया जा रहा है । त्रिवाचा भरवाया जा रहा है ।


● इस एजेंडे में रोजगार नही है । इसमे खेती का संकट सिरे से गायब है । देश की बैंकें और संपदा लेकर भाग चुके, साढ़े तरह करोड़पति प्रतिदिन की दर से भाग रहे नीरव मोदियों सहित हजारों भगोड़ों की वापसी और जब्ती नही है । हिंदुस्तानियों की खाद्य सुरक्षा, सस्ता राशन नही है । कुलमिलाकर यह कि जिस जनता ने वोट डालकर चुना है वह नही है । उसकी उपयोगिता वोट डालने भर तक थी । एजेंडे में हैं नाकारा धनपशुओं का मोटापा, अर्थव्यवस्था का भटटा बिठानेवाले कार्पोरेट्स का मुनाफा और उसके रास्ते मे आने वाली हर बाधा को दूर करना ।


● नीति आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष और संघी अर्थशास्र के विशेषज्ञ अरविंद पनगढ़िया ने हुकुम दिया है कि अर्थव्यवस्था को बचाना है तो “साहस के साथ परफॉर्म” करके दिखाना होगा । इस साहस का पैमाना उन्होने तय किया है कि “हर सप्ताह में एक पब्लिक सेक्टर कम्पनी बेची जानी चाहिये ।” तभी कहीं जाकर वे 90 हजार करोड रुपये जुटाए जा सकते हैं जिन्हें इकट्ठा करना दिवाला पिटने से बचने के लिये जरूरी हैं । दूसरा नुस्खा है श्रम सुधारों का – काफी कोशिशों के बाद भी मोदीराज-एक एक सीमा से आगे बढने की हिम्मत नही जुटा पाया था । अब यह काम पहली फुर्सत में करने हैं । यथासंभव पहले 100 दिन में निबटाने हैं ।


● कारपोरेट सच्ची की हड़बड़ी में हैं । यह भूखे की बेचैनी नही है, मोदी राज-1 में सबसे बेदर्दी के साथ इन्ही कार्पोरेट्स ने जम कर जीमा है । जियो, राफेल, कृषि बीमा, बैंक के डूबन्त कर्ज, जमीन हड़पो इसके कुछ बड़े उदाहरण है । हिन्दुस्तानी कार्पोरेट्स ने गुजरे पांच साल में जितनी तेजी से और जितना कमाया है उतना अमरीका जापान सहित दुनिया के किसी भी पूंजीवादी और कारपोरेट राज वाले देश के पूंजी घराने नही कमा पाये । इसलिये यह भूख की बदहवासी नही है, यह खाये अघाये की लालसा लालच और वासना है । अब उन्हें सबकुछ चाहिए और तुरंत चाहिए । इसलिए मोदीराज-2 को जल्दी है कि भूमि हड़पने में जो बाधाएं है उन्हें भी तुरंत दूर किया जाए ।


● उन्हें पता है कि यह सब करना आसान नही होगा । पिछली पांच सालों में मज़दूर किसानों के शानदार प्रतिरोध, जुझारू संघर्ष और बेमिसाल उभार उसकी यादों में ताजे ताजे हैं । इसलिए एक एजेंडा लोकतंत्र नामकी इल्लत से भी मुक्ति पाने का है । कारपोरेट का हर दूसरा “अर्थशास्त्री” लिखापढ़ी में बोल रहा है कि यदि (उनके) आर्थिक विकास में लोकतंत्र आड़े आता है तो इसकी भी छुट्टी करो । जलूस, वलूस, नारे, आंदोलन, धरने, हड़तालें सब को राष्ट्रद्रोह करार दो ।


● अभी (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक) नए प्रधानमंत्री और सरकार ने शपथ भी नही ली है, मगर एजेंडा द्रुतगति से अमल में लाया जाने लगा है ।
इससे उपजी और उपजने वाली क्षोभ और बेचैनी को प्रतिरोध में बदलने के लिए शकुनि सक्रिय हो गए हैं । देश भर में घट रही घटनाएं इसकी गवाही देती हैं।


● किसे कितने वोट मिले और क्यों मिले, स्विंग कितनी और किस दिशा में हुई, कौनसी जाति कहां गई इस का गुणाभाग करते रहियेगा । फिलहाल तो कारपोरेट की सिम्फनी पर साम्प्रदायिकता के कोबरा का भस्मासुरी नृत्य देखिये । उसे रिझाने की बजाय उसे हराने की मुश्किल किन्तु जरूरी तैयारी शुरू करने की दिशा मे बढिये ।

बादल सरोज , माकपा के वरिष्ठ नेता

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